Dec 29, 2014

पहले 
वो देखते थे स्वप्न 
फिर लग गए इन्हें सच करने में 
सच करने में लगते हैं प्रयास 
फिर वो लग गए प्रयास करने में 
फिर वो बस प्रयास करने लगे 
फिर वो भूल गए 
कि वो देखते थे स्वप्न !

Alone With Everybody -- charles bukowski


अकेला सभी के साथ :
कोई माँस ढक लेता है किसी हड्डी को 
और वो लगा देते हैं एक मन वहाँ
कभी कभी एक आत्मा ,
और औरतें तोड़ देती हैं
गुलदान दीवारों से मार कर
और आदमी पीते हैं
बहुत ज्यादा
और किसी ने नहीं पाया उसे
पर लगे रहते हैं
तलाश में
रेंगते अन्दर और बाहर
बिस्तर के .
माँस ढक लेता है हड्डी को
और माँस तलाशता है
माँस से कुछ ज्यादा .
कोई संभावना नहीं है
वहाँ थोड़ी भी :
हम सभी फाँसे जा चुके हैं
एक ही भाग्य द्वारा .
किसी ने भी
कभी नहीं पाया उसे .
कचरागाह भरते हैं
कबाड़खाने भरते हैं
पागलखाने भरते हैं
अस्पताल भरते हैं
कब्रिस्तान भरते हैं
और नहीं कुछ भरता .

Alone With Everybody -- charles bukowski

Dec 26, 2014


(1)

एक रेशमी गिरह
बांधे हुयी थी पंखुड़ियाँ गुलाब
जब देखा था तुम्हे पहली बार
तुम खुल कर हँसी थी !

किसी कमलिनी की सुबह
खुलते हुए दल से उड़ता हुआ भंवरा
और हवा में बिखर जाते पराग !

एक पल को खिलता
और फिर घुल जाता खामोशी में
जाने कौनसा फूल था !

कितनी नरमी से सरकी थी
वो गिरह रेशमी
एक हँसी में हवा हो गया
था कितना कुछ !
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रात के साफ़ आसमान में
एक टूटता तारा
चमका था तुम्हारी आँखों में
पल भर के लिए
और फिर किसी और दुनिया में
ले जाकर रख दी थी
तुमने निगाहें अपनी !

दो पल की मुलाकात
और इंतज़ार
फिर से उसी संयोग का !

दोहराव का सुन्दर गणित
दोहराव का गहराता वैराग
दोहराव की बढ़ती ऊंचाई
अनुराग की ओर !
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हर पत्थर तैरता है
तुम्हारे नाम का
इस सागर में
ना कभी डूबता है
ना कभी खोता !

शब्दों के कंकड़ ,
बातों के पहाड़
बाकी सब कुछ
डूब जाता है हर बार
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प्रेम में डूबी बातें
विश्वास में डूबी आँखें
कितना मजबूत पुल बाँधती हैं
सोचना ही नहीं पड़ा
कभी आते जाते !

विश्वास के धागों में बुने
उम्मीदों के ख़याली स्वेटर
और हल्के मद से सराबोर
सर्द हवा में खामोश हम तुम
चिपकी सी रहने लगती है
कोई नर्म ऊनी गुनगुनाहट !
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विज्ञान की होकर भी
तुम बातों में जाने कौन जादू रचती थी
अपने समीकरणों से
ना जाने कौन सा साहित्य सृजति थी !

एक मैं भी था जिसके लिए
किताबों में रह गया था बस
एक नीला आसमान
उड़ान भरने लगते थे
आँखें रखते ही
खयालों के कितने पंछी !
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वक़्त की शुरुआत बदल गयी थी
तुमसे पहले कुछ नहीं था सृष्टि में
ना तुम्हारे बाद के किसी ख्याल को
आकाश मिलता था !

तुमसे मिलना और फिर
भावों का उद्गम बदल जाना
खगोलीय घटना थी
या जाने रसायन की पहेली
या कोई नए युग की शुरुआत !

रौशनी का स्तोत्र भी बदल सा गया था
तेरे बिना कहाँ शुरू होता था दिन कहीं !
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तुझसे मिलने
और तुझसे मिलने के बीच में
कभी कोई वक़्त नहीं गुज़रा
ना ही कुछ घटा
ना ही कुछ आगे बढ़ा !

