Oct 16, 2013

जब तुमने वो गुलाब लिया था ,
सिर्फ मैं ही नहीं अनुगृहित हुआ था ,
वो गुलाब भी हुआ था ,
वो पौधा , अगर उसे पता चलता , कोई वृक्ष सा जा फूलता , हर पत्ता गुलाब हो जाता ,
वो बगीचा कुछ और स्वीकार नहीं करता फिर , सिर्फ गुलाब लगते वहां पर ॥

मेरा कुछ देना मेरा प्रेम था ,
तुम्हारा स्वीकार करना तुम्हारा प्रेम ,
दोनों वस्तुतः त्याग थे ,
लेना देना यहाँ गोण था , वो व्यवसाय माध्यम था , अभिव्यक्ति थी प्रेम की ,
हर व्यक्ति के अनोखे होने के साथ ही उसका प्रेम व्यवहार भी अनोखा होता है .
जितने लोग होते हैं प्रेम भी उतने ही प्रकार का होता है ॥

खाने वाला बनाने वाले जितना ही पूज्य था हर बार ,
जब भी आपसी सम्मान उन्हें जोड़ता था ,
खाने वाले की तुष्टि खिलाने वाले का धन था ,
बनाने वाले का मन खाने वाले का धन ॥

चाहत कोई खालीपन सी होती है ,
तब तक , जब तक उसे कोई और समझना नहीं चाहता ,
जब कल्पना के उस रिक्त चित्र को समझ कर उसमें कोई अपने रंग भरता है ,
तो वो आकाश में फ़ैल जाते हैं ,
कुछ यूँ आपसी प्रेम की दुनिया रंगीन हो जाती है ,
की गिले शिकवों की विगत सभी लकीरें लुक जाती हैं ,
तब आकाश के भीतर और कोई आकाश नहीं रहता ,
आकाश का बाहर समाप्त हो जाता है ,
सृष्टि अनुग्रह नज़र आती है , सम्मान का सूरज चमकने लगता है ,
और बारिश होती है ,
बारिश स्वच्छता की , प्रसन्नता की , स्फूर्ति की ,
अंतःकरण अब अंतस से मुक्त हो महकता है ,
और वो खुशबू गुलाब सी होती है ॥ ....................................... अ-से अनुज ॥

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