गैलिलियो उछल पड़ा , पृथ्वी गोल है ,
कोपरनिकस प्रमाणित हुआ ,
अरस्तु का भूत अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त था ,
और उसने वहीँ से हाथ हिला कर अपनी प्रसन्नता जाहिर कर दी,
गैलिलियो ने भी अपने स्थान से ही उसके प्रतिकार में आभार प्रकट कर दिया ।
कोपरनिकस प्रमाणित हुआ ,
अरस्तु का भूत अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त था ,
और उसने वहीँ से हाथ हिला कर अपनी प्रसन्नता जाहिर कर दी,
गैलिलियो ने भी अपने स्थान से ही उसके प्रतिकार में आभार प्रकट कर दिया ।
जब मैंने उसे बताया था , पृथ्वी के कोनों के बारे में ,
उसने चाँद को देखकर मेरी बात अनसुनी कर दी थी ,
मेरे दिए गए द्विविमीय चित्रों में सामर्थ्य न थी
जीवन की सारी दिशायें उसे दिखा पाना ,
और ना ही उसने जीवन की गहन सघन दिशाओं में झांकना जरूरी समझा ,
जाने क्या जिद थी , जाने किस हिसाब में उलझा रहना था ॥
उसने चाँद को देखकर मेरी बात अनसुनी कर दी थी ,
मेरे दिए गए द्विविमीय चित्रों में सामर्थ्य न थी
जीवन की सारी दिशायें उसे दिखा पाना ,
और ना ही उसने जीवन की गहन सघन दिशाओं में झांकना जरूरी समझा ,
जाने क्या जिद थी , जाने किस हिसाब में उलझा रहना था ॥
हाँ , मैं , मैं भूल ही गया बताना , मैं दिग्दर्श ।
गुरु बृहस्पति के मिले शाप से अभिशप्त मैं
सदियों से विचर रहा हूँ पृथ्वी पर ,
मुझे नहीं जाना था कहीं कभी इसे छोड़ कर ,
मुझे नहीं पसंद था अपना आकर खोना
मैं अपने दम - क़दम पर चलने का शौक़ीन ,
एक एक कदम संभल कर चलता रहा हूँ , निहारते हुए इसे , सदियों से
मैंने देखा है यहाँ सभ्यताओं को बनते बिगड़ते ,
विशालकाय जीव मेरे सामने से होकर गुज़र गए ,
उन्हें अंदाजा न था पृथ्वी के छोरों का ,
वो रुके नहीं , अंत तक ,
उनका दुस्साहस सीमा से परे हो गया था ,
और वो गिरा दिए गए इस ज़मीन से ,
उन्हें लगता था ये भी अनंत है आकाश की तरह ,
पर पृथ्वी सीमित थी , जैसी आज भी है ,
और वो इसकी हदों के आगे एक कदम रखते ही गिर गए , अन्धकार में ।
गुरु बृहस्पति के मिले शाप से अभिशप्त मैं
सदियों से विचर रहा हूँ पृथ्वी पर ,
मुझे नहीं जाना था कहीं कभी इसे छोड़ कर ,
मुझे नहीं पसंद था अपना आकर खोना
मैं अपने दम - क़दम पर चलने का शौक़ीन ,
एक एक कदम संभल कर चलता रहा हूँ , निहारते हुए इसे , सदियों से
मैंने देखा है यहाँ सभ्यताओं को बनते बिगड़ते ,
विशालकाय जीव मेरे सामने से होकर गुज़र गए ,
उन्हें अंदाजा न था पृथ्वी के छोरों का ,
वो रुके नहीं , अंत तक ,
उनका दुस्साहस सीमा से परे हो गया था ,
और वो गिरा दिए गए इस ज़मीन से ,
उन्हें लगता था ये भी अनंत है आकाश की तरह ,
पर पृथ्वी सीमित थी , जैसी आज भी है ,
और वो इसकी हदों के आगे एक कदम रखते ही गिर गए , अन्धकार में ।
गेलिलियो जानता नहीं था समय की गणित ,
उसने हिसाब समझाया , धर्म की समझ में ना आया ,
