
काठ के खिलौने आखिर कब तक मन बहलाते ,
जब बच्चों का मन भर जाता है तो वो नहीं खरीदे जाते ॥
पर प्रश्न जीवन का था हमेशा की तरह , और वो एक सृजन ही उसका कुल धन था !!
बस ,
फिर उसके दिल में ये ही उठता रहा की जब प्रश्न सदा से जीवन का ही है ,
तो क्यों न जीवन ही डाला जाए इन लकड़ी के खिलौनों में ,
और बात दिल में बैठ गयी ॥
मूर्त से अमूर्त तक सब कुछ छान डाला उसने ,
की कोई मिले जो उसके खिलौनों में जान फूंक सके ,
शास्त्र कहानियाँ सुन उसने शिव-पार्वती की आराधना की ,
पार्वती जी प्रसन्न हुयी , शिव जी की कृपा से खिलौने जीवंत हो उठे ,
काष्ठकार खुश हुआ और खिलोनों को पकड़ने दौड़ा ,
उसका हाथ लगते ही वो सब मिटटी हो गए ,
उसने पूछा ये क्या ,
शिव बोले- धर्म ! इन्हें जीवन तो मिल सकता है पर तुम्हे नियंत्रण नहीं इन पर ,
काष्ठकार बोला , प्रभू मुझे कोई और उपाय बताओ ,
शिव ने कहा किसी के जीवन पर तो तुम्हे अधिकार नहीं दिया जा सकता ,
पर इन पुतलों को जीवन की नक़ल दी जा सकती है ,
तुम इन्हें ऐसे ही दिखाओ जैसे ये जीवित हो जाते हों और अपनी आजीविका चलाओ ,
हाँ पर जब तुम इन्हें जीवित दिखाओ तो इन्हें हाथ लगाना जीवन धर्म के विरुद्ध होगा ये ध्यान रखना ॥
और तब पार्वती जी ने उसे कुछ " प्राकृत देव सूत्र " ,खिलोनों पर नियंत्रण के लिए दिए
और महादेव ने उसे दिए दो दिव्य ज्ञान , उसके खेल में रचना की दिक् दृष्टि से , " कला और कौशल " ,
और वो दोनों अपने स्वयं बोध में सिमट गए ॥
काफी मेहनत के बाद आखिर वो खुश था ,
उसकी उंगलियों के इशारे पर उसके खिलौने एक जादू रचने लगे थे ,
अपने काठ के पुतलों , देव सूत्रों और कला कौशल के सहारे वो जीवंत कर देता था एक कठपुतली , एक दृश्य ॥
( पुतला - बनावटी देह , पुतली - आँख का गोलक , कठ - जड़ ,सांसारिक )
( कठ पुतली का अर्थ सांसारिक आँख या सांसारिक दृश्य से है ॥ )
खेल तमाशा चलने लगा , मनोरंजन , ज्ञान , आश्चर्य और अनुभव हर तरह से ये पसंद किया जाने लगा ,
कहानियाँ फैलने लगी लोक मानस में ,
और हर सृजन की तरह इसकी भी शाखाएं फैली ॥
पर हर सृजन की तरह , रचनाकार अपनी ही रचना के मोह में फंस गया ,
न होते हुए भी , वो उसमें जीवन देखने लगा ,
आनुपातिक रूप से अब कठपुतलियाँ चेतन होने लगी और काष्ठकार जड़ , बुद्धि और आत्म के सम्बन्ध की तरह ,
उसे पुतले ( यहाँ मूर्त की तरह प्रयुक्त हुआ है ) में ममता हो गयी ,
वो उसके सहारे जीवन को अनुभूत करने लगा ,
उन कहानियों में बसने लगा , उसकी हर वेदना संवेदना के प्रति वो सजग हो उठा ,
उसे सजाने लगा , सर्दी गर्मी से बचाने लगा , अपने ख़ास पुतले की तरह दुसरे पुतलों में भी उसकी चेतना उलझने लगी ,
और एक दिन उसने खुद को एक काठ का पुतला पाया !!
वो अहम् गर्वित हो उठा ,
उसने फूंक दिए थे प्राण एक पुतले में ,
जिस पर वो नियंत्रण भी कर सकता था क्योंकि ये जीवन उसका स्वयं का था , जीवन धर्म के विरुद्ध न था ,
और वो उसकी सहायता से रच सकता था ,स्वांग ...