तेरे साथ बिताये पल
कितने रेशम कितने सरल
कितने गम कितने तरल
बिना छुए ही गुज़र गया
वो कितना वक़्त पास से
ख्वाब हो गयी कितनी सदियाँ
कितने आँसू आँख से
कितनी खुशियाँ आँखों में बनकर
आँखों में ही छा गयी
मीठी यादें नमक सी घुलकर
स्मृति जल में समा गयी !
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(2)

ठहर जाया करता
अक्सर सब कुछ
और फिर चलने लगता
सब कुछ वैसे ही
मुझे वहीँ छोड़कर !
ऐसे ही किसी एक पल
सब कुछ ठहरा हुआ था
घंटाघर पर घडी
घड़ी पर काँटें
काँटों में वक़्त
आँखों में तेरा खयाल !

जागते सपने सा चलता रहा सब
चाँद बहता रहा रात के दरिया में
तुम तकिये को नाव किये !
कौन जाने मेरी आँखें
दीवार पर थी या शून्य में
मन खयालों में था
ज़हन सवालों में
उलझता सुलझता !

सब कुछ ठहरा हुआ था
चाँद रात वक्त खयाल
और आँखें अपलक
और अचानक सब चलने लगा
उस बदलाव के क्षण में जाना
होना और ना होना
ना होते हुए भी होना
होते हुए भी ना होना !
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संसार सागर था
और वक़्त बहाव
भावनायें पतवार थी
और ख़याल दिशा
ख़्वाबों की नाव में
संभव नहीं था
वक़्त का सही अनुमान
खुशबुओं का पीछा करता
मन करता रहा सैर !

घड़ी 6 पर थी
सूरज क्षितिज़ पर
मैं बस स्टॉप पर कहीं
और तुम दरवाजे पर
या शायद किसी खिड़की में
या हर वहाँ जहाँ मेरा खयाल पहुंचा !

अब घड़ी 12 पर है
तुम शायद तकिये पर
ख़्वाबों को सिरहाने किये
मैं बैठा हूँ किसी किनारे
एक दीवार का सहारा लिए !
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हथोड़े की तरह वक़्त
गतिशीलता की वस्तु नहीं
बस मिलन की चोट है

हथोड़े की तरह वक़्त की
गतिशीलता कोई वस्तु नहीं
बस प्रहार की तीव्रता है !
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तुम व्यस्त थी मैं खाली
और चाहत उमड़ रही थी
मैं व्यस्त था तुम खाली
और चाहत उभर रही थी
पर वक़्त सरकता नहीं था
बिना दो पाट एक कदम !

बादलों को प्यास होती है
तप कर खाली हो जाने की
हर कोई चाहता है मुक्ति
अपने कन्धों पर के भार से
वो जाते हैं दूर तक बहते हुए
जहाँ हज़ारों हाथ इंतेज़ार में हो
और पत्ते नम स्पर्श को आतुर !

एक बरसात और भी थी
जमीन से उठती थी गर्मी की बूँदें
और हल्का कर देती थी बादलों को
बंधन मुक्त हो ऊर्जा
गरजती कड़कती
हो जाती थी लय
अनंत आसमान में कहीं !

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(3)

शिकन थकन सिलवटें
दूर होने लगे थे सब
फेफड़े लेने लगे थे
खुली हवा का स्वाद
मैंने जाना बेवजह की हो-हँसी से
कहीं बेहतर हैं ख़ामोश ख़याल

दुनियावी थार में प्यार
सागर की लहरों सा
गंभीर शोर करता था
मेरे मन की खामोशी में
बहती हुयी हवा के झोंके
बदल देते थे विचारों की दिशा
खोया हुआ पाता था
अपने आप को मैं अक्सर !
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ख्वाहिशें सिमट कर सारी
एक मूर्त रूप ले उठती
सब कुछ बेमायनी लगता
लगता जैसे जीवन बस उतना ही हो
जितने में सिमट सकें तुम और मैं !

एक दुनिया
और उसमें अनेक एक दुनिया
बिखराव वियोग
और खो जाती हुयी चीजें
मैं कर लेना चाहता था निश्चित
तुम बनी रहो मेरी दुनिया में !

हम सब मूर्ती हैं
अपने ही सपनो की
और हमारा संसार
हमारा निजी स्वप्न संसार
पर कितने खुले हुए हैं
हमारे स्वप्नों के रास्ते
और कितना गुजरते हैं हम सब
एक दुसरे से होकर !

सच कर देता है उसे
किसी भी ख्वाब से ज्यादा लगाव
पत्थर में भी बसने लगते हैं प्राण
कभी कभी सच हो जाते हैं
हमारे हसीन ख्वाब
तो कभी
कोई डरावना खयाल
आकार लेने लगता हैं !

