Oct 16, 2013

बुढ़ापा



ह्रदय ठोस हो गया है ,
उसके स्थान पर जिस्म फड़फडाता है ,

एक बैचेनी अटकी रहती है आँखों में
एक हलके से धक्के पर साँस अटक जाती है ,

अब कुछ भूलना मुश्किल होता है ,
जबकि याद कुछ नहीं आता ,

कुछ पुराने रूमानी दृश्य चोट पहुंचाते हैं मस्तिष्क को ,
बेरुखी विषबुझे तीरों से भेदती है ह्रदय के मर्म स्थानों को ,

बच्चों की वो भोली और मासूम मुस्कान
वो निश्चल हँसी जो कभी अमृत घोलती थी ,
हवा में बहती खिलखिलाहट जो खनकती थी कानो में ,
अब हजारों भुतहा चेहरों से अट्टाहास करती है ,
अंतस को हर एक कर्ण छिद्र से बहरा कर देती है ,

शर-शैया पर सोया है वर्तमान उसका ,
अतीत का हर एक झोंका देता है असहनीय तकलीफ ,

जिसको उसने तराशा था ,
एक मूर्तिकार की तरह ,
और दी थी लौ अपनी  ,
साँझ की रौशनी के लिए
आज वो ही देता है उसे दुत्कार ,
जगह देता है बस कोनों में चार ,
निकाल देता है कभी दखल से ,
कभी घर से बाहर ,
और खड़े  करता है सवाल ,
उसके अस्तित्व पर ! ... ( बुढ़ापा )

अ से

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