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Jan 23, 2015

गैलिलियो उछल पड़ा , पृथ्वी गोल है ,
कोपरनिकस प्रमाणित हुआ ,
अरस्तु का भूत अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त था ,
और उसने वहीँ से हाथ हिला कर अपनी प्रसन्नता जाहिर कर दी,
गैलिलियो ने भी अपने स्थान से ही उसके प्रतिकार में आभार प्रकट कर दिया ।
जब मैंने उसे बताया था , पृथ्वी के कोनों के बारे में ,
उसने चाँद को देखकर मेरी बात अनसुनी कर दी थी ,
मेरे दिए गए द्विविमीय चित्रों में सामर्थ्य न थी
जीवन की सारी दिशायें उसे दिखा पाना ,
और ना ही उसने जीवन की गहन सघन दिशाओं में झांकना जरूरी समझा ,
जाने क्या जिद थी , जाने किस हिसाब में उलझा रहना था ॥
हाँ , मैं , मैं भूल ही गया बताना , मैं दिग्दर्श ।
गुरु बृहस्पति के मिले शाप से अभिशप्त मैं
सदियों से विचर रहा हूँ पृथ्वी पर ,
मुझे नहीं जाना था कहीं कभी इसे छोड़ कर ,
मुझे नहीं पसंद था अपना आकर खोना
मैं अपने दम - क़दम पर चलने का शौक़ीन ,
एक एक कदम संभल कर चलता रहा हूँ , निहारते हुए इसे , सदियों से
मैंने देखा है यहाँ सभ्यताओं को बनते बिगड़ते ,
विशालकाय जीव मेरे सामने से होकर गुज़र गए ,
उन्हें अंदाजा न था पृथ्वी के छोरों का ,
वो रुके नहीं , अंत तक ,
उनका दुस्साहस सीमा से परे हो गया था ,
और वो गिरा दिए गए इस ज़मीन से ,
उन्हें लगता था ये भी अनंत है आकाश की तरह ,
पर पृथ्वी सीमित थी , जैसी आज भी है ,
और वो इसकी हदों के आगे एक कदम रखते ही गिर गए , अन्धकार में ।
गेलिलियो जानता नहीं था समय की गणित ,
उसने हिसाब समझाया , धर्म की समझ में ना आया ,
उसने हिसाब समझाया , न समझते हुए भी छात्रों ने सहमती में सर हिलाया ,
प्रमाणित हुआ , जो नहीं होना चाहिए था ,
उन्होंने कुछ न छोड़ा , कोई भी कोना नहीं ,
प्रमाण एक गन्दी आदत है ,
बमुश्किल ही कोई छोड़ पाता है , कोई आत्मसाक्षी ही ।
सोचो की ये दुनिया स्वप्न है और तुम चलते हो इसमें
पैरों के तले से जमीन को छूकर ,
दौड़ते हो अलग अलग दिशाओं में , निगाहें उठाकर ,
निगाहें घुमाकर देखते हो सबकुछ ।
वास्तव में पृथ्वी का समतल होना ही दिशाओं का ज्ञान है
चित्त सघन का भान , अपने पैरों पर खड़ा होना ,
जिन्हे पृथ्वी गोल लगती है उनकी भी जमीन समतल ही है
पर उन्हें ऊपर और नीचे का अंतर नहीं ज्ञात होता ,
ना दायें और बाएँ का और ना ही भीतर और बाहर का !
मैं जब सिमट जाता हूँ तो ये कुछ नज़र नहीं आता ॥
ठोस शून्य , पूर्ण स्थिर , निराकार , तब कुछ विचार में नहीं आता ,
और आकार को अस्थिरता का खतरा होता है ,
तब जब ज़मीन का अनुभूतण हुआ , जल से ,
जो की सब जगह समाई ऊष्मा से उत्पन्न हुआ था ,
तब वो जल की गति के कारण अस्थिर और डगमगाई रहती थी , किसी बच्चे की तरह ,
इसको स्थिर रखने का कार्यभार एक नाग ,चार हाथियों और एक कछुए को सोंपा गया ।
नाग , अगत्य था , विगत हर प्रलय में शेष था ,
उसकी स्थिरता पर किसीको संदेह न था , वो अच्छा आधार हुआ ,
उसने आकाशीय चेतना में विचरते , वायु विचारों के, ऊष्म प्रवाह से उत्पन्न
तरल भावों के सूखने से सृष्ट , पृथ्वी को और आगे
अन्धकार मय अस्थिर परिदृश्य में जाने से भलीभांति रोक लिया ,
उसे सब और से लपेट कर वहीँ सीमित कर दिया ,
चेतना अन्धकार में तरह तरह के कष्ट पाती है , स्वप्न मूर्छा में घिरने लगती है ,
जब तक की उसे अन्धकार से उठने की सुध नहीं आती
और सुकून की सीमान्त धरा की शरण नहीं मिल जाती ।
पर धरती अभी भी बैचेन थी ,
उसे धीरज दिलाने के लिए , नाग के ऊपर महासंयमी कूर्म को जगह दी गयी ,
कूर्म जो कठोर तप है सघन ऊष्मा लिए हुए ,
और पृथ्वी थोड़ी और सिमट कर सघन हुयी ,
चेतन हृद में अभी अभी कूर्म नाड़ी का निर्माण हुआ ,
और पृथ्वी अपनी जगह स्थिर हो गयी ,
और तभी मुझे भी निमंत्रणा गया , दिशाओं का ध्यान रखने के लिए ,
और तब चार कोनों में महाविवेकी चार गज चौकीदार हुए ,
दिग्गज , दिशाओं के हाथी , जो दिशाओं में चेतना के संयम से जन्मे ,
दिशाओं के अंतिम छोर हैं , और अंत से मुख्य द्वार रक्षक ,
एक पूर्व में घटित कहानियाँ सुनाता है ,
तो पश्चिमी अनुमानित सार बताता है ,
उत्तर और दक्षिण की और के हाथी सिर्फ सुनते हैं ,
और उसमें से अपने अपने विवेक के अनुसार भाग्य और पुरुषार्थ का निर्णय करते हैं ,
चारों हाथी बहुत अच्छे मित्र हैं , दिनभर बतियाते हैं , पूर्व वाला पश्चिम का और वाम दक्षिण का प्रिय है ,
बड़ी ही ख़ामोशी से , बहुत दूर से संप्रेक्षण करते पृथ्वी पर श्रुतियाँ बरसाते हैं ।
उस दिन पृथ्वी पर काला दिन घोषित हुआ ,
भविष्य अन्धकार मय होने वाला था ,
क्योंकि एक मेंढक ने अपने कुएं को दुनिया सिद्ध कर दिया था ॥

अ से 

Sep 16, 2014

" पोस्त-मणि "



शाम हो चुकी थी , बड़ी घबराहट के उसने बाहर आने की हिम्मत जुटाई ,
सूंघते नथूने , सब दिशायें तरेरती हुयी आँखें , किटकिटाते हुए दाँत और अति सक्रिय मस्तिष्क ,
वो छोटा सा चूहा कुछ देर पहले की घटना से अभी तक डरा हुआ था ,
जब उसने काल से दौड़ लगाकर पृथ्वी में बनी इस नन्ही सी गुहा इस बिल में शरण ली थी ,
जब से उसने दौड़ना सीखा था वो इसी तरह से दौड़ रहा था खुली हवा उसके लिए कभी सुरक्षित नहीं रही ,
दिन में बिल्लियों और रात में उल्लुओं के रूप में काल हर जगह उसे पहरा देते नज़र आता था !
सब ओर सुरक्षित वातावरण पाकर वो बाहर निकला और खाने कुतरने के लिए कुछ तलाश करने लगा ,
अभी वो कुछ दूर ही पहुंचा था कि उसे अपनी ओर दौडती हुयी दो आँखें नज़र आई ,
और वो सब कुछ भूल कर फिर से भागने लगा और भागते भागते एक कुटिया में घुस गया ,
जहाँ एक ऋषि अपने नित्य पाठ में व्यस्त थे , वो दौड़ कर उनकी ओट में दुबक गया !
ऋषि अपने कार्य में उत्पन्न व्यवधान से पहले तो क्रोधित हुए ,
पर फिर उस नन्हे से जीव को काँपता हुआ देखकर उन्होंने पूछा कि वो इतना भयभीत क्यूँ है ,
चूहा अपने पिछले दो पंजों पर खड़ा होकर हाथ जोड़कर बोला ,
" हे महात्मन मुझे मृत्यु से बड़ा भय लगता है और ये बिल्ली हमेशा ही मेरी ताक में बैठी रहती है ,
काश अगर मैं बिल्ली होता तो मैं निर्भय होकर अपना जीवन यापन कर पाता ! "
ऋषि बोले , " काल सभी के लिए मुँह खोले खड़ा है मृत्यू हर किसी को व्यापती है
बस सभी के लिए वो अलग अलग शक्ल लेकर आती है बिल्ली बनकर तुम्हें क्या फायदा होगा ! "
पर वो डरा हुआ चूहा सिर्फ इतना कह पाया की , हे महात्मन ! अगर संभव है तो आप इतनी कृपा कर दीजिये !
उस नन्ही सी बुद्धि को और अधिक ना समझाकर शरण में आये हुए की रक्षा का धर्म सोचकर उन्होंने कहा
कि हर वक़्त तो मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रख सकता पर अगर बिल्ली बनने से तुम अपनी रक्षा में समर्थ हो , तो तथा अस्तु !
और अभिमंत्रित जल के कुछ छींटे पड़ते ही वो चूहा बिल्ली बन ख़ुशी ख़ुशी कुटिया से बाहर चला गया !
बिल्ली बनने के पश्चात् उसका स्वभाव उसकी क्रियाशीलता और उसकी इच्छाएं बदल चुकी थी ,
वो अपने को ज्यादा सजग , फुर्तीला और चतुर महसूस करने लगा और वहीँ कुटिया के आसपास छोटे मोटे जीवों को खाकर रहने लगा ,
कुछ दिन सुकून से गुजारने के बाद एक दिन उसने अपनी और गुर्राते हुए एक जीव और दो गुस्सायी हुयी आँखों को देखा ,
नज़रें मिलते ही वो कुत्ता उसकी और लपका और उसने अनायास ही खुद को पूरी जान से दौड़ता हुआ पाया ,
सामने फिर वही कुटिया पाकर उसने कुटिया में शरण ली और ऋषि से कहा की है भगवन् मुझे आप कुत्ता बना दें ,
बिल्ली होकर भी मैं काल के इस चेहरे से अत्यंत भयभीत हूँ !
मृत्यु को सामने पाकर आखिर किस सामान्य जीव की बुद्धि काम करती है ऐसा सोचकर ऋषि ने अबकी बार उसे ज्यादा कुछ ना समझाकर उसे कुत्ता बना दिया और वो वहां से बहुत खुश होकर चला गया !
एकांत में बैठकर जबकि आप समस्याओं के अधीन ना हों काफी दूर की दृष्टि साध सकते हो ,
पूरे जीवन काल को एक क्षण में लाँघकर उसके नतीजे पर विचार कर सकते हो ,
सुनी हुयी कहानियों और अनुभव के आधार पर अपने जीवन को दिशा देने का उपक्रम कर सकते हो ,
पर पल पल को जीते हुए जीवन के बदलते समीकरणों के साथ गति करना ,
संकल्पों और नियमों की सरल रेखा पर तो सामान्यतः असंभव ही है !
तब आप सिर्फ सामने आयी हुयी विभीषिकाओं को टालते हुए , पल दर पल अपने को समस्याओं से दूर रखते हुए जीते हो ,
और किसी भी तरह की मृत्यु को टालते रहना ही जीवन का उपक्रम बना लेते हो !
आगे उस कुत्ते का जीवन जंगली सूअर और फिर क्रमशः बन्दर भालू और हाथी द्वारा बाधित हुआ ,
और हर बार वो ऋषि से प्रार्थना कर अपने को अगले रूप में बदलता रहा ,
ताकि मृत्यु का उसका भय कम हो और वो चैन से जीवन व्यतीत कर सके !
हाथी बनने के बाद वो खुद को बहुत भारयुक्त महसूस करने लगा ,
समय उसको बढ़ा हुआ महसूस होता और वो काफी शान्ति भी अनुभव करता था ,
कभी कभी वो मस्ती में आकर झूमता और वन में दौड़ता भी था ,
पर बाघ और सिंह जैसे हिंस्र पशुओं से अब भी उसे भय रहता ,
और फिर ऋषि की सहायता से वो खुद भी एक हिंसक शेर में बदल गया ,
कुछ समय उसने बिना किसी की परवाह अपने जैसे हिंसक स्वभाव के जीवों के साथ व्यतीत किया !
एक दिन उस वन से एक पालकी गुजरी , कुछ लोग उसकी सुरक्षा के लिए साथ चल रहे थे ,
और तभी एक शेर की दहाड़ सुनाई दी , एक स्त्री ने पालकी से बाहर झाँक कर कुछ इशारा किया ,
कुछ लोग अपने भाले और तीरों के साथ उस दिशा में गए जहाँ से वो आवाज़ आई थी ,
और उस शेर को तीरों और बरछों से भेद कर पकड़ कर ले आये ,
तब इस दृश्य को देखकर उस सिंह को भी अपनी मृत्यु नज़र आने लगी और उसने ऋषि के पास जाकर कहा ,
" हे महान ! आप मुझे एक स्त्री में बदल दें उसके एक इशारे पर इतना शक्तिशाली शेर भी मार दिया गया "
ऋषि को भी इस हिंस्र पशु से बेहतर उसका मनुष्य होना लगा और उसने उसे एक सुन्दर कन्या में बदल दिया ,
अपनी विद्या के प्रभाव से उसकी उत्पत्ति के कारण वो उसका धर्मपिता हुआ ,
और उसने मंत्रोच्चार के साथ उसका नामकरण किया " पोस्तमणि " !
पोस्तमणि इस रूप में आने के समय से ही एक सुन्दर तरुणी थी ,
मनुष्य बनने तक के सफ़र में वो अपना बहुत सा भय पीछे छोड़ आई थी और उन्मुक्त होकर हर पल को जीना चाहती थी ,
जीव जंतुओं के ह्रदय की उसको भली प्रकार थाह थी और वो उस वन में मुक्त स्वच्छंद विचरण करने लगी ,
जल्द ही उसके रूप लावण्य और गुणों की खबर उस वन से बाहर पहुँच गयी ,
कानों से मुँह तक आने के रास्ते में किसी बात के साथ कुछ और विशेषण जुड़ जाना सामान्य ही है
जो लोगों ने अपनी घ्राण शक्ति से पैदा किये होते हैं ,
और जितने कानों और मुँह वो बात गुज़र कर जाती है
उतने ही अलग अलग रंग और महक की कहानियाँ उसके साथ जुड़ जाती हैं !
उस कन्या की मोहक तस्वीर राजा तक इतनी अलग अलग जबानों से पहुँच चुकी थी
कि राजा अकहे ही उसके मोहपाश में पड़ चुका था ,
कुछ ही समय पश्चात् उसने उस वन की ओर रुख किया
और वहाँ पोस्तमणि को देखकर अपने ह्रदय की सभी उत्सुकताओं की पुष्टि कर ली ,
ऐसी चंचलता जो आँखों में समा नहीं पाए ,
ऐसा उन्मुक्त रूप जो ह्रदय को भारशून्य कर दे ,
ऐसे नर्म झोंके जिनमें होश संभाले ना संभले ,
और ऐसा आनंद जो बारिश में नाचता मयूर ही जानता हो ,
वो एकटक उसे देखता रहा अपनी स्वप्न मुग्धता तक !
होश सँभालने पर उसको नज़रों से ओझल पाकर राजा को अजीब सी बैचैनी खाने लगी ,
वो उसको तलाशता हुआ पास ही ऋषि की कुटिया तक पहुंचा ,
और उनको सब हाल बताकर उसने पोस्तमणि का हाथ मांग लिया ,
ऋषि के पास कन्यादान लेकर अपने पितृ धर्म से उऋण होने का मौका था ,
उन्होंने बस इतना कहा की शुरू से ये वन ही पोस्तमणि का घर रहा है तो नगरीय तौर तरीको में ये उतना सहज नहीं रह पायेगी
अतः इसका ख़ास ख़याल रखना और इसको किसी भी ईर्ष्या और भय से मुक्त रखना ,
ऐसा कहकर कुछ जल छिड़ककर पोस्तमणि का हाथ उस राजा के हाथ में देकर उन दोनों को आशीर्वचनों और स्वास्थ्य संपत्ति की मंगल कामनाओं के साथ विदा किया !
पोस्त मणि के भाग्य में स्थिरता नहीं थी , उसने इतने से जीवन में इतने जीवन और तरह तरह के भय देख लिए थे ,
राजा का उससे विशेष लगाव था और राजमहल में अधिकतर समय राजा उसी की साथ व्यतीत करने लगा ,
उसको अपने राजकाज और सामाजिकता में रूचि नहीं रह गयी थी , वो एक कमलिनी के प्रेम में डूबा हुआ वो भंवरा हो गया था जिसे अपनी स्वतंत्रता और जीवन की भी सुध ना रहे जिसके रात दिन उसी पुष्प मद में कैद होकर रह गए हों !
इस दौरान मंत्री राजा को कामकाज के प्रति आश्वस्त रखते रहे ताकि सत्ता से उसका ध्यान हटा रहे ,
और बाकी रानियाँ और राजा की प्रिय रही दासियाँ इस वनचरी से ईर्ष्या रखने लगी ,
एक दिन मौका पाकर उन्होंने पोस्तमणि के खाने में विष मिला दिया जबकि वो वन की ओर जाने वाली थी ,
विष पचा ना पाने के कारण पोस्तमणि की सुध जाने लगी और वो अंधी होकर एक कुँवे में गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गयी !
दिनभर में पोस्त मणि के वियोग में राजा के प्राण सूखने लगे , उसकी मृत्यु की खबर उसके गले से नीचे नहीं उतर रही थी ,
जिस जीवंत मुस्कान से मुरझाये हुए पौधे खिल उठते थे जिस के चेहरे से हमेशा पूर्णिमा की चांदनी छिटकती थी ,
जिस की खिलखिलाहट से भोर हुयी समझ पंछी चहचहाने लगते थे वो भला कैसे काल की अमावस के अँधेरे में खो सकती है !
कुछ और उपाय ना पाकर राजा ऋषि के पास जाता है और उन्हें सब बात बताकर कहता है
कि पोस्त मणि के बिना उसका जीवन अधूरा है उसके प्राण अधर में हैं और कुछ भी उपाय करके उसे जीवित कर दो ,
राजा को सांत्वना देकर ऋषि उस कुंवे की ओर जाते हैं और वहाँ पोस्तमणि की देह को पास की मिट्टी में दफ़न करवाकर
अभिमंत्रित जल छिड़क कर कहते हैं की अब यहाँ एक पौधा जन्म लेगा जिसमें सुन्दर फूल लगेंगे
और जिसका फल पोस्तमणि के जीवन रस को अपने में संचित करेगा ,
जीव जंतु इस रस के लालच में इसे खायेंगे और इस तरह इसके बीजों का परिवहन और अंकुरण होगा ,
और इस तरह पोस्टमणि उस पौधे की शक्ल में हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गयी !
आदतें सुबह की चाय की तरह होती है जो ना मिलने पर इंसान वो पाना तो चाहता है
पर उसके लिए किसी का क़त्ल या चोरी नहीं करता ना ही वो बैचैन होकर घूमता है
वो बस उस क्रिया की चाहत रखता है जो उसे माहौल में ढलने का थोडा वक़्त दे थोडा सुकून पहुंचाए ,
पर , निर्भरता अफीम की लत की तरह होती है जो ना मिलने पर क्षय का कारण बन जाती है
जिसके लिए उसका लती बैचैन हो जाता है हिंसक हो उठता है
जो उसे पाने के लिए चोरी और हत्या करने पर भी उतारू हो जाता है !
कहते हैं वही पौधा अफीम का पौधा है जिसके रस में पोस्तमणि के जीवन की कहानी संचित है
और जिसके सेवन से मनुष्य को अपने स्वभाव में कुछ वैसे ही परिवर्तन महसूस होते हैं
जैसे उस चूहे को क्रमशः बिल्ली कुत्ते ... सिंह बनकर हुए थे ,
और जिस पर इंसान उसी तरह निर्भर हो जाता है जैसे कि वो राजा हो गया था !
-------------------------------------------------------------------------------------- ( समाप्त ) 