उसने हिसाब समझाया , न समझते हुए भी छात्रों ने सहमती में सर हिलाया ,
प्रमाणित हुआ , जो नहीं होना चाहिए था ,
उन्होंने कुछ न छोड़ा , कोई भी कोना नहीं ,
प्रमाण एक गन्दी आदत है ,
बमुश्किल ही कोई छोड़ पाता है , कोई आत्मसाक्षी ही ।
उसने हिसाब समझाया , धर्म की समझ में ना आया ,
उसने हिसाब समझाया , न समझते हुए भी छात्रों ने सहमती में सर हिलाया ,
प्रमाणित हुआ , जो नहीं होना चाहिए था ,
उन्होंने कुछ न छोड़ा , कोई भी कोना नहीं ,
प्रमाण एक गन्दी आदत है ,
बमुश्किल ही कोई छोड़ पाता है , कोई आत्मसाक्षी ही ।
सोचो की ये दुनिया स्वप्न है और तुम चलते हो इसमें
पैरों के तले से जमीन को छूकर ,
दौड़ते हो अलग अलग दिशाओं में , निगाहें उठाकर ,
निगाहें घुमाकर देखते हो सबकुछ ।
पैरों के तले से जमीन को छूकर ,
दौड़ते हो अलग अलग दिशाओं में , निगाहें उठाकर ,
निगाहें घुमाकर देखते हो सबकुछ ।
वास्तव में पृथ्वी का समतल होना ही दिशाओं का ज्ञान है
चित्त सघन का भान , अपने पैरों पर खड़ा होना ,
जिन्हे पृथ्वी गोल लगती है उनकी भी जमीन समतल ही है
पर उन्हें ऊपर और नीचे का अंतर नहीं ज्ञात होता ,
ना दायें और बाएँ का और ना ही भीतर और बाहर का !
चित्त सघन का भान , अपने पैरों पर खड़ा होना ,
जिन्हे पृथ्वी गोल लगती है उनकी भी जमीन समतल ही है
पर उन्हें ऊपर और नीचे का अंतर नहीं ज्ञात होता ,
ना दायें और बाएँ का और ना ही भीतर और बाहर का !
मैं जब सिमट जाता हूँ तो ये कुछ नज़र नहीं आता ॥
ठोस शून्य , पूर्ण स्थिर , निराकार , तब कुछ विचार में नहीं आता ,
और आकार को अस्थिरता का खतरा होता है ,
तब जब ज़मीन का अनुभूतण हुआ , जल से ,
जो की सब जगह समाई ऊष्मा से उत्पन्न हुआ था ,
तब वो जल की गति के कारण अस्थिर और डगमगाई रहती थी , किसी बच्चे की तरह ,
इसको स्थिर रखने का कार्यभार एक नाग ,चार हाथियों और एक कछुए को सोंपा गया ।
ठोस शून्य , पूर्ण स्थिर , निराकार , तब कुछ विचार में नहीं आता ,
और आकार को अस्थिरता का खतरा होता है ,
तब जब ज़मीन का अनुभूतण हुआ , जल से ,
जो की सब जगह समाई ऊष्मा से उत्पन्न हुआ था ,
तब वो जल की गति के कारण अस्थिर और डगमगाई रहती थी , किसी बच्चे की तरह ,
इसको स्थिर रखने का कार्यभार एक नाग ,चार हाथियों और एक कछुए को सोंपा गया ।
नाग , अगत्य था , विगत हर प्रलय में शेष था ,
उसकी स्थिरता पर किसीको संदेह न था , वो अच्छा आधार हुआ ,
उसने आकाशीय चेतना में विचरते , वायु विचारों के, ऊष्म प्रवाह से उत्पन्न
तरल भावों के सूखने से सृष्ट , पृथ्वी को और आगे
अन्धकार मय अस्थिर परिदृश्य में जाने से भलीभांति रोक लिया ,
उसे सब और से लपेट कर वहीँ सीमित कर दिया ,
चेतना अन्धकार में तरह तरह के कष्ट पाती है , स्वप्न मूर्छा में घिरने लगती है ,
जब तक की उसे अन्धकार से उठने की सुध नहीं आती
और सुकून की सीमान्त धरा की शरण नहीं मिल जाती ।