............................................................................... ( १/२ जारी )
कठपुतली (2/2) ....
गली - गली , दर - पहर , वो अब नए नए स्वांग रचाने लगा ,
नित्य अजब अनोखे आयामों से जीवन कठपुतलीयाँ गाने लगा ॥
अब रचना और रचनाकार अलग अलग नहीं थे ,
और ना ही कहानियाँ ,
कहानियाँ ही जिंदगी बन गयी थी ,
उनसे अलग अस्तित्व को देखा जा सकना संभव न था ॥
दिखावटी दुनिया का हिस्सा बन जाने पर , सच झूठ को अलग रख पाने का साहस ह्रदय खो देता है ,
अब वो बस उसके सुखों दुखों में रच बस सा जाता है ,
हर संभव प्रयास होता है , सुखों की प्राप्ति (राग) और दुखों से दूर जाने का (द्वेष) ,
अंतर्द्वंद अन्तः करण बन जाते हैं ,
सुकृत दुष्कृत नियमोंमयी जमुना सभ्यता पनपने लगती है ,
मूल भावों की गंगा मैली होने लगती है ,
और फिर वो दिन भी आता है जब यमुना का पानी भी प्यास नहीं बुझाता ,
अब वो शीतलता से गीलेपन की दिशा का रुख कर लेता है ,
नाभि चक्र की सजगता दिनों दिन घटने लगती है ,
अमृत बहता नहीं , घड़े में भरने लगता है , भार हो जाता है ॥
अब कठपुतलियाँ जन मानस का मन उकता चुकी थी ,
उन्हें चित्र विचित्र आयाम देने के बेमायनी प्रयास किये जाने लगे ,
पर इन उत्तेजनाओं और प्रमादमय प्रयासों से कौशल खोने लगा ,
कला चुकने लगी ,
कमजोर पड़े पुतलों की जान संकट में आने लगी ,
जर्जर प्रतिमानों की तरह से वो दर बदर ठोकरें खाने को मजबूर थे ,
शोक दुःख और बैचेनी रुपी अस्थिर वायु राक्षस सब ओर मंडराने लगे ,
सूरज का प्रकाश धरा तक रह रहकर पहुंचता था , बरसातें अब नियमित ना थी
कोई उपाय नज़र नहीं आता था ॥
और अब एक पुतला संकल्प ले बैठा फिर से काष्ठकार बनने का ,
उसने जाना था विगत कठपुतलियों से अपना इतिहास ,
उसने की शिव की आराधना ,
वैराग का अनुसरण किया ,
मथने लगा वो दृश्य सागर को ,
सत्य का घृत ऊपर आना जरूरी था ,
जिसकी नौका पर चेतना किनारे लगे ॥
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पर इसके लिए जरूरी था एक युद्ध ,
कर्तृत्व के काले नाग से ,
वो भी कृत संकल्प था ॥
वर्षों तक घोर संघर्ष हुआ ,
कर्म से कर्म को मिटाना संभव न था ,
कर्म पाला बदलने लगते थे ,
तब शिव ने उसे दी अपने तीसरे नेत्र की प्रकाश प्रतीति ,
अब वो अपने युद्धक कर्मों को एक नयी दृष्टि से देखने लगा ,
उसके कार्य उसे सत्य का बोध देने लगे ,
जो अगले कार्यों को बल देते थे ,
और युद्ध की दिशा पलटने लगी ,
अंततः
हर ओर प्रकाश भर गया , तीसरा नेत्र पल भर को सच हो उठा ,
वायु राक्षस आकाश सी शून्यता में लय हो गये ,
और फिर एक ज्योति पुंज हो कर शिव मस्तक में यथास्थान विराजमान हुआ ,
नाग का विष बुझ चूका था , वो भी शून्य शिव देह में कहीं रम गया ,
सभी पुतले अब तक स्थिर हो चुके थे ,
कहीं कोई विकृत गति शेष न थी ,
और गंगा का प्रवाह बड़ गया ॥
बहुत पुराना सा कोई दृश्य ताजगी शीतलता और नयापन लेकर धरा पर आसीन था ॥
----------------------------------------------------------------------(२/२ कठपुतली )
< अ-से >
3 comments:
रोचक पोस्ट
बस बेजोड़
बहुत सुन्दर...
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