Aug 25, 2014

लैलाssssssss


हवा का एक खाली सा झोंका सरसराया और एक आवाज़ आयी " लैलाssssssss " !


रेगिस्तानों में सदियों से दबी पड़ी है कई बंज़र दास्तानों की कब्रें ,
अरब की उन जमीनों को छूकर चलने वाली हवाएँ सुनाती हैं वो सज़ायें ,
जो मिली थी उन मजनूनों को ( मजनूं - madman - पागल ) ,
जो चले थे इश्क़ की राहों पर अनायास ही ,
खुदाई फरमानों से बेफिक्र आवामी अरमानों के खिलाफ !

बसरा के सरदार की बेटी मुस्कुरा रही थी ,
उसकी आँखों में ख़ुशी  की ऐसी चमक थी जैसे क्षितिज़ पर रोशनी की कोई लकीर हो ,
उन्हें सबक देने वाले वाले मौलवी की आँखें गुस्से से लाल थी और चेहरा तना हुआ ,
उन्होंने फिर दोहराया " कहो अल्लाह " ,
और अबकी बार के उनके ह बोलने में कोई रूहानी सुकून ना होकर एक खरखराता गला था ,
कैस मुस्कुराया , उसके चेहरे पर अभी भी निश्चिंतता थी और मन लहरों से भरा हुआ ,
मुंह से बोल निकले " लैला " !
मौलवी का सब्र टूट गया एक तो पढ़ने लिखने की उम्र में ये जलालत ऊपर से नाफ़रमानी और वो भी अल्लाह जैसे लफ्ज़ पर ,
यवन के सरदार के बेटे कैस को हाथ आगे करने के फरमान के साथ एक छड़ी ऊपर उठी ,
और हथेलियों पर उसके पड़ने की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आयी " लैला "
हर एक छड़ी के साथ लैला की हाथों से खून बहने लगा
शायद खुदको चोट पहुंचा कर उसने भी इस तकलीफ को अपना लिया था !

यवन और बसरा के सरदारों की आपस की पुरानी खींचतान थी ,
मौलवियों ने उन तक खबर पहुंचवाई थी की शहजादे कुछ और ही पाठ पढ़ रहे हैं ,
दोनों सरदारों को अपने लोगों और अपने कबीले में अपने नाम की परवाह थी ,
एक दुसरे पर लगाये आरोपों के साथ ही उन्होंने अपने बच्चों को भी नज़र करना सही समझा
कैस को लैला से अलग कर दिया गया और बचपन की इस लम्बी दोस्ती का एक दौर गुज़र गया !

वक़्त गुज़र जाते हैं पर उम्मीदें कहाँ मरती हैं
कितनी ही परछाइयाँ वो गुज़रे वक़्त की साथ लेकर चलती हैं ,
किसी बीज की तरह उडती हुयी  ठहरती हुयी  वो सही वक़्त के इंतेज़ार में रहती हैं
और अनुकूल जमी और नमी पाकर फूट पड़ती हैं !

कैस जवान हो चुका था तलवार और कलम दोनों से
और खुद ही के तय किये गए एक वक़्त पर उसने बसरा के सरदार तक लैला का हाथ मांगने का पैगाम पहुँचवाया ,
उसे शायद हमेशा से इंतेज़ार रहा था उस दिन का जब वो बसरा से गुज़रे और उसकी तलाश को आँखें मिले ,
पर ख़त का जवाब उसके बजाय उसके पिता तक पहुंचाया गया
जिसमें इस सम्बन्ध की मनाही के साथ उसे लैला से ना मिलने देने का फरमान भी था ,
पर हवाओं के बहाव सागर की लहरों और वक़्त के क़दमों पर कौन से फरमान कभी लगें हैं !

वक़्त गुज़रते जाते हैं और अतीत पर स्मृतियों की परतें चढ़ती जाती हैं
पर उन सूखी हुयी परतों के नीचे भी बहुत कुछ दबा रहता है जो हमेशा हरा रहता है !

कैस का बेपरवाह मिज़ाज़ लैला की आँखों में उसके सपनो में
और लैला के चेहरे का नूर कैस के दिल में उसकी शायरी में अब तक हरा था ,
दोनों का मिलना दो सदियों के जागते ख्वाबों का एक दुसरे में घुलना था
ऐसे ख्वाब जिनके किरदार एक दुसरे में बेख़ौफ़ आवाजाही करते थे !

कैस बिना किसी को बताये निकल पड़ा और लैला के इलाके तक पहुँच कर उसकी तलाश करने लगा ,
और वो वक़्त भी चल आया जो उसके लिए अब तक बैचैनी का सबब रहा था ,
लैला के चेहरे का प्यार भरा सुकून फिर से देखने का ,
पूरा अतीत आँखों में आकर ठहर गया और आँखें एक दुसरे को खामोशी से भरने लगी
पार्श्व में कोई दृश्य नहीं था और संसार एक मीठी शान्ति में तब्दील हो गया !

कितने ही कार्य हैं जिनका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता कितने ही सृजन हैं जो बस आनंद की पूर्णा से प्रेरित हैं
उद्देश्य के भीतर भी उद्देश्य हैं और कारणों की सुरंग भी अंतहीन है
पर जिसने अपने अस्तित्व का जो कारण मान लिया जो जिस उद्देश्य पर ठहर गया
उसी के साथ उसकी पूर्णता और उसी से उसके आनंद की प्रेरणा जुड़ी है !

दोनों संपन्न घरानों में उत्पन्न दुनिया से बेफिक्र ,
दोनों को बस एक ही खौफ दोनों की बस एक ही साध ,
आज उनके लिए वक़्त थम चुका था और हवाओं से ऊपर उनकी मौजें बह रही थी
पर बेपरवाह उडती चिड़ियाओं की परछाई का अँधेरा जमीन पर किसी की नज़रों में आ गिरा ,
लैला के भाई को ये मालूम हो चुका था और पुराने समझौते के बावजूद यूँ कैस का लैला से मिलना उसको मंजूर ना हुआ ,
उसकी तलवार कैस को ललकारने लगी नियम कायदे और अल्लाह के हवाले दिए जाने लगे ,
जो किस्सा एक के लिए जन्नती स्याही था वही किस्सा दुसरे के लिए दोज़ख का फरमान ,
किसी की चाहत किसी के लिए जुर्रत थी किसी का इश्क किसी के लिये लानत की बात ,
जब ललकार का कोई असर उनके इरादों पर ना हुआ तो तलवार हरकत में आ गई ,
पर ना लैला हटने को तैयार थी ना कैस को किसी का डर ,
गुस्से में कांपते हाथों के हमले पर सधे संयत हाथों का बचाव भारी पड़ गया ,
लैला का भाई अपनी ही तलवार से कैस के हाथों क़त्ल हो गया !

कुछ खबरें पंख लेकर ही पैदा होती हैं और पैदा होते ही अपने गंतव्य की ओर उड़ान भर लेती हैं ,
भारी भीड़ के बीच कैस को पकड़ लिया गया
और पंचायत का जो भी पर्याय उस दौर में हुआ करता था वहाँ तक मामला पहुँचाया गया ,
एक तो पुराने हुकुम की नाफ़रमानी दूसरा बेगुनाह का क़त्ल
और सब से ऊपर आसमानों के खिलाफ जाकर इश्क़ करने की जुर्रत ,
यही वो वाकिया था जिसको उदाहरण बनाया जा सकता था
एक मजनून् आज अल्लाह के कायदों को चुनौती दे रहा था ,
मौलवियों और बसरा के सरदार की चाहत पर
उसको बीच चौराहे मौत ना आने तक पत्थरों से मारे जाने की सज़ा तय हुयी !

