जब वो वादा किया गया था ,
तब किसे पता था की कहीं एक गाँठ उपजी है आकाश में ,
पर जब वो निभाया न जा सका , तब भी वो गाँठ वहीँ थी ,
चलती हुयी आंधियों ने उस पर चिपका दी थी मिट्टी ,
मौसम की नमी ने उसे कई बार भिगोया , बहुत से फफूंद लग चुके थे उसमें ,
धूप में कई बार सूख कर अब वो सख्त हो चुकी है ॥
उस गाँठ ने वहीँ बसना स्वीकार कर लिया ,
बीच बीच में किये जाते रहे और भी वादे , कुछ विरोधी भी निकले एक दुसरे के ,
अब वहां एक बस्ती बन चुकी है ,
कुछ में परस्पर प्यार है , कुछ वहीँ लड़ते झगड़ते हैं ,
पूरा शहर बसा लिया गया है वहां , नदी नाले सड़क , दीवारें ,
सब कुछ बातों का ही बना हुआ॥
अब वो गाँठ पक चुकी है ,
लहसुन की सी सड़ांध आती है उससे ,
बातें रिसने लगी है उससे ,
जो बातें जो नहीं बताई जानी थी और जो नहीं कहनी जानी थी , और भी , कुछ भी ,
कोई भीड़ जमा हो चुकी है उन्हें सुनने को ,
शहर के उस हिस्से में लगने लगा है अब जाम ,
हवा का भी आवागमन बंद है ,
और कोई आवाज़ भी अब बमुश्किल पहुँचती है वहां ,
साँस लेना भी मुश्किल हो रहा है ,
समझ नहीं आता कुछ ॥
ठूंठ बनने से पहले ,
याद आती है फिर से कभी कभी उन वादों की ,
समझ नहीं आता ,कैसे खुले ये गाँठे ,
खुली हवा का स्वाद लेने की तड़प तो कई दफा उठती है ,
पर वो साँसे अब दम तोड़ चुकी है ॥ ............................................ अ से अनुज ॥
तब किसे पता था की कहीं एक गाँठ उपजी है आकाश में ,
पर जब वो निभाया न जा सका , तब भी वो गाँठ वहीँ थी ,
चलती हुयी आंधियों ने उस पर चिपका दी थी मिट्टी ,
मौसम की नमी ने उसे कई बार भिगोया , बहुत से फफूंद लग चुके थे उसमें ,
धूप में कई बार सूख कर अब वो सख्त हो चुकी है ॥
उस गाँठ ने वहीँ बसना स्वीकार कर लिया ,
बीच बीच में किये जाते रहे और भी वादे , कुछ विरोधी भी निकले एक दुसरे के ,
अब वहां एक बस्ती बन चुकी है ,
कुछ में परस्पर प्यार है , कुछ वहीँ लड़ते झगड़ते हैं ,
पूरा शहर बसा लिया गया है वहां , नदी नाले सड़क , दीवारें ,
सब कुछ बातों का ही बना हुआ॥
अब वो गाँठ पक चुकी है ,
लहसुन की सी सड़ांध आती है उससे ,
बातें रिसने लगी है उससे ,
जो बातें जो नहीं बताई जानी थी और जो नहीं कहनी जानी थी , और भी , कुछ भी ,
कोई भीड़ जमा हो चुकी है उन्हें सुनने को ,
शहर के उस हिस्से में लगने लगा है अब जाम ,
हवा का भी आवागमन बंद है ,
और कोई आवाज़ भी अब बमुश्किल पहुँचती है वहां ,
साँस लेना भी मुश्किल हो रहा है ,
समझ नहीं आता कुछ ॥
ठूंठ बनने से पहले ,
याद आती है फिर से कभी कभी उन वादों की ,
समझ नहीं आता ,कैसे खुले ये गाँठे ,
खुली हवा का स्वाद लेने की तड़प तो कई दफा उठती है ,
पर वो साँसे अब दम तोड़ चुकी है ॥ ..............................
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