उसकी स्थिरता पर किसीको संदेह न था , वो अच्छा आधार हुआ ,
उसने आकाशीय चेतना में विचरते , वायु विचारों के, ऊष्म प्रवाह से उत्पन्न
तरल भावों के सूखने से सृष्ट , पृथ्वी को और आगे
अन्धकार मय अस्थिर परिदृश्य में जाने से भलीभांति रोक लिया ,
उसे सब और से लपेट कर वहीँ सीमित कर दिया ,
चेतना अन्धकार में तरह तरह के कष्ट पाती है , स्वप्न मूर्छा में घिरने लगती है ,
जब तक की उसे अन्धकार से उठने की सुध नहीं आती
और सुकून की सीमान्त धरा की शरण नहीं मिल जाती ।
पर धरती अभी भी बैचेन थी ,
उसे धीरज दिलाने के लिए , नाग के ऊपर महासंयमी कूर्म को जगह दी गयी ,
कूर्म जो कठोर तप है सघन ऊष्मा लिए हुए ,
और पृथ्वी थोड़ी और सिमट कर सघन हुयी ,
चेतन हृद में अभी अभी कूर्म नाड़ी का निर्माण हुआ ,
और पृथ्वी अपनी जगह स्थिर हो गयी ,
और तभी मुझे भी निमंत्रणा गया , दिशाओं का ध्यान रखने के लिए ,
और तब चार कोनों में महाविवेकी चार गज चौकीदार हुए ,
दिग्गज , दिशाओं के हाथी , जो दिशाओं में चेतना के संयम से जन्मे ,
दिशाओं के अंतिम छोर हैं , और अंत से मुख्य द्वार रक्षक ,
एक पूर्व में घटित कहानियाँ सुनाता है ,
तो पश्चिमी अनुमानित सार बताता है ,
उत्तर और दक्षिण की और के हाथी सिर्फ सुनते हैं ,
और उसमें से अपने अपने विवेक के अनुसार भाग्य और पुरुषार्थ का निर्णय करते हैं ,
चारों हाथी बहुत अच्छे मित्र हैं , दिनभर बतियाते हैं , पूर्व वाला पश्चिम का और वाम दक्षिण का प्रिय है ,
बड़ी ही ख़ामोशी से , बहुत दूर से संप्रेक्षण करते पृथ्वी पर श्रुतियाँ बरसाते हैं ।
उसे धीरज दिलाने के लिए , नाग के ऊपर महासंयमी कूर्म को जगह दी गयी ,
कूर्म जो कठोर तप है सघन ऊष्मा लिए हुए ,
और पृथ्वी थोड़ी और सिमट कर सघन हुयी ,
चेतन हृद में अभी अभी कूर्म नाड़ी का निर्माण हुआ ,
और पृथ्वी अपनी जगह स्थिर हो गयी ,
और तभी मुझे भी निमंत्रणा गया , दिशाओं का ध्यान रखने के लिए ,
और तब चार कोनों में महाविवेकी चार गज चौकीदार हुए ,
दिग्गज , दिशाओं के हाथी , जो दिशाओं में चेतना के संयम से जन्मे ,
दिशाओं के अंतिम छोर हैं , और अंत से मुख्य द्वार रक्षक ,
एक पूर्व में घटित कहानियाँ सुनाता है ,
तो पश्चिमी अनुमानित सार बताता है ,
उत्तर और दक्षिण की और के हाथी सिर्फ सुनते हैं ,
और उसमें से अपने अपने विवेक के अनुसार भाग्य और पुरुषार्थ का निर्णय करते हैं ,
चारों हाथी बहुत अच्छे मित्र हैं , दिनभर बतियाते हैं , पूर्व वाला पश्चिम का और वाम दक्षिण का प्रिय है ,
बड़ी ही ख़ामोशी से , बहुत दूर से संप्रेक्षण करते पृथ्वी पर श्रुतियाँ बरसाते हैं ।
उस दिन पृथ्वी पर काला दिन घोषित हुआ ,
भविष्य अन्धकार मय होने वाला था ,
क्योंकि एक मेंढक ने अपने कुएं को दुनिया सिद्ध कर दिया था ॥
अ से
भविष्य अन्धकार मय होने वाला था ,
क्योंकि एक मेंढक ने अपने कुएं को दुनिया सिद्ध कर दिया था ॥
अ से