उठी हुयी तलवार और तमंचों में तो फिर भी ईश्वर होता है
पर फेंके जाने वाले पत्थरों का कोई दिल ईमान नहीं होता

दूरियों के अँधेरे घिर चुके थे और हमेशा के लिए उन पर रात की मोहर लगने वाली थी ,
उम्मीद के आखिरी एक रास्ते पर लैला ने अपने पिता को राज़ी किया ,
जो चाहते थे की लैला की शादी वहाँ के राजकुमार इब्बन से करवायी जाए ,
कि अगर कैस को छोड़ दिया जाता है तो वो उनकी मर्ज़ी से इब्बन से शादी करने को तैयार है ,
कैस को लैला से फिर ना मिलने की चेतावनी पर उस शहर से बाहर छोड़ दिया गया !

लैला की शादी की ख़बर कैस को सुदूर रेगिस्तानों में ले गयी ,
वो वहाँ भटकता फिरता और लोग उसे मजनूं कहते ,
उसके शरीर पर जख्म थे कपडे फटे हुए ,
सूरज ढलने से सूरज ढलने तक वो रेगिस्तानों की धूल फांकता रहता ,
कभी वो सूखी लकड़ी से रेत पर कुछ लिखता नज़र आता तो कभी पत्थर से पत्थर पर कुछ कुरेदते ,
उसके घर वाले उसके वापस आने की हर उम्मीद उसे समझाने की हार में गँवा चुके थे ,
कोई जब कभी उन रेगिस्तानों से गुज़रता तो वहाँ खाने का कुछ सामान रख आता
और उसकी खबर के नाम पर कोई किस्सा ले आता !

" मैं फिरता हूँ इन रेगिस्तानों में
 उसकी यादों के साथ
 मेरे लिए उनके शहर बंजर हैं
 यहाँ उसका चेहरा साफ़ नज़र आता है "

जो कोई अपनी आत्मा में जितना गहरे तक जुड़ जाता है उसको बाहर संसार उतना ही बेमतलब नज़र आने लगता है ,
आपका मन जिस एक चीज पर पूरी तरह केन्द्रित हो जाए उसमें आपके प्राण बसने लगते हैं ,
जिस एक साध को लेकर आप जीने लगते हो बस उसी के संग आप साँस लेने लगते हो ,
एक लहर दूसरी लहर के संग रमने का आनंद लेने लगे तो उनके लिए बाकी संसार का प्रलय हो चुकता है ,
पर जब वो एक साध एक चीज एक ख्वाब ही आधार छोड़ देता है तो फिर कहीं कुछ नहीं बचता !

इस दौरान लैला इब्बन से शादी के बाद उसके महल चली गयी ,
वो लैला को मरा बताती और खुद को बस एक जिस्म कहती ,
कैस में उसके प्राण बसते थे जाने कोई जिद थी या कोई पागलपन पर इस बात ने इब्बन को खीज से भर दिया ,
अपने कुछ सैनिकों के साथ इब्बन उन रेगिस्तानों में पहुंचा जहाँ उसका गुस्सा अब तक साँस ले रहा था ,
पर एक विक्षिप्त से इंसान को बुरी हालत में देख कर उसे वहीँ मरने देना बेहतर समझ वो दूर से ही लौट आया ,
इधर लैला जो काफी बीमार रहने लगी थी तक जब ये खबर पहुँची की इब्बन कैस को ख़त्म करने रेगिस्तान की तरफ गए हैं ,
तो उसने दम तोड़ दिया , शायद उम्मीद के दरवाजे से कोई बारीक रोशनी झांकती थी मन में
जिसने अब तक साँसों की नाज़ुक डोर को हाथों में संभाल रखा था ,
और जिसके बंद होते ही अब वहाँ कुछ भी शेष नहीं था !

" उस इंसान की बंदगी का नाम था लैला
  जिसने अपने जिस्म अपनी साँसों की भी पनाह ना चाही "

उन्हीं रेगिस्तानों में लैला की कब्र बनायी गयी जिनमें वो मजनूं मारा फिरता था ,
आखिरी के दिनों में उस मजनूं को उसी मकबरे में उसकी कब्र के आस पास ही देखा गया ,
बताया जाता है उसने अपनी आखिरी कुछ कवितायें उसी मकबरे में एक पत्थर पर उकेरी थी ,

" मैं इन दीवारों के पास से गुज़रता हूँ
लैला की दीवारें
और मैं चूमता हूँ कभी इस दीवार को
कभी उस दीवार को
ये इन मकानों से प्यार नहीं
जिसने मेरा दिल ले लिया है
बल्कि उस एक से है जो इनमें बसी हुयी है "

और आखिर में एक दिन वो मजनूं वहीं पर सोया हुआ पाया गया
अनंतता की नींद में अपनी लैला के साथ !

अ से

Apr 2, 2014

The Thinker



उसी समय अपने घर के सभी दरवाजे बंद कर वहाँ दीवार लगा देता ,
जब ये आसान सा जान पड़ता सफ़र अगर ये बता देता की वो यूँ ही ख़त्म नहीं होता !!

तब तक कोई जल्दी नहीं थी मुझे , 
ना ही रूप परिवेश में कोई दिलचस्पी , 
तो आइना देखे बिना ही निकल पड़ा ,
अब लगता है काश वो ही देखा होता ...

दरवाजे के बाहर से गलियारे और मोहल्ले के छोर तक ,
हर दुआ सलाम करने वाले को मैंने प्यार से देखा ,
सफ़र बताया , रास्ता सलाहा , सर फिराया और फिर चल पड़ा ,
वो मुस्कुराए तो थे पर कुछ बता न पाए ,
शायद उन्हें अंदाजा भी न रहा होगा ,
जैसे मुझे ना था ,

सफ़र वास्तव में उतना मुश्किल नहीं था ,
जिनका उद्देश्य नितांत निश्चित था ,
उन्हें जल्द ही काम निपटा लौटते देखने की ,
और जो खासे बेईमान रहे थे अपने दिलों से
उनके भी अच्छी खासी दुनियादारी कमा
आधे रास्ते से ही लौट आने की कहानियाँ सुन चुका था मैं ,
मेरा कोई उद्देश्य भी था या नहीं
मुझे ध्यान नहीं आता ,
कुछ पाने की कभी कोई इच्छा भी नहीं रही ॥

तो मैं खालीपन के चौराहे पर ,
बिखरी हुयी बातों की सड़क को निहारता ,
उडती हुयी अफवाहों की गर्मी में ,
किसी भी आश्चर्य से अनजान खड़ा था ,
और तभी एक बेचैनी की तरह कोई बस आई ,
मेरी सोच का सफ़र शुरू हुआ ....

बस में मेरे अतीत के कई अलग अलग स्वभावों
और शक्ल की तरह के लोग थे ,
जो तरह तरह की धुन ओढ़े पहने ,
अपनी अपनी ढफलीयों पर गाते बजाते
और अपने ही गीत गुनगुनाते नज़र आते थे ,
कभी कभी कुछ दो चार की ताल बैठने लगती थी
पर ज्यादा देर तक नहीं ,
और अन्यथा ताल मिलाने का सबब ही न था ,
हाँ कुछ ताल ठोकते जरूर नजर आते थे ,

सब कुछ बातों का ही बना था ,
सब कुछ विचारों सा तैर रहा था ,
और उसमें एक समझ सा मैं रमने लगा ,
यही वो क्षण था जब मेरे खयाल में मेरा जन्म हुआ ,
शायद अभी तक तो मैं मेरे शांत घर की कोख में ही पल रहा था ,

" बस " अतीत के रास्ते पर बेतहाशा दौड़ने लगी
और बाहर के दृश्य धुंधलाने लगे ,
कुछ खासी यादें ही नज़र आती थी ,
और मैं रमने लगा ,
अब मुझे सहयात्रियों की चर्चाएं कुछ कुछ सुनाइ देने लगी ,
धर्म राजनीति खेल कूद और प्रेम
और न जाने किन किन विषयों के नदियाँ बह रही थी ,

मैं मन सा उनमें गोते खाने लगा ,
विषय विचार के बदलते ही भाव बदल से जाते थे ,
लोगों ने दल से बना लिए थे
और पक्ष विपक्ष की बातें होती थी ,
मुझे उनके हर पक्ष से इतर ,
कुछ न कुछ तो आसमान नज़र आता था ,
और मैं भी अपने बयान देने लगा ,
मेरे बयां किसी पक्ष में नहीं गए ,
वो जस की तस ,
कुछ नीरस और कुछ बहस रोकने की गुजारिश थी ,
तो कुछ अपनी ही दर्शन अभिव्यक्ति ,
और वो ऐसे में अपना हुल्लड़ छोड़ देने को कतई तैयार नहीं थे
मुझे या तो दोनों ही पक्ष सही और समान लगते थे
या फिर दोनों ही बेमायनी ,
पर उनके राग न मिलते ,
हाँ द्वेष कुछ एक सरीखे थे ,
तीसरे पक्ष की आलोचना पर वो एकमत से नज़र आते थे ,
मेरी कुछ बातों से वो प्रभावित होते तो थे ,
पर अपना पक्ष और ना जाने क्या खो देने के डर से पकडे रहते थे ,
वो अपनी अपनी मौज मस्तियों में डूबे हुए ,
बेतहाशा गाते हँसते और खुश रहते ,
कुछ स्वभाव मेरी ही तरह शांत थे ,
मेरे वक्तव्यों के समर्थन भी करते ,
पर उन्होंने किसी बेनतीजा बहस की उतपत्ति ,
और उसे बनाये रखने का कारण नहीं बनना चाहा ,
फिर भी जाने क्यों वो मुझे भाये ,
और कुछ एक ही सी बातों की मिठास भी फैली ,
मेरी ही बात को वो अपने ही अंदाज़ में किसी और तरह कहते ,
और उनकी ही किसी बात को मैं ,
सच कहूँ तो मुझे वो दो चार मानस ही सम समर्थ नजर आए ,
अन्य शोक और आशा के भंवर में फंसे हुए ॥

" और वो ही लोग आपको सच्चे लगते हैं जो आपके ही पक्ष में बोलें ,
फिर चाहे आप किसी पक्ष में हों किसी विपक्ष में या उदासीन "

" हर कोई अपनी ही मान्यताओं के प्रमाण तलाशता है ,
और जो कुछ सुनना चाहता है वही सुनता है ,
इसी से उसके अहम् को संतुष्टी मिलती है ,

" उदासीनता के पक्षी केंद्र की ओर उड़ान भरना पसंद करते हैं ,
इसके विपरीत सुख जैसे भावों की चाह रखने वाले ,
बाहर आकाश में पंख मारते भटकते फिरते हैं "

हर वृत्त के अन्दर वृत्त और उसके बाहर वृत्त की एक स्थिति है ,
और अब तक मुझे पता लग चुका है ,
की सोच और बहस के सफर में इन वृत्तों से बाहर नहीं निकला जा सकता ,
इन वृत्तों की खासियत ये है की ,
वक्रता त्रिज्या बढने के साथ ही ये उथले ,
और घटने पर गहरे व्याप्त और सूक्ष्म हो जाते हैं ,
पर निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता ॥

समय गुजरने लगा , रात अन्धियाने लगी ,
अपने अपने टिफ़िन खा चुकने पर कुछ स्वभावतः सो गए ,
कुछ सफ़र में छूट गए और कुछ अँधेरे में डूब गए ,
कुछ इतने गहरे चले गए की फिर नज़र न आये ,

और उस वक़्त पहली बार ,
मैं कोई भीड़ नहीं था ,
तब आप मुझे अकेला कह सकते हो ,
इतनी बातों , किस्सों , कहानियों ,
लोकोक्ति , मुहवारों , सीख , समझों की श्रुतियों के साथ ,
उस सफ़र पर मेरा वास्तविक सफ़र शुरू हुआ ,
और पहले दफा की ख़ामोशी में मुझे नींद आ गयी ,
बस के नाईट लैंप का रैंडम टाइमर सक्रीय हुआ ,
स्वप्नमय संसार में कोई रौशनी मुझे फिर से उसी सफ़र पर ले चली ,
मैं निर्णय , निश्चय , तत्व , मंजिल ,
उद्देश्य के रास्तों पर बेवजह भटकने लगा ,
रात गुज़र गयी ,
सुबह मैं फिर से उसी बस में था ,
थोडा और बेबस ॥

सोच के सफ़र में यात्रा करना और लौट आना दो अलग अलग चीजें है ,
इसके चलते इसके यात्री एक समय बाद रूप और भाव भी बदल लेते हैं ,
वोंग कार वाई की यादों की ट्रेन की तरह ये बस भी बस चलती रहती है ,
नो एस्केप का हॉर्न बजाते हुए ॥

कभी कभी इनसे बाहर झाँकने का सौभाग्य और अनुभव तो मिलता है , पर सब क्षणिक ,
मैंने कई किस्से कहानियाँ सुने हैं , जो केंद्र की तरफ एक दरवाजा बताते हैं ,
जिसकी तरफ अधिकतर उदासीन पक्षी जाते हैं , पर वो अदृश्य निर्जीव बिंदु है ,

और दूसरी तरफ मोह की बढती वक्रता , पागलपन का रूप लेने लगती है ,
ममत्व के किनोरों पर , अहम् की ऊँचाइयों से बने ये वृत्त ,
एक सर्पिलाकार सीढ़ीनुमा जाल बना लेते हैं ,
और इस सबके बीच में कहीं खो गया हूँ मैं .... //

अ-से

Mar 11, 2014

पोटली

आते वक़्त ही माँ ने दी थी एक पोटली ... 
और कहा था अपना ख़याल रखना , 
पोटली से ज्यादा जरूरी तुम हो मेरे लिए ...

वक़्त के रास्ते मैं निकल पड़ा , 
जो भी मिला राह में ,
जैसा भी लगा ,
उस पर शब्द संज्ञाएँ चिपका ,
मैं पोटली अपनी भरता रहा ..

पोटली के अन्दर ,
रच बस गयी थी ,
एक अनोखी ही दुनिया ,
सामान जुड़ने लगे आपस में ,
और तंत्र आकार लेने लगा ,
पुराने सामान जडें जमा बैठे ,
और नए सामान जमाये जाते ,
उनकी सहूलियत अनुसार ,
जिन्हें अपनी जगह बनानी आती ,
उन्होंने संगठन बना लिए ,
वहां अक्सर चर्चाएं होती रहती ,
और सामानों पर विशेषणों की छाप भी लगने लगी ...

यूँ ही चलते चलते जब मैं थक जाता ,
या मार्ग निर्धारण करना होता ,
तो उसमें झाँक कर देख लेता ...

पहले सब कुछ उसमें आसानी से आ जाता था ,
और चलने पर चीजें उलटती पलटती रहती ,
पर बाद में चीजों की हवा बाहर निकली जाने लगी ,
पोटली के कपड़े से ,
और गतिहीनता के कारण उनमें शुद्धता नहीं रह गयी ,
फिर वो ठंडी भी होने लगी ,
क्योंकि गर्म वस्तुएं ज्यादा जगह घेरती हैं ,
और बाद में सूख कर जमने लगी ,
अब उनमें रस भी बाकी नहीं रहा ,
नए आने वाले सामान भी फिर ,
इस सिस्टम के अनुसार ढलने लगते ...

सघनता काफी बढ़ चुकी थी ,
और पोटली भारी होने लगी ,
अब वो इधर उधर से फट भी चुकी थी ,
कई चीजें राह में ही कहीं बिखर चुकी थी ,

एक दिन उदासी के घेरे में ,
मैं पीपल के के नीचे बैठ ,
अपनी पोटली निहारने लगा ,
देखा तो उसमें कुछ ही सामान साबुत बचे थे ,
जो की भीतर कहीं दबे थे ,
ऊपर के कुछ टूटे फूटे से ,
और बाकी सब सिर्फ धूल और मिट्टी ...

मुझे दिखने लगा आगे ...
एक दिन पोटली फट जानी है ,
और ये सब बिखर जाने वाला है ,
सारे अनुभव और स्मृतियाँ हो जाने हैं मिटटी ,
और तब ,
मेरी यादों की पोटली मुझे ही छोड़ देनी है ,

आगे रह जाएगा सिर्फ ये रास्ता ,
जो हर बार रह जाता है ,
पर परवाह नहीं अब ,
आखिर माँ ने कहा था मैं ज्यादा जरूरी हूँ उनके लिए !!

अ-से

Feb 19, 2014

" The Facebook School "





.....................................

रात्रिकालीन कक्षा थी .....
सभी बच्चे अपने अपने अपने होमवर्क से मुक्त हो हर रोज की तरह ,
यहाँ बैठे आपस में बतिया रहे थे , कि
दर्शन शास्त्र के प्रोफेसर साहब के क़दमों की आहट हुयी ,
उनके आते ही बातचीत खुसफुसाहट में बदल कर एक गहन शांति में तब्दील हो गयी ,
शब्दों को अगर रंग कहें तो वहां कृष्ण रंग भर गया ...

वो अपने हाथो में पकडे हुए एक गुलाब को घूरते हुए से आये ,
कुछ देर खामोश रहे ... और बोले ...
देखो इस गुलाब को ध्यान से देखो ... इसके प्राकृतिक सौन्दर्य को निहारो ...
इसके रंग इसके आकार इसके गुणों को देखकर बताओ की ये प्रकृति की कौनसी अभिव्यक्ति है ,
इसके माध्यम से प्रकृति क्या कहती है ... चेतना में ये कैसी गंध बिखेरता है आखिर ....

सभी बच्चे गर्दन मोड़ घुमा एक दुसरे की तरफ देखने लगे ,
तब एक बच्चा खड़ा हुआ और हिम्मत करके बोला ...

गोरिल्ला फिंगा : अब मैं तो गलती से यहाँ आ गया ... मैं तो इधर से गुजर रहा था ... दा को देखा तो इधर मुड़ गया ... सच कहता हूँ !!

अध्यापक : कोई बात नहीं , दर्शन तो सबके लिए एक सा ही है पर फिर भी सब अपनी अपनी दृशी शक्ति से उसे अलग अलग देख कर अपने स्वभाव अनुसार ही तो व्यक्त करते हैं , तो बताओ तुम इसे देखकर ... क्या महसूस होता है !!

गोरिल्ला फिंगा : ( है भोले कहाँ फंसा दिया ) इस संसार में निर्गुण सगुन सृष्टि सृष्टा ... कुछ नहीं है ... कुछ भी नहीं .. सिर्फ और सिर्फ भाव है , एक ही विशुद्ध चेतना से निकले हुए , सर !!
तो मुझे तो यह फूल भी बहुत भोला ही लग रहा है , मुझे लगता है जब मैं इसे देख रहा हूँ तब कहीं किसी और जगह शायद किसी पेरेलल यूनिवर्स में गुलाबों का एक बगीचा खिल आया होगा !!

सभी बच्चे खिलखिलाने लगे ... अध्यापक उन्हें शांत होने का इशारा करने लगे ,

गोरिल्ला उनकी ओर मुड़कर बोला : अब हँस क्यूँ रहे हो बे ,
सकपका रहा है भेजा , लगता तो जो भी है अब तुमसे क्या छुपाना है !!

तब अध्यापक ने एक अन्य छात्र की और इशारा किया , और वो खड़ा हुआ ...

मुकेश चन्द्र पाण्डेय : सर , मैं तो इसकी खुशबू से ही खुश सा होने लगा हूँ , मैं तो इसकी महक में ही खो जाऊँगा , क्या फूल है सर ,
मैं तो इसी की जीवनी लिख देना चाहता हूँ ... मैं आज इसे देखकर बहुत इन्स्पायर हुआ हूँ और जिंदगी भर इसकी खुशबू पर लिखता रहूँगा !!

अध्यापक : वो तो ठीक है बेटा पर तुम्हे इसे देखकर क्या लगता है क्या कहता है ये ??

तभी दरवाजे से एक और बच्चा कक्षा में प्रवेश करता है और मस्त क़दमों से बढ़कर कहता है ....

दर्पण साह : गुलाब अपने समस्त काँटों के बावजूद " इजीयेस्ट टू होल्ड इन हैण्ड " और अपनी अप्रतिम सुन्दरता के बावजूद " हार्डेस्ट टू गिव टू समवन " है !! मैं इसे प्रेम में पड़े किसी व्यक्ति की सोच " she loves me , she loves me not " का मूर्त रूप मानता हूँ !!

...... सॉरी सर मैं लेट हो गया .... ऑटो में एक पुराने गाने की कुछ पंक्तियाँ याद आ गई थी तो उनकी पेरोडी बनाने में वक़्त लग गया , वो क्या है न ऑटो रिक्शा भी " डांस विद द ट्रेक " पर चल रहा था !!
सर पुनश्च :
बदले हैं तेवर मूड भी बदल गया होगा ,
पकडे हो अब गुलाब की माजरा क्या है !!

अ-से अनुज : दर्पण यार तुम्हारा भी जवाब नहीं , क्या कहा है मस्त , इसी तर्ज पर एक मेरा भी ...
अकड़े से हैं तेवर फूल भी झड गया होगा ,
जानते हुए मिजाज भी लाये ये खामखां क्या हैं !!

अध्यापक थोडा मुस्कुरा कर दर्पण को बैठने को कहते हैं , और कक्षा में एक इंटेलीजेंट से दिखते एक बच्चे को ,
जो की काफी देर से कुछ कहना चाह रहा सा जान पड़ता है , पर सही मौके का इन्तेजार कर रहा है , की तरफ इशारा करके कहते हैं ,
बेटा आप शायद कुछ कहना चाहते हो , कहो आपको क्या नज़र आता है ...

शैलेन्द्र सिंह राठौर : मैं भला क्यों कुछ कहना चाहूँगा , जबकि मुझे पता है की वो गुलाब खुद क्या कह रहा है , ज्ञान के स्तर पर भी और ईगो के भी (भला दुनिया मैं कुछ है जो चेतना को न पता हो ) हाँ पर विखंडनवाद के अनुसार रूप और वाक् के वैयक्तिक तत्व विभेदात्मक संबंधों पर आश्रित होने के कारण यहाँ गुलाब का कथन ' उपस्थित ' नहीं हैं पर ' अनुपस्थित ' भी नहीं क्यूंकि ' वाक् ' अपनी झलक उन अदृश्य तत्वों की सहायता से दिखाता है जिनके विभेद से वो स्थापित है..इसलिए निर्धारित कथन की उपस्थिति अशक्य है और जो कुछ है वो वाक्य का 'प्रभाव' है ...... सो गुलाब के रूप से पता लग जाता है गुलाब के वाक्य के बारे में..... पर उसके दृश्य रूप से उसके आत्म के सम्पूर्ण का कनेक्शन तो कहाँ होता है भला !!

“Yesterday's rose endures in its name, we hold empty names.”
― Umberto Eco, The Name of the Rose

here is one more from ' The Book of Disquiet '

“Life is full of paradoxes, as roses are of thorns.”
― Fernando Pessoa .

दर्पण : अब गुलाब से ही पूछिए सब हाल- ओ- खयाल , जो की बगीचे से कैसे चुराये जाएँ से तुम्हे किस बहाने दिए जाएँ के बीच की जद्दोजहद में मेरा दिल बना हुआ है !! " आखिर कौन बता पाया है आज तक !! "

ऐसे प्रतिभावान बच्चों से काफी प्रसन्न नजर आते अध्यापक ने तब एक सजग से बच्चे को देखकर जो कक्षा की खिड़की के बाहर उड़ती किसी तितली को काफी गौर से देख रहा था , से पुछा .... बेटा क्या देख रहे हो और ये गुलाब तुम्हे क्या कहता है ...

मनास ग्रेवाल : मैं देख रहा हूँ एक मादा तितली भी अपने अण्डों को नर तितली के भरोसे छोड़ने का जोखिम नहीं उठाती क्यों की वो जानती है कि ये कदम पृथ्वी पर मादाओं के अस्तित्व के अंत का सन्देश होगा ... उन्हें अपने अस्तित्व की रक्षा अपने लचीले पंखों से ही करनी होगी !!

फिर अगर मैं कहूँगा गुलाब ,
तो पृथ्वी पर सब स्त्रियाँ शस्त्र उठा लेंगी ,
वो अब और किसी को अपने जिस्म को कोई मखमली शाल सा नहीं ओढ़ने देंगी ,
बल्कि तेज नुकीले कांटो सा पैना चरित्र भी अपने अस्तित्व में गढ़ लेंगी ,
जो उनकी कोख और ममता के रक्षक तो बनेंगे ही ,
उनकी अस्मिता और सुन्दरता को भी छीने जाने के खिलाफ क्रांति और संघर्ष की मशाल बनेंगे !!

अध्यापक ने उसे शाबासी दी और इधर उधर के खयालों में खोये एक बच्चे से कहा ...
बेटा अब तक तुमने अपने सहपाठियों से इतनी अच्छी अच्छी व्याख्याएं सुनी ... अब तुम भी कुछ कहो क्यों गुमसुम से बैठे हो ...

अ-से अनुज : सर , मैं इस कक्षा में नया हूँ , अभी दो चार दिन पहले ही आया हूँ ,
ये फूल भी मैंने आज ही देखा है और आप ही से सुना की ये गुलाब है ,
सच कहता हूँ ... मैंने आज तक ये या ऐसा कुछ किसी को नहीं दिया !!

अध्यापक : बेटा , वो तो ठीक है पर जो भी तुम्हे लगता हो वो ही कहो ...

अ-से अनुज : अतीत के सबसे अंतिम जड़ छोर पर सोये एक संवेदन को ,
स्पंदन होने पर जानने में आये अपने आत्म और अपने अभ्युदय के लिए ,
काँटों सी वेदनाओं और गुरुत्वीय भार सी रुकावटों से गुजरना पड़ा ,
वहां से ... उसका ... मृदु वेद और क्रियाशीलता लिए पत्तियों तक का सफ़र एक पौधे की जड़ों और तने में बदल गया ,
और इस सफलता से प्रेरित वो संवेदन अब अपने सकल अस्तित्व को सुधारने ,
और अपने प्रेम से बाकी सुप्त पढ़ी संवेदनाओं को जगाने और साथ खिलखिलाने के लिए ,
वाग्मयी प्रकृति के घुमावदार रास्तों से शब्द दर शब्द गुजरने लगा ,
हर खूबसूरत शब्द कोई लाल सी रंगत ली हुयी पत्ती बन गया ,
और जैसे जैसे संवेदन अपने आत्म पर केन्द्रित होने लगा ,
वो एक गुलाब सा खिल कर महकने लगा !!

तब एक संकोच में पड़ी हुयी , खुशनुमा सरल बच्ची को देखकर टीचर को बड़ा प्यार आया , उन्होंने उससे पुछा क्या लिख रही हो ,
वो बोली ,

अपर्णा अनेकवर्णा : सर मैं सुनाऊं !!

अंतस की ,
एक उत्फुल्ल सरलता ,
एक प्रफुल्लित भाव ,
जीवन के आँगन में यूं कैद ,
गरजती लहरों पर ,
लरजती नाव सी बहने ,
बस यूँ ही चहक जाने को मुस्तैद ,

कैसे आये वो सर्द बहार ,
कैसे हो जीवन साकार ,
कहाँ होगा वो मृदु जहान
कब मिलेगा खुला आसमां ,

मौसम दर मौसम ,
काँटों के बीच ,
सहेजती रही जो मिठास ,
अपनी मीठी गंध को ,
अब देना है प्रश्वास ,

अपने प्रेम , अपनी ख़ुशी ,
अपने उत्सव को दे सकूँ वर्ण ,
थाम कर ये लोक-प्रलाप ,
गुलाबी रंगत , कोमल पांखुरे ,
नयनाभिराम अपने एहसासों को ,
बना देना है अब एक गुलाब !!