अदृश्य धागों से बंधी हुए
गोल घूमने लगती है जिंदगी
हर फैसला हर एक ख़याल
बस उस एक घेरे तक सिमट जाता है !

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अ से

Dec 24, 2014

इस जाम को प्याले को गवाह करता हूँ


इस जाम को प्याले को गवाह करता हूँ 

मयकदे में रात से निकाह करता हूँ 
तेरी रहमत का ये खुला आसमां लेकर 
आज ये आखिरी गुनाह करता हूँ 
साकिया देख मैं रंजूर हुआ जाता हूँ 
जब्त की हद से बहुत दूर हुआ जाता हूँ
मेहरबान हो कुछ साँस खुद मुझको पिला दे
वरना डूब कर पीने पे मजबूर हुआ जाता हूँ ! 

अ से

Dec 20, 2014

मृत्युलोक


ये मृत्यु द्वारा जीत लिया गया लोक है
शेष को पृथ्वी का भार ढ़ोना है
अपनी वृद्धि के लिए
सृजन का बीज बोना है ।
ब्रह्मा को सृजन का अहंकार है
विष्णु ने जीत लिया ये संसार है
पर इस सब से
शिव को क्या सारोकार है ।

अ से 

Dec 18, 2014

Suicide in the Trenches -- Siegfried Sassoon


मैं जानता था एक सामान्य सिपाही लड़के को
 
जो हँसता जीवन की खाली खुशियों पर
सोता था गहरी नींद निर्जन अँधेरे के बीच 
और निकल पड़ता पंछियों के साथ अल सुबह
सर्दियों में खंदक खोदकर रहता उदास और त्रस्त
सिकुड़ कर जुओं और रम की कमी के साथ
उसने निकाल दी एक गोली अपने भेजे के पार
किसी ने जिक्र नहीं किया उसका फिर कभी
तुम दंभी-चेहरे आपस में जलने वाली भीड़
जो खुश होती है जब सैनिक मार्च करते है युद्ध को
घर में छुपे बैठे प्रार्थना करते कि तुम्हें ना देखना पड़े
नरक जहाँ चली जाती है हँसी और जवानी ।
I knew a simple soldier boy
Who grinned at life in empty joy,
Slept soundly through the lonesome dark,
And whistled early with the lark.
In winter trenches, cowed and glum,
With crumps and lice and lack of rum,
He put a bullet through his brain.
No one spoke of him again.
You smug-faced crowds with kindling eye
Who cheer when soldier lads march by,
Sneak home and pray you'll never know
The hell where youth and laughter go.
Suicide in the Trenches -- Siegfried Sassoon


- ये चाहिए या ये ?

- दोनों 
- तब कुछ नहीं मिलेगा । 
- ठीक है । 
- ये चाहिए या ये ?
- कुछ नहीं ।

अ से 

Dec 14, 2014

God and the soldier


ईश्वर और सैनिक
सभी के पूजनीय
विपत्ति के समय
और फिर नहीं ;
कि जब युद्ध निपट चुका है 
और सब कुछ सही है
देवता उपेक्षित हैं
बूढ़े सैनिक महत्वहीन ।
God and the soldier
All men adore
In time of trouble,
And no more;
For when war is over
And all things righted,
God is neglected -
The old soldier slighted.
---- Anonymous

Dec 13, 2014

बहुत दिन बीते कुछ किया नहीं गया


बहुत दिन बीते कुछ किया नहीं गया
समय कुछ पिछले जिया नहीं गया
दिल से किसी की दौरान बात नहीं हुयी
आँखों में ही गुज़री कोई रात नहीं हुयी
क्या हो गया इस दिल को अंजान समझूँ
अब उठते नहीं कोई खुवाब बेजान समझूँ
समझूँ क्या अपने हालात ए दौर को खस्ता
या किसी बेजुबान का जज़्बात समझूँ
बनते नहीं अब लफ़्ज़ ज़ेहन में सोये हैं
बुदबुदाते नहीं जज़्ब आँखों में रोये हैं
खाली है जन्नत ए इश्क़ से कटोरा
बरसते अब्र से बस उदासी के फ़ोहे हैं
ख़यालों में गुज़र बहुत मुश्किल है करना
सवालों में फिकर बहुत मुश्किल है मरना
मुश्किल है तमाम इस इंसां की राहों में
धीमे से बहुत मुझे वक़्त के पार है उतरना !
अ से