Oct 31, 2013

" प्रेम "


जिस समय साँसों की घुटन से उपजी तीव्र वेदनाओं की सूक्ष्म धाराएं , मेरे संवेदन अस्तित्व की हर एक इकाई का सर उठाया गला , कसी हुयी सन की रस्सियोंसे कसकर , दर्द के सभी आयामों और विशेषणों का मर्म मेरे मानस को समझा रही थी , तब सुकून को छटपटाती मेरी संवेदना और वक़्त को छटपटाते मेरे प्राण मुझसे विनती कर रहे थे ,
कुछ और सब्र करने का ..... ॥

उन्हें मालूम था अब मैं उन्हें किसी भी वक़्त निर्मम बुद्ध सा त्याग चला जाऊँगा , दृश्य की किसी और धारा में अपने को बीज बनाये फिर से अंकुरित होने ,
पर वो जानते थे मेरी चाहत का अतीत भी ,वर्तमान भी ,
और करते थे उस दिल कशा का भी खयाल ,
जो नहीं पहचान पाएगी , मुझे किसी भी और शक्ल में ,
और उसके लिए वो (मेरे प्राण ) मुझे इसी शक्ल में बनाये रखने का अंतिम संघर्ष कर रहे थे ॥

समय के उस हसीन लम्हे में , नर्म धूप , सर्द हवा , उठती महक से मदकती तितलयों , कोंपलों , डंठलों और खिलखिलाते हुए सूरजमुखी के फूलों को चेहरा दिए , मेरी प्रेम कथा की नायिका , अपने प्रेम गीतों में मेरी सलामती और ख़ुशी गुनगुना रही थी ॥

वो बेहिचक हरे नीले सपनो को , सुनहरी पीली उम्मीदों के , बैंगनी परिंदे बनाये आकाश में उड़ा रही थी ,
और मैं निर्विकल्प अपने प्राणों के अंतिम संघर्ष को थामे रखकर उनके रंग बचा ले जाने का हर संभव प्रयास कर रहा था ॥

उस समय , काल के तख़्त पर चढ़ाये गए कई निरीह निरुद्देश्य मन के टुकड़े अपना सामान समेट वहाँ से विदा ले चुके थे ,
और सज़ा सुनाने वाले न्याय और तंत्र को समर्पित निसंदेह ह्रदय रावण को जलाये जाने की आतिशी खुशियाँ मना रहे थे ॥

तभी एक हवा के झोंके से बिखरा मेरा मन आकाश और अवकाश के सभी अवयवों को छानता छोड़ता मेरी अंतिम इच्छा को साकार करने सूरजमुखी पर पंख फैलाती एक तितली पर सिमट कर बैठ गया ॥

आह , कराहते हुए , वेदना के तीव्र स्वर , गुनगुनाते हुए दो होठों के गीतों की धुन से ताल मिला ख़ामोशी में लय हो गए ,
न प्राणों की दुआ क़ुबूल हुयी , न गीतों की फरमाइश ...
प्रेम कशिश के साक्षात् को खिंची मनः तितली मुस्कुराई ... और उसके फैलते हुए पंखों की खूबसूरती में ... वो दिलकश चेहरा खिलखिला उठा ... सूरजमुखी अब उसे देख रहे थे ॥

............................................................... अ-से अनुज ॥

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