वाह बहुत सुन्दर , अध्यापक ने कहा ,
हिम्मत पाकर वो फिर बोली ,

जाने कब से था ये दिल के बहिश्त में कैद ,
इस जज़्बात को अब जीने की चाह मारी है ,

बंद लफ्जों के एहसास जो चुभते थे कभी शूल से
ये खिला गुलाब अब उसी की जवाब दारी है !!

सभी ने उसके प्रयास को सराहा , अध्यापक ने भी थपथपाया !!

क्लास की एक बच्ची को पोएम लिखने का बहुत शौक था ,
उसने सर से पूछा और गुलाब के बारे में अपनी बात कही ...

राजेश जोशी :
it's ,
a story of love ,
an eternal bliss ,
an endless poem ,

she gifted ,
the most wonderfull thing ,
to her lover
who for her the god of love ,

when they didnt let her ,
go with him ,

she melted and lost in soil ,
and started to live ,
with the dew ,
with the vibrations ,

and some days later ,
in calm and cool ,
and pleasuring atmosphere ,
when he came there ,
he found a plant ,
with a wonderfull flower ,
laced in a sweet fragrance ,
wrapped in silence ,
revealing secrets,
reminding him of her
enveloped in Love ,
the rose !!

सब एक पल खामोश थे , और अगले पल खुश !!
फिर एक खुशमिजाज और बाकी से अनुभवी लगती बच्ची अब उस देवपुष्प को अपने शब्द देती है !!

वीना बुंदेला :
हर पूर्णता समेटे है अपने में दो पहलू ,
एक श्वेत और एक श्याम ,
एक जमीं हैं ख्वाब की , एक आकार ,

जब मिलता है कहीं से सबब जीवन का ,
भरोसा सच्चे मन का ,
कोई शाख हरी , कन्धों पर लेती है रक्षा भार ,
कांटे बचाए रखते हैं नमी बरकरार ,

उस दिन वहां सपने स्वर्ग से उतरते हैं ,
प्रेम की खुशबू से सराबोर ,
गुलाबी मृदुता या सुर्ख समर्पण के ,
और खिल जाते हैं ,
सच्चाई की शाख पर ,
एक गुलाब बनकर !!

और तभी बाहर मिड-ब्रेक के लिए घंटी बज उठी और सभी बच्चों के चेहरे खिल उठे ,
अध्यापक ने ब्रेक के बाद बाकी बच्चों से भी तैयार रहने को कहा और चले गए ...

वो गुलाब अब कक्षा के बंद कमरे के शांत अँधेरे में एक मेज़ पर लेटा हुआ है ...
और जाने क्या गुनगुना रहा है !!


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ब्रेक के बाद अब कक्षा चहली-पहली है , बच्चे अपनी दिनभर कि मौज मस्ती बाँट-बतिया रहे हैं ,
तरह तरह के टॉपिक्सों गाने , पोयम्स , राजनीति और खेल कूद पर वो अपना ज्ञान सुलझा रहे हैं ,
दर्शन के अध्यापक फिर से कक्षा में प्रवेश करते हैं … अब उनके हाथ में एक किताब है ,
वो किताब मेज़ पर रख कुर्सी पीछे खींच कर उस पर बैठते हैं ... एक ठंडी आह लेते हैं ... और फिर किताब को कहीं बीच में से खोलते हैं ,
उसके बीच एक सूखा हुआ गुलाब रखा है ... वो उसे एक पूरी नज़र भर देखते हैं ... और फिर बच्चों की तरफ सर घुमा कर कहते हैं ....

" दो जिंदगियों के बीच में कहीं सहेजा हुआ सा प्रेम , दो अधूरे किस्से और पूरा हुआ सा प्रेम ,
वक़्त के भंवर में बचा रह जाता है अगर कुछ , तो यादों की किताब और सूखा हुआ गुलाब !! "

और फिर थोड़े गुस्से में कहते हैं --- Guerrilla ! stop jumping on the desk , just sit in the proper way !!
और फिर शांत हो मुकेश की तरफ निगाह कर लेते हैं !!

मुकेश चन्द्र पाण्डेय : Sir ... This rose is whispering silence in my ears ...

it says ...
I never was a part of this book ,
but i have been an important chapter in between ,
I feel glad belonging to those true hearts ,
where silence could be felt,
where , there are ...
no complains, no make over ,
no feelings of sorry for whatever happened .

love is the light comes through a burning filament
bound between the two hearts set in the bulb of life ,
where there is no need of any Sun or moon ,
it is an independent source of light which makes us free .

" The love atteched with me will never die ."

सभी बच्चे भावुक हो गए और तब गुरिल्ला ने टेबल बजा और एक गजल गा कर माहौल सामान्य किया ...
टीचर ने शायराना अंदाज लिए बैठे एक बच्चे को खड़ा किया ...

संदीप रावत :
गुलाब की पत्तियां कई किस्से कहती रही ...
बाकी बचा रहा किसी एक का प्यार ....

उसके संदेशों को भर भर आँखें देखकर ,
सबकी नज़रों से छुपाते रहे ,
एक लम्हे को जिन्दा रखा ,
एक हिस्से को मार कर ,
और खोते हुए रंगों में से ,
बचा लिया एक ,
मगर बचा कर रखते भी तो कहाँ ,
दुनिया छोटी थी ,
दिल कमज़ोर ,
एक अलग सी दुनिया में ,
पाक से एक हिस्से में ,
सहेजा हुआ है , अब उसको !!

एक बच्चा अचानक पीछे से बोला ....

दर्पण साह : प्रेम का सूखा हुआ गुलाब किसी भी ताजे फूल से ज्यादा हरा होता है क्योंकि वो अपने समस्त सूखेपन के बावजूद यादों में नम रहता है

शैलेन्द सिंह राठौर : " आँखे नीली कर गया सूखा हुआ गुलाब " .... भारतेंदु हरिश्चंद्र

टीचर ने तब अपर्णा से पुछा कुछ लिखा ?
वो बोली ,

अपर्णा अनेकवर्णा : हाँ सर , ये रहा ...

लिखे सजे थे जो पन्ने ,
कोरे शब्दों से बस ,
थी वो किसी जीवन की किताब ,
दो लम्हों के बीच कहीं ,
जाने कहाँ निकल आया ये गुलाब ,

इसी ने रंगे मायने ,
कोरे शब्दों पर ,
इसी से खिली बहार ,
सूखे रास्तों पर ,

सूखा है गुलाब ,
पर सुर्ख हैं वो यादें ,
जो सहेजी गयी हैं ,
दो कागजों के बीच !!

टीचर की नज़र एक शांत और सह्रदय सी बच्ची पर गयी उन्हें खड़ा किया गया , और उन्होंने अपने विचार रखे ...

प्रोमिल्ला काजी :
गुलाब ह्रदय के रस की बूँद ,
कांटे अतीत की टीस भर ...

यादों की किताब में
किसी एक पन्ने पर
मुझे दिखाई देता है
तुम्हारा दिल ,
सब बैठ जाता है वहीँ ,
सिर्फ एक महक उठती है !!

और इसके साथ ही फिर से घंटी बजी , अध्यापक को नमस्ते , बाय और विदा सर से नवाज बच्चे अपने बस्ते उठा दौड़ने लगे !! टीचर की यादों में कुछ खुशबू बसी सी है अब , कुछ सूखे गुलाब की , कुछ बच्चों के अंदाज की !!

~ अ-से

Dec 3, 2013

पोटली


आते वक़्त ही माँ ने एक पोटली दी थी ...
और कहा था अपना ख़याल रखना , पोटली से ज्यादा जरूरी तुम हो मेरे लिए ...

वक़्त के रास्ते मैं निकल पड़ा ,
राह में जो भी मिला जो भी जैसा भी लगा , मैं पोटली अपनी भरता रहा ..

पोटली के अन्दर एक अनोखी ही दुनिया रच बस गयी थी ,
सामान एक दुसरे से रिश्ते बनाने लगे जुड़ने लगे और सिस्टम आकार लेने लगा ,
वो नए आने वाले सामानों को भी कहीं अपने अनुसार ही व्यवस्थित कर देते थे ,
वहां जो आसानी से जगह बना लेते थे उन्होंने अलग ग्रुप बना लिया ,
वहां अक्सर चर्चाएं होती रहती और सामानों पर अच्छे बुरे की छाप भी लगने लगी ...

यूँ ही चलते चलते जब मैं थक जाता या मार्ग निर्धारण करना होता ,
तो उसमें झाँक कर देख लेता ...

पहले सब कुछ उसमें आसानी से आ जाता था और चलने पर चीजें उलटती पलटती रहती ,
पर बाद में चीजों की हवा बाहर निकली जाने लगी पोटली के कपड़े से और गतिहीनता के कारण उनमें शुद्धता नहीं रह गयी ,
फिर वो ठंडी भी होने लगी क्योंकि गर्म वस्तुएं ज्यादा जगह घेरती हैं ,
और बाद में सूख कर जमने लगी अब उनमें रस भी बाकी नहीं रहा ,
नए आने वाले सामान भी जल्द ही इस सिस्टम के अनुसार ढलने लगते ...

सघनता काफी बढ़ चुकी थी और पोटली भारी होने लगी ,
अब वो इधर उधर से फट भी चुकी थी , कई चीजें राह में ही कहीं बिखर चुकी थी ,

एक दिन बहुत उदास होने पर मैं एक पेड़ के नीचे बैठ अपनी पोटली निहारने लगा ,
देखा तो उसमें ऊपर ही कुछ साबुत सामान थे , थोड़े नीचे के टूटे फूटे से ,
और बाकी सिर्फ धूल और मिट्टी ...

मुझे दिखने लगा आगे ... एक दिन ये पोटली बहुत उधड जाने वाली है ,
और सारे अनुभव और स्मृतियाँ भी मिटटी हो जाने हैं ,
और तब मेरी यादों की पोटली मुझे छोड़नी ही है ,

आगे रह जाएगा सिर्फ ये रास्ता ...
पर परवाह नहीं अब ...
....... आखिर माँ ने कहा था मैं ज्यादा जरूरी हूँ उनके लिए !!

< अ-से >

Nov 26, 2013

विद्रोह

Painting - Neogene Irom Sharmila / Google
विद्रोह : 

एक लम्बी कैद में " हया " ने कई जन्म और मृत्यु देख लिए ,
उस-ने अपने दिल पर हाथ रखा और दिल भभक उठा ....

तय समय पर शैतान ने चाबुक उठाया , 
परपीड़ा का नशाखोर , काममद से हिनहिना उठा ,
क्रंदन गीत सुनने का मन लिए वो पहुंचा जहाँ हया कैद थी ,
उसके मनोरंजन का समय हो चुका था ....

वो बुरा नहीं था ... उसने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा ,
वो बस अपना आनंद किसी कीमत पर नहीं खो सकता था ,
उसने अंतस के अनेकों युद्धों में सत्य धर्म प्रेम और शान्ति को पस्त किया था ,
हाँ सीधी लड़ाई से वो डरता रहा था इसीलिए ये अभी भी परास्त नहीं हुए थे ,
और फिर फिर उसको ललकारते थे ... ह्रदय के बेचारे अबला से अंग ....

खैर वो जानता था कोई ईश्वर नहीं आएगा उसे चुनौती देने ,
ये भी उसके खेल कूद जैसे ही था ... शतरंज उसको ख़ासा भाता था ....

कैद खाने के दरवाजों को एक बेसब्री से खींचकर वो अन्दर आया ,
बदहवास सा होकर कोड़े बरसाने लगा ,
पर आज कुछ कम था उसे कुछ अजीब लगा ,
उसने पूरा जोर लगाकर और चाबुक मारे .....

मुस्कुराती हया का चेहरा तप्त रक्तिम था ,
वो हंसने लगी ,
उसकी तीखी हंसी शैतान को अन्दर तक भेद गयी ,
उसने पीठ के पीछे से हाथ खींचकर एक और चाबुक चलाया ,
तीखा क्रंदन उठा पर उसमें रूदन नहीं था एक अट्टाहास था ,
शैतान बुरी तरह विचलित हो उठा उसने चाबुक उठाया ,
और अपनी तमतमाई बेबसी से क्रोध बरसाने लगा ,
हया को जैसे कोई असर नहीं था उसकी देह , मृत कपड़ों सी निर्जीव थी ,
वो आँखों में अंगार सी चमक लिए अपनी रक्त आवृत देह का ध्यान न कर बस हंस रही थी ,
उसने ठान लिया था किसी भी कीमत पर वो शैतान को जीतने नहीं देगी ...

उस रात शैतान पहली दफा मात खाया सा अनमना बैचैन और फडफडाता जाकर लेट गया ,
आँखों में कहीं नींद नहीं थी ... वो कंठ तक सोच में डूबा था ...

वो हंस कैसे सकती है ... किसी की चीखों में अट्टाहास कैसे आ सकता है ...
दर्द पाकर भी कोई जीत कैसे सकता है ...
सुबह होते ही वो फिर वहां गया जहाँ जंजीरों में कैद खून की लकीरों से सजी एक देह बेसुध पड़ी थी ,
जमीन पर रक्त से उकेरा हुआ एक सन्देश था ... उसके नाम ....
तुम कभी नहीं हरा पाए मुझको ,
तुम्हारी सारी मेहनत व्यर्थ गयी ,
जानते हो तुम्हे क्यों कभी ख़ुशी नहीं मिलती ....
क्योंकि तुम्हारी माँ ने एक मृत शिशु को जन्म दिया था जो एक मृत सहवास का परिणाम था ,
तुम्हारी माँ ने तुममे ह्रदय का बीज कभी डाला ही नहीं ,
तुम प्रकृति के एक मृत नियम का परिणाम भर थे जिसके अनुसार हर कार्य का फल पैदा होना ही था ,
चाहे वो कार्य किसी विध्युत चालित यंत्र ने ही किया हो ...

तुम्हारा पिता कोई मानुष नहीं था उस रात जब तुम्हे बीजा गया वो प्रकृति के मृत हिस्से का एक यंत्र भर था ,
तुम एक यंत्र की पैदाइश हो ....

और जब तुम जीवित ही नहीं तो तुम्हारा खेलना कोई भी मायने नहीं रखता इस संसार के ह्रदय में ,
जब तुम्हारी लाश को तुम्हारे अनुत्पन्न हृदय के साथ पृथ्वी से बाहर फेंका जा रहा होगा ,
तब संसार में उत्सव का माहौल होगा ....
और तुम एक सामूहिक गिद्ध भोज के साधन मात्र होंगे ...
हाँ पर उस वक़्त तुम हंस पाओगे अपनी मृत देह से क्योंकि पहली दफा कहीं शांति होगी ....
और पहली बार तुम्हारे कारण से संसार में खुशियाँ होंगी .... !!

< अ-से >

painting : Neogene Irom Sharmila // google "
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Nov 24, 2013

( प्रकृति बोध - माँ )


" तुम्हे हर ओर से जलना होगा .... भीतर तक पिघलना होगा "
... परम शान्तिमय व्याप्त अ-कार में एक शब्द हुआ ... एक बोध हुआ ... ,

तब प्रकट हुए सूर और हर ओर से जलने लगे , चमकने लगा सूर्य ... एक प्रचंड आ- नाद फैलने लगा ...

अकार ... आकार लेने लगा ... उजस उठी सृष्टि ...

पृथ्वी प्रकट हुयी ... सुनी उसने उद्घोषणा ...
माँ का दिल जल उठा ... तब कुपित हुयी पूषणा ...

कृ-कार (धरा) ने सूर्य से कहा मुझे मंजूर नहीं ये ,
आपके परम बोध का तेज ... अभी से कैसे सहेंगे मेरे नादान मनवान बच्चे ..
उन्हें भी कुछ वक़्त मिले ... तब तक तो आपको ढलना होगा ...

सूर्य ने कहा धरा से .... अपनी ममता का खयाल तुम्हे खुद ही करना होगा ,
अगर उन्हें बचाना है तो तुम्हे भी खुद ही जलना होगा ...
यह कह कर वो कुछ शांत हुए ... नाद कुछ आल्हाद में बदला ... कुछ प्रकाश में ... कुछ बोध में ... कुछ अवकाश में ....

धरा ने सूर्य के इस अकहे कर्म को फिर नमन किया ,
और अपने बच्चों को अपनी पीठ पर लाद ... अपनी ममता की ओढ़नी से बाँध लिया ...

और उसने लिखी प्रकृति की किताबें अपनी देह पर ... की उसके बच्चे भी सीखें उस परम बोध से .... कैसे प्रकाशते हैं जग को .... !!


उसके ओट में दिन ... रात हुआ ,
उसके आँचल में ... दिल सांच हुआ ,
उसकी गोद में सिमटा हुआ सा प्रेम ,
उसकी बातों से जग ज्ञात हुआ !!

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... < अ-से > ......................

Pic Courtsey: Google / " Debdutta Nundi "

Oct 31, 2013

" प्रेम "


जिस समय साँसों की घुटन से उपजी तीव्र वेदनाओं की सूक्ष्म धाराएं , मेरे संवेदन अस्तित्व की हर एक इकाई का सर उठाया गला , कसी हुयी सन की रस्सियोंसे कसकर , दर्द के सभी आयामों और विशेषणों का मर्म मेरे मानस को समझा रही थी , तब सुकून को छटपटाती मेरी संवेदना और वक़्त को छटपटाते मेरे प्राण मुझसे विनती कर रहे थे ,
कुछ और सब्र करने का ..... ॥

उन्हें मालूम था अब मैं उन्हें किसी भी वक़्त निर्मम बुद्ध सा त्याग चला जाऊँगा , दृश्य की किसी और धारा में अपने को बीज बनाये फिर से अंकुरित होने ,
पर वो जानते थे मेरी चाहत का अतीत भी ,वर्तमान भी ,
और करते थे उस दिल कशा का भी खयाल ,
जो नहीं पहचान पाएगी , मुझे किसी भी और शक्ल में ,
और उसके लिए वो (मेरे प्राण ) मुझे इसी शक्ल में बनाये रखने का अंतिम संघर्ष कर रहे थे ॥

समय के उस हसीन लम्हे में , नर्म धूप , सर्द हवा , उठती महक से मदकती तितलयों , कोंपलों , डंठलों और खिलखिलाते हुए सूरजमुखी के फूलों को चेहरा दिए , मेरी प्रेम कथा की नायिका , अपने प्रेम गीतों में मेरी सलामती और ख़ुशी गुनगुना रही थी ॥

वो बेहिचक हरे नीले सपनो को , सुनहरी पीली उम्मीदों के , बैंगनी परिंदे बनाये आकाश में उड़ा रही थी ,
और मैं निर्विकल्प अपने प्राणों के अंतिम संघर्ष को थामे रखकर उनके रंग बचा ले जाने का हर संभव प्रयास कर रहा था ॥

उस समय , काल के तख़्त पर चढ़ाये गए कई निरीह निरुद्देश्य मन के टुकड़े अपना सामान समेट वहाँ से विदा ले चुके थे ,
और सज़ा सुनाने वाले न्याय और तंत्र को समर्पित निसंदेह ह्रदय रावण को जलाये जाने की आतिशी खुशियाँ मना रहे थे ॥

तभी एक हवा के झोंके से बिखरा मेरा मन आकाश और अवकाश के सभी अवयवों को छानता छोड़ता मेरी अंतिम इच्छा को साकार करने सूरजमुखी पर पंख फैलाती एक तितली पर सिमट कर बैठ गया ॥

आह , कराहते हुए , वेदना के तीव्र स्वर , गुनगुनाते हुए दो होठों के गीतों की धुन से ताल मिला ख़ामोशी में लय हो गए ,
न प्राणों की दुआ क़ुबूल हुयी , न गीतों की फरमाइश ...
प्रेम कशिश के साक्षात् को खिंची मनः तितली मुस्कुराई ... और उसके फैलते हुए पंखों की खूबसूरती में ... वो दिलकश चेहरा खिलखिला उठा ... सूरजमुखी अब उसे देख रहे थे ॥

............................................................... अ-से अनुज ॥

Oct 16, 2013

" बुद्धं शरणम् गच्छामि "



.........................................

बारिश गुज़र चुकी थी , रात भी ,
उठती हुई आवाजें भी अब बैचेन न थी और हवा को भी कोई जल्दी नहीं नज़र आती थी ,
हल्की नर्म धूप में सुस्ताने ,
बाहर निकला वो अलसाया सा मेंढक ,
रात भर खौफ में टर्राते , अपने बाकी साथियों के साथ , वो थक चुका था ,
पूरी रात उसने सुबह के इंतज़ार में काटी थी ॥

बाहर बुद्ध की एक विशाल प्रतिमा थी ,
उसे दिखी तो नहीं उसकी दृष्टि के सामर्थ्य से वो काफी ऊंची थी ,
पर वहां एक अप्रतिम शान्ति थी ,
शायद उस पत्थर में जंगल की बाकी गीली जमीन से ज्यादा गर्माहट थी ,
वहां सो रहे थे कुछ पंछी और कुछ और जानवर , जो आम तौर पर सूरज की इस ऊँचाई पर शांत नहीं बैठते ,
फुदक कर वो सबसे निचले पत्थर पर चढ़ गया और सो गया ॥

नींद में बनते बिगड़ते सपनो में उसे प्रश्न आया की वो मेंढक कैसे बन गया ,
वो तो एक नवयुवक भिक्षु था ,
जो संन्यास लिए किसी जंगल में ज्ञान की प्राप्ति को निकला था ,
उसके अस्थिर मस्तिष्क के किसी संयमशील हिस्से में ठहरी चेतना ने उबासी ली ,
पूर्व की दिशा में उसका सर उठ गया ,
उसके गुरु ने उसे बताया था ,
अपराध और पाप के विषय में उसकी उत्तेजनाओं को शांत करने के लिए ,
पाप वस्तुतः नहीं होता , अंगुलिमाल भी उसे क्रमशः याद आया ,
गुरु के कई उपदेशों में से कुछ कुछ उसे याद आया ,
उसे याद आया , वो किस तलाश में निकला था ,
उसे तलाश थी बुद्ध की ,
भगवान् बुद्ध उसके समकालीन नहीं थे पर उसने बहुत सुना था उनके बारे में ,
तो वो जानना चाहता था बुद्ध को ,
निर्वाण उसकी प्राथमिकी न थी ॥

वो एक पास वाली छोटी पहाड़ी पर रहने लगा था ,
वो जानना चाहता था बुद्ध को , वो क्या थे , कैसे थे , क्या बुद्ध का अभी भी अस्तित्व है ,
और अगर नहीं तो फिर साधारण मनुष्य और उनमें क्या फर्क आ गया ,
इन्ही प्रश्नों की उधेड़बुन में उसके सारे मौसम एक हो गए थे ,
कांटो पर चलने तक के स्पर्श उसे देह की सुध नहीं देते थे ,
स्वाद वो भूल चुका था , मृत्यु और मोक्ष उसके ज्ञान का विषय न थे ,
और
कोई प्रेम कथा अभी उसने जानी न थी ॥

उस पहाड़ी के दूसरी ओर एक गाँव था ,
कुछ लोग लकड़ी आदि अन्य आवश्यकताओं के लिए जंगल की तरफ आते रहते थे ,
एक बार एक स्त्री उधर से गुजरी थी ,
नीले वस्त्र , पीले फूलों का श्रृंगार ,
गेहुआं वर्ण , छोटे तीखे नेत्र , भरे हुए गालों और तेज कदमताल ,
उसकी नज़र जब हटी तो दूर गाँव की तरफ की पगडण्डी के आखिरी छोर पर कुछ गति सी थी , जो अब नहीं थी ॥

तीक्ष्ण हुयी जिज्ञासाएं लक्ष्य बदलते ही अपने शब्द रूप बदल लेती हैं ,
कहानी बदलने लगी , आते जाते अब वो उसे कई बार देख चुका था ,
एक बार सहायता प्रदान करने के वाकिये के साथ सिलसिला चल पढ़ा ,
अब मन की जिज्ञासा नयनों से गुजरने लगी ,
बुद्धि , बुद्ध से ध्यान हटा कृष्ण और फिर काम हो गयी ,
कामदेव सजल नेत्रों से मुस्कुराने लगे ,
प्रेम के अक्षर पढ़ाने को अब उनके पास एक शिष्य था , और एक शिष्या भी ,
वो नित नयी पंचरंगी कहानियाँ सुनाने लगे ,
दोनों शिष्यों में समर्पण भाव जागने लगा और भेद ख़त्म होने लगा ,
समय के परे तक अब प्रेम की पहुँच थी ,
मृत्यु, उत्पत्ति और बुद्ध भाव अब उसके मन मानस से गुज़रते न थे ॥

वर्ष गुज़र गया और बुद्धि में चित्रित कर गया ,
कई सुहाने मौसम , अनेकों भाव , अनोखे स्पर्श, रूप, और शब्दमय मात्राओं के चिन्ह ॥

एक दिन कायनात में बिजली गूंजी ,
चमक नहीं थी उसमें कोई घनघोर था ,
गाँव में गीत गाये गए थे , कोई उत्सव का माहौल था ,
किसी राजा या बड़े मंत्री की नज़र लग चुकी थी उसकी अनुभूतियों पर ,
असहाय नारी कर चुकी थी त्याग अपने प्रेम का , आज उसका विवाह , उसके परिवार का सम्बन्ध किसी भव्य वैभव से था ,
और उस आकाशीय बिजली का आघात किसी ह्रदय को सहना पड़ा ॥

बेबस आँखे विरह की अग्नि में सूखते बिखरते आंसुओं में जल जल कर पिछले मौसम के ठहरे हुए दृश्य दिखाती थी ,
और किसी त्राटका की छाया युवक पर पड़ चुकी थी , अब वो सोता नहीं था ,
देखता रहता था एकटक ,
कबूतर कबूतरी के जोड़े , कव्वे , हंस , भँवरे और चिड़ियाएं ,
अल सुबह से देर रात तक सब को मगन देखता था वो ,
उसने काम के सुन्दर और भयावह रूप देखे ,
और कभी कभी चुभते थे उसे स्पर्श ,
वो जानना चाहता था ,
की उसकी प्रेमिका में ऐसा क्या था , जो और किसी में नहीं ,
वो क्या है जो उसे और कुछ भी नहीं भाता , सिर्फ अतीत चाहता है ॥

.................................................................................................

अब प्रकृति के क्रिया कलाप और जीव जंतुओं के आचार व्यवहार देखना ही उसकी दिनचर्या हो गयी ,
उन्हें दौड़ते , खेलते , लड़ते , मरते , मारते , भोग और सम्भोग करते ॥
जिस चट्टान पर वो अक्सर बैठता था ,
उसके पास ही एक गंदले पानी के गढ्ढे में कुछ मेंढक रहते थे ,
जो सांझ होते ही अलग हो हो कर फुदकते लगते ,
पर वो ज्यादा दूर ना जाते थे ,
फिर टर्राने लगते , और जीभ लपका कर उड़ते बैठते कीड़े खाते ,
उनमें कुछ मेंढक अपना गला फुलाकर रंग बिरंगा कर लेते ,
अलग अलग टर्राहटों से अपने साथी को आकर्षित करते ,
साथी के पास आने पर अलग अलग नृत्य मुद्राओं में कूदते फुदकते ,
इस तरह ही पूरी सांझ और रात निकाल देते ॥

उन्हें देखकर उसे अपनी प्रेयसी की याद सताने लगती , उसका गला सूखने लगता तो वो वही गन्दला पानी पी लेता ,
वो बस उसे कम से कम एक बार तो देखना चाहता था जी भर के ,
उसे इन नन्हे मेंढको का भाग्य भी स्वयं से बेहतर लगने लगा ,
अनजाने में पाए दुःख को नियति समझ विधाता को कोसने लगा ,
उसे हर चीज हर बात से शिकायत होने लगी ,
वो समाज को गाली देता , अकेले में बडबडाता , किसी जीव को लकड़ी मरता , किसी पर पत्थर फेंकता ,
पंछियों के अंडे , खरगोश , कबूतर का मांस खाकर जीने लगा , हाल का , सड़ा , कैसा भी ॥

संसार में सुख , दुःख , प्रेम , परिहास का कोई परिमाण (माप तौल) नहीं होता ,
अन्य की तुलना में किसी चीज से वंचित लोग कुंठा का शिकार हो जाते हैं ,
कुंठा से दायरे सिमटने लगते हैं ,
और व्यक्ति किसी कीड़े की तरह एक छोटी सी डंठल को कुरेदने में ही जीवन बिता देता है ॥

वक़्त गुजरा अब उसे किसी बात का ध्यान नहीं रहता था , विक्षिप्त सा , जंतुओं से लड़ता झगड़ता ,
वो विक्षत और बीमार हो चुका था , उसका अंतिम वक़्त वो मेंढक थे , वो या शायद दूसरे ,
जो कभी उसे अच्छे लगते , कभी बुरे और कभी बैचेन करते ,
उनमें वो उदासीन न था , वो उसकी भावनात्मक आसक्ति बन चुके थे ॥

अपनी कुंठा में वो युवक उसी गढ्ढे के पास से उस दृश्य भाग से गुज़र चुका था , ( कुछ गिद्ध जमा थे वहाँ )
आगे वहाँ क्या हुआ क्या पता ,
उसके बाद वो कभी होश कभी बेहोश, घने अंधेरों के बीच रह रहकर सिसकता था और फिर बेहोश हो जाता था ,
जब कभी उसने उठने की कोशिश की तो स्वयं को असंख्य चट्टानों के भार तले महसूस किया ,
पलक उठाना कभी असंभव लगता तो कभी सूरज को आँखे दिखाना ,
अस्तित्व की तलाश में उसका सब कुछ जलता पिघलता जकड़ता सा लगता था ॥

और फिर जब वो उठा था तो उसने खुद को पानी में पाया था ,
हाँ तभी उसकी साँसे चली थी और वो फुदक कर बाहर आया था ॥

...............................................................................................

अजीब सी प्यास सताए रहने लगी उसको ,
भूखी जीभ उड़ते कीड़ों की ताक लगाए रहती ,
और लपक कर मूँह में भींच लेती , पूरी निर्ममता से भींच कर मूंह बंद रखना होता था ,
जब तक फड़फड़ाती वो जान दम न तोड़ देती ,
गीलापन , गन्दगी , रौशनी से डर, आँच की असहनीयता और अकेलापन ,
बाकी मेंढको के बीच उसका मन न लगता ॥

पर कमजोर निरीह मन , भूख ,संवेदनाओं , मृत्यु और कुछ छूट जाने के भय के आगे कब टिका है ,
और वो भी एक छोटे से दायरे में सीमित जीव जिसकी दृष्टि खुले आकाश को देख पाने में असमर्थ हो , उसका मन ,
पर कुछ था जो उसे बाकी से अलग रखता था ,
शायद उसका अकेलापन , कोई गहरी जिज्ञासा , और ह्रदय के अंतर पर ठहरा अस्पर्श्य प्रेम ॥

वो बाकी मेंढकों के साथ ही उनके पीछे उनसे अलग उनसे स्वतंत्र समझ लिए ,
अधिकतर कुछ ना खाए समय बिता रहा था ,
और पिछले सूरज ही तो वो इस ओर आया था ,
अपना पुराना गढ्ढा छोड़कर , जहाँ एक चूहे की सड़ी पडी हुयी देह की दुर्गन्ध से दूर वो किसी ताज़ा हवा की तलाश में था ,
और सांझ होते ही बारिश होने लगी थी ,
वो जाग चुका था , भीतर तक ॥

स्मृतियाँ वक़्त के साथ अंतर्मन पर आवरण बनाने लगती है , और उसके नीचे , बहुत नीचे ,
कहीं गहरे दब जाता है ह्रदय और स्वास्थ्य , फिर रौशनी वहाँ से बाहर नहीं झांकती , मुक्त आकाश भी भय और चिंता का सबब बन जाता है ,
तब सब भूल जाना ही एक उपाय होता है , भावनाओं के सामान्य प्रवाह में मिल जाने तक , चेतना जब तक स्वच्छ न हो ,
और तब पुरानी स्मृतियों से ही बल भी मिलता है , संबल भी , और सबसे जरूरी ज्ञान भी ॥

उसे उसके उद्देश्य ज्ञात हो चुके थे , और वो अब वहीँ रहने लगा , उसी पत्थर पर ,
उसे एक सुकून था वहां और वो रमने लगा ,
एक छोटी सी प्रकृति , एक दुर्बल सा स्वभाव , नन्हा सा मन , अनंत के एक नगण्य हिस्से में रमने लगा था ,
अब उसकी भूख प्यास जाती रही , अकेले , अन्य समकक्षों के साथ न रहने के कारण प्राकृतिक प्रवृत्ति भी जाती रही ,
चेतना पुष्ठ , और स्वच्छ होने लगी , उस पर छाया देह का अँधेरा कम होने लगा ,
अब उड़ कर आये एक सूखे पत्ते की ओट भी उसे पसंद न थी ,
अब वो सर उठा कर देखने लगा था , उस पत्थर को ,
वहाँ उसे अब कोई छत कोई दीवार कोई दायरा नहीं दिखता था ,
सिवाय उस सुकून भरे आसरे , उस पत्थर के ॥
...........................................................................................

दिन गुज़रते गए , और उसकी स्मृति और विस्मृति प्रखर होने लगी ,
याददाश्त समझ और भूल जाने की क्षमता परस्पर एक ही सर्प के तीन मुख हैं जो गर्दन पर उसकी चेतना से जुडी हैं॥

मेंढक निरीह सा जीव था , उसकी स्मृति इतनी स्थिर न थी , पर अब उनकी आवाजाही बढ़ गयी थी ,
कभी कभी उसे अपना विगत याद आता , कभी अपने प्रश्न , कभी प्रेम और कभी पानी ,
कभी कभी अपने प्रश्नों की स्मृति आने पर वो निश्चिंतता से चिंतता था बुद्ध को , वो थे या हैं ,
एक साधारण सदेह मनुष्य का बुद्धा जाना, वो क्या है जो उसे मनुष्य से अलग कीर्ति दे गया ॥

फिर एक दिन मेंढक को जिज्ञासा हुयी , उस पत्थर के ऊपर तक जाने की ,
वो फुदकता हुआ उसकी सभी दिशाओं में यात्रा कर आया ,
और हिस्से जुड़ते गए उसके चेतन में स्थित स्मृतियों के ,
" हाँ ये तो बुद्ध है , और ये बदलाव बुद्ध की शरण है ,
वो ना जाने कब से उसी आधार पर जीवित था ,
ना जाने कितना कुछ गुज़र गया पर कुछ नहीं बदला ,
अचानक वो खामोश हो गया , ये ही तो बुद्ध है ,
उसने नज़र घुमा के चारों और का दृश्य देखा , सब और एक सुकून बिखरा हुआ था ,
आसमान में बादल न थे , पर सब तरफ बरस रही थी ख़ामोशी ,जो जमीन पर बिखर रही थी शीतल होकर ,
पृथ्वी ने स्वच्छ चेतना की चादर ओढ़ ली थी और उसकी मिट्टी से उठ रही थी सुगंध , वातावरण को महकाती हुयी ॥

मेंढक शांत हो गया , पूर्ण स्तब्ध , जैसे दृश्य प्रकाश थम गया हो ,
वो सब जानता था बस इस ही एक बात के अलावा , वो सब जानता था ,
प्रारब्ध से अब दृश्य नहीं सिर्फ कुछ ध्वनि आ रही थी , जो उसके मन से गुज़र रही थी ,
शुरुआत का छोर कुछ भी हो वो यहीं पूर्ण कहलाता है , सबका अंतिम लम्हा यही है ,
कहानी कहीं तक जाए शुरुआत यहीं से होती है , सबका जन्म समय भी यही है ॥

पूर्णता , हर लम्हे पूर्ण होती है और वो अपनी पूर्णता से थकती नहीं ,
पूर्णता भरी होती है अनंत उपलब्धियों से पर इससे उसकी पात्रता कम नहीं होती ,
जीवन सब और दुःख है और यहीं विरक्ति है ,
जिजीविषा ही जिज्ञासा है , बुभुक्षा भी और मृत्यु कहीं नहीं है ,
जानना भर जान लेना है और यहाँ कभी कुछ नहीं बदलता ॥

उसका यहाँ तक का सारा जीवन विगता गया , स्थिर हो गया ,  कभी न बदलने वाला अतीत ,
सारी अनुभूतियाँ अनुभूत हो गयी ,उसकी तृष्णा गुज़र गयी ,
मन मस्तिष्क से विरक्त हो चेतना तक पहुँच गया ,
सब कुछ जाना हुआ बुद्धि से बोध हो गया ॥

एक पल को वहाँ सिर्फ आनंद था ,
संसार न था ,
और फिर
सिर्फ एक स्थिर संसार , शेष ,
और बोध जो उसमें निर्बाध गति देखता रहा , बोध जो अविशेष था ,
(बोध जो न एक कहा जा सकता है न शून्य न ही अनंत , उसमें परिमाण का गुण नहीं , न ही कोई विशेषता ,
और इसीलिए वो हर परिमाण का आधार बनता है , समय का भी , गति का भी , कर्म का भी , न्याय का भी ) ॥

युवक को सदा से जीवन से लगाव था , फिर प्रेम से हुआ , फिर पानी से , और अब शांति से ,
जंगल में चर्चा थी , किसी बुद्धिमान मेंढक की फैलाई हुयी कि अमुक मेंढक बुद्धा गया ॥

उस समय एक मेंढक पौधे की छाँव में फुदक रहा था ,
एक तितली पंख फैला रही थी ,
और एक भंवरा फूल पर मंडरा रहा था ॥

" सब कुछ पुनः सोये हुए बुद्ध की शरण में "

....................... (बुद्धं शरणम् गच्छामि ) ...................

..............................................................................


अ से 

" कठ पुतली "

ये काष्ठकार जानता था ,
काठ के खिलौने आखिर कब तक मन बहलाते ,
जब बच्चों का मन भर जाता है तो वो नहीं खरीदे जाते ॥
पर प्रश्न जीवन का था हमेशा की तरह , और वो एक सृजन ही उसका कुल धन था !!
बस ,
फिर उसके दिल में ये ही उठता रहा की जब प्रश्न सदा से जीवन का ही है ,
तो क्यों न जीवन ही डाला जाए इन लकड़ी के खिलौनों में ,
और बात दिल में बैठ गयी ॥

मूर्त से अमूर्त तक सब कुछ छान डाला उसने ,
की कोई मिले जो उसके खिलौनों में जान फूंक सके ,
शास्त्र कहानियाँ सुन उसने शिव-पार्वती की आराधना की ,
पार्वती जी प्रसन्न हुयी , शिव जी की कृपा से खिलौने जीवंत हो उठे ,
काष्ठकार खुश हुआ और खिलोनों को पकड़ने दौड़ा ,
उसका हाथ लगते ही वो सब मिटटी हो गए ,
उसने पूछा ये क्या ,
शिव बोले- धर्म ! इन्हें जीवन तो मिल सकता है पर तुम्हे नियंत्रण नहीं इन पर ,
काष्ठकार बोला , प्रभू मुझे कोई और उपाय बताओ ,
शिव ने कहा किसी के जीवन पर तो तुम्हे अधिकार नहीं दिया जा सकता ,
पर इन पुतलों को जीवन की नक़ल दी जा सकती है ,
तुम इन्हें ऐसे ही दिखाओ जैसे ये जीवित हो जाते हों और अपनी आजीविका चलाओ ,
हाँ पर जब तुम इन्हें जीवित दिखाओ तो इन्हें हाथ लगाना जीवन धर्म के विरुद्ध होगा ये ध्यान रखना ॥

और तब पार्वती जी ने उसे कुछ " प्राकृत देव सूत्र " ,खिलोनों पर नियंत्रण के लिए दिए
और महादेव ने उसे दिए दो दिव्य ज्ञान , उसके खेल में रचना की दिक् दृष्टि से , " कला और कौशल " ,
और वो दोनों अपने स्वयं बोध में सिमट गए ॥


काफी मेहनत के बाद आखिर वो खुश था ,
उसकी उंगलियों के इशारे पर उसके खिलौने एक जादू रचने लगे थे ,
अपने काठ के पुतलों , देव सूत्रों और कला कौशल के सहारे वो जीवंत कर देता था एक कठपुतली , एक दृश्य ॥
( पुतला - बनावटी देह , पुतली - आँख का गोलक , कठ - जड़ ,सांसारिक )
( कठ पुतली का अर्थ सांसारिक आँख या सांसारिक दृश्य से है ॥ )

खेल तमाशा चलने लगा , मनोरंजन , ज्ञान , आश्चर्य और अनुभव हर तरह से ये पसंद किया जाने लगा ,
कहानियाँ फैलने लगी लोक मानस में ,
और हर सृजन की तरह इसकी भी शाखाएं फैली ॥

पर हर सृजन की तरह , रचनाकार अपनी ही रचना के मोह में फंस गया ,
न होते हुए भी , वो उसमें जीवन देखने लगा ,
आनुपातिक रूप से अब कठपुतलियाँ चेतन होने लगी और काष्ठकार जड़ , बुद्धि और आत्म के सम्बन्ध की तरह ,
उसे पुतले ( यहाँ मूर्त की तरह प्रयुक्त हुआ है ) में ममता हो गयी ,
वो उसके सहारे जीवन को अनुभूत करने लगा ,
उन कहानियों में बसने लगा , उसकी हर वेदना संवेदना के प्रति वो सजग हो उठा ,
उसे सजाने लगा , सर्दी गर्मी से बचाने लगा , अपने ख़ास पुतले की तरह दुसरे पुतलों में भी उसकी चेतना उलझने लगी ,
और एक दिन उसने खुद को एक काठ का पुतला पाया !!

वो अहम् गर्वित हो उठा ,
उसने फूंक दिए थे प्राण एक पुतले में ,
जिस पर वो नियंत्रण भी कर सकता था क्योंकि ये जीवन उसका स्वयं का था , जीवन धर्म के विरुद्ध न था ,
और वो उसकी सहायता से रच सकता था ,स्वांग ...
............................................................................... ( १/२ जारी )

कठपुतली (2/2) ....

गली - गली , दर - पहर , वो अब नए नए स्वांग रचाने लगा ,
नित्य अजब अनोखे आयामों से जीवन कठपुतलीयाँ गाने लगा ॥

अब रचना और रचनाकार अलग अलग नहीं थे ,
और ना ही कहानियाँ ,
कहानियाँ ही जिंदगी बन गयी थी ,
उनसे अलग अस्तित्व को देखा जा सकना संभव न था ॥

दिखावटी दुनिया का हिस्सा बन जाने पर , सच झूठ को अलग रख पाने का साहस ह्रदय खो देता है ,
अब वो बस उसके सुखों दुखों में रच बस सा जाता है ,
हर संभव प्रयास होता है , सुखों की प्राप्ति (राग) और दुखों से दूर जाने का (द्वेष) ,
अंतर्द्वंद अन्तः करण बन जाते हैं ,
सुकृत दुष्कृत नियमोंमयी जमुना सभ्यता पनपने लगती है ,
मूल भावों की गंगा मैली होने लगती है ,
और फिर वो दिन भी आता है जब यमुना का पानी भी प्यास नहीं बुझाता ,
अब वो शीतलता से गीलेपन की दिशा का रुख कर लेता है ,
नाभि चक्र की सजगता दिनों दिन घटने लगती है ,
अमृत बहता नहीं , घड़े में भरने लगता है , भार हो जाता है ॥

अब कठपुतलियाँ जन मानस का मन उकता चुकी थी ,
उन्हें चित्र विचित्र आयाम देने के बेमायनी प्रयास किये जाने लगे ,
पर इन उत्तेजनाओं और प्रमादमय प्रयासों से कौशल खोने लगा ,
कला चुकने लगी ,
कमजोर पड़े पुतलों की जान संकट में आने लगी ,
जर्जर प्रतिमानों की तरह से वो दर बदर ठोकरें खाने को मजबूर थे ,
शोक दुःख और बैचेनी रुपी अस्थिर वायु राक्षस सब ओर मंडराने लगे ,
सूरज का प्रकाश धरा तक रह रहकर पहुंचता था , बरसातें अब नियमित ना थी
कोई उपाय नज़र नहीं आता था ॥

और अब एक पुतला संकल्प ले बैठा फिर से काष्ठकार बनने का ,
उसने जाना था विगत कठपुतलियों से अपना इतिहास ,
उसने की शिव की आराधना ,
वैराग का अनुसरण किया ,
मथने लगा वो दृश्य सागर को ,
सत्य का घृत ऊपर आना जरूरी था ,
जिसकी नौका पर चेतना किनारे लगे ॥

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पर इसके लिए जरूरी था एक युद्ध ,
कर्तृत्व के काले नाग से ,
वो भी कृत संकल्प था ॥

वर्षों तक घोर संघर्ष हुआ ,
कर्म से कर्म को मिटाना संभव न था ,
कर्म पाला बदलने लगते थे ,
तब शिव ने उसे दी अपने तीसरे नेत्र की प्रकाश प्रतीति ,
अब वो अपने युद्धक कर्मों को एक नयी दृष्टि से देखने लगा ,
उसके कार्य उसे सत्य का बोध देने लगे ,
जो अगले कार्यों को बल देते थे ,
और युद्ध की दिशा पलटने लगी ,
अंततः
हर ओर प्रकाश भर गया , तीसरा नेत्र पल भर को सच हो उठा ,
वायु राक्षस आकाश सी शून्यता में लय हो गये ,
और फिर एक ज्योति पुंज हो कर शिव मस्तक में यथास्थान विराजमान हुआ ,
नाग का विष बुझ चूका था , वो भी शून्य शिव देह में कहीं रम गया ,
सभी पुतले अब तक स्थिर हो चुके थे ,
कहीं कोई विकृत गति शेष न थी ,
और गंगा का प्रवाह बड़ गया ॥

बहुत पुराना सा कोई दृश्य ताजगी शीतलता और नयापन लेकर धरा पर आसीन था ॥
----------------------------------------------------------------------(२/२ कठपुतली )

< अ-से >

The Thinker


"

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मैं उसी समय अपने घर के सभी दरवाजे बंद कर वहाँ दीवार लगा देता ,
जब ये आसान सा जान पड़ता सफ़र अगर ये बता देता की वो यूँ ही ख़त्म नहीं होता !!

तब तक कोई जल्दी नहीं थी मुझे , 
ना ही रूप परिवेश में कोई दिलचस्पी , 
तो आइना देखे बिना ही निकल पड़ा ,
अब लगता है काश वो ही देखा होता ...

दरवाजे के बाहर से गलियारे और मोहल्ले के छोर तक ,
हर दुआ सलाम करने वाले को मैंने प्यार से देखा ,
सफ़र बताया , रास्ता सलाहा , सर फिराया और फिर चल पड़ा ,
वो मुस्कुराए तो थे पर कुछ बता न पाए ,
शायद उन्हें अंदाजा भी न रहा होगा ,
जैसे मुझे ना था ,

सफ़र वास्तव में उतना मुश्किल नहीं था ,
जिनका उद्देश्य नितांत निश्चित था ,
उन्हें जल्द ही काम निपटा लौटते देखने की ,
और जो खासे बेईमान रहे थे अपने दिलों से
उनके भी अच्छी खासी दुनियादारी कमा
आधे रास्ते से ही लौट आने की कहानियाँ सुन चुका था मैं ,
मेरा कोई उद्देश्य भी था या नहीं
मुझे ध्यान नहीं आता ,
कुछ पाने की कभी कोई इच्छा भी नहीं रही ॥

तो मैं खालीपन के चौराहे पर ,
बिखरी हुयी बातों की सड़क को निहारता ,
उडती हुयी अफवाहों की गर्मी में ,
किसी भी आश्चर्य से अनजान खड़ा था ,
और तभी एक बेचैनी की तरह कोई बस आई ,
मेरी सोच का सफ़र शुरू हुआ ....

बस में मेरे अतीत के कई अलग अलग स्वभावों
और शक्ल की तरह के लोग थे ,
जो तरह तरह की धुन ओढ़े पहने ,
अपनी अपनी ढफलीयों पर गाते बजाते
और अपने ही गीत गुनगुनाते नज़र आते थे ,
कभी कभी कुछ दो चार की ताल बैठने लगती थी
पर ज्यादा देर तक नहीं ,
और अन्यथा ताल मिलाने का सबब ही न था ,
हाँ कुछ ताल ठोकते जरूर नजर आते थे ,

सब कुछ बातों का ही बना था ,
सब कुछ विचारों सा तैर रहा था ,
और उसमें एक समझ सा मैं रमने लगा ,
यही वो क्षण था जब मेरे खयाल में मेरा जन्म हुआ ,
शायद अभी तक तो मैं मेरे शांत घर की कोख में ही पल रहा था ,

" बस " अतीत के रास्ते पर बेतहाशा दौड़ने लगी
और बाहर के दृश्य धुंधलाने लगे ,
कुछ खासी यादें ही नज़र आती थी ,
और मैं रमने लगा ,
अब मुझे सहयात्रियों की चर्चाएं कुछ कुछ सुनाइ देने लगी ,
धर्म राजनीति खेल कूद और प्रेम
और न जाने किन किन विषयों के नदियाँ बह रही थी ,

मैं मन सा उनमें गोते खाने लगा ,
विषय विचार के बदलते ही भाव बदल से जाते थे ,
लोगों ने दल से बना लिए थे
और पक्ष विपक्ष की बातें होती थी ,
मुझे उनके हर पक्ष से इतर ,
कुछ न कुछ तो आसमान नज़र आता था ,
और मैं भी अपने बयान देने लगा ,
मेरे बयां किसी पक्ष में नहीं गए ,
वो जस की तस ,
कुछ नीरस और कुछ बहस रोकने की गुजारिश थी ,
तो कुछ अपनी ही दर्शन अभिव्यक्ति ,
और वो ऐसे में अपना हुल्लड़ छोड़ देने को कतई तैयार नहीं थे
मुझे या तो दोनों ही पक्ष सही और समान लगते थे
या फिर दोनों ही बेमायनी ,
पर उनके राग न मिलते ,
हाँ द्वेष कुछ एक सरीखे थे ,
तीसरे पक्ष की आलोचना पर वो एकमत से नज़र आते थे ,
मेरी कुछ बातों से वो प्रभावित होते तो थे ,
पर अपना पक्ष और ना जाने क्या खो देने के डर से पकडे रहते थे ,
वो अपनी अपनी मौज मस्तियों में डूबे हुए ,
बेतहाशा गाते हँसते और खुश रहते ,
कुछ स्वभाव मेरी ही तरह शांत थे ,
मेरे वक्तव्यों के समर्थन भी करते ,
पर उन्होंने किसी बेनतीजा बहस की उतपत्ति ,
और उसे बनाये रखने का कारण नहीं बनना चाहा ,
फिर भी जाने क्यों वो मुझे भाये ,
और कुछ एक ही सी बातों की मिठास भी फैली ,
मेरी ही बात को वो अपने ही अंदाज़ में किसी और तरह कहते ,
और उनकी ही किसी बात को मैं ,
सच कहूँ तो मुझे वो दो चार मानस ही सम समर्थ नजर आए ,
अन्य शोक और आशा के भंवर में फंसे हुए ॥

" और वो ही लोग आपको सच्चे लगते हैं जो आपके ही पक्ष में बोलें ,
फिर चाहे आप किसी पक्ष में हों किसी विपक्ष में या उदासीन "

" हर कोई अपनी ही मान्यताओं के प्रमाण तलाशता है ,
और जो कुछ सुनना चाहता है वही सुनता है ,
इसी से उसके अहम् को संतुष्टी मिलती है ,

" उदासीनता के पक्षी केंद्र की ओर उड़ान भरना पसंद करते हैं ,
इसके विपरीत सुख जैसे भावों की चाह रखने वाले ,
बाहर आकाश में पंख मारते भटकते फिरते हैं "

हर वृत्त के अन्दर वृत्त और उसके बाहर वृत्त की एक स्थिति है ,
और अब तक मुझे पता लग चुका है ,
की सोच और बहस के सफर में इन वृत्तों से बाहर नहीं निकला जा सकता ,
इन वृत्तों की खासियत ये है की ,
वक्रता त्रिज्या बढने के साथ ही ये उथले ,
और घटने पर गहरे व्याप्त और सूक्ष्म हो जाते हैं ,
पर निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता ॥

समय गुजरने लगा , रात अन्धियाने लगी ,
अपने अपने टिफ़िन खा चुकने पर कुछ स्वभावतः सो गए ,
कुछ सफ़र में छूट गए और कुछ अँधेरे में डूब गए ,
कुछ इतने गहरे चले गए की फिर नज़र न आये ,

और उस वक़्त पहली बार ,
मैं कोई भीड़ नहीं था ,
तब आप मुझे अकेला कह सकते हो ,
इतनी बातों , किस्सों , कहानियों ,
लोकोक्ति , मुहवारों , सीख , समझों की श्रुतियों के साथ ,
उस सफ़र पर मेरा वास्तविक सफ़र शुरू हुआ ,
और पहले दफा की ख़ामोशी में मुझे नींद आ गयी ,
बस के नाईट लैंप का रैंडम टाइमर सक्रीय हुआ ,
स्वप्नमय संसार में कोई रौशनी मुझे फिर से उसी सफ़र पर ले चली ,
मैं निर्णय , निश्चय , तत्व , मंजिल ,
उद्देश्य के रास्तों पर बेवजह भटकने लगा ,
रात गुज़र गयी ,
सुबह मैं फिर से उसी बस में था ,
थोडा और बेबस ॥

सोच के सफ़र में यात्रा करना और लौट आना दो अलग अलग चीजें है ,
इसके चलते इसके यात्री एक समय बाद रूप और भाव भी बदल लेते हैं ,
वोंग कार वाई की यादों की ट्रेन की तरह ये बस भी बस चलती रहती है ,
नो एस्केप का हॉर्न बजाते हुए ॥

कभी कभी इनसे बाहर झाँकने का सौभाग्य और अनुभव तो मिलता है , पर सब क्षणिक ,
मैंने कई किस्से कहानियाँ सुने हैं , जो केंद्र की तरफ एक दरवाजा बताते हैं ,
जिसकी तरफ अधिकतर उदासीन पक्षी जाते हैं , पर वो अदृश्य निर्जीव बिंदु है ,

और दूसरी तरफ मोह की बढती वक्रता , पागलपन का रूप लेने लगती है ,
ममत्व के किनोरों पर , अहम् की ऊँचाइयों से बने ये वृत्त ,
एक सर्पिलाकार सीढ़ीनुमा जाल बना लेते हैं ,
और इस सबके बीच में कहीं खो गया हूँ मैं .... //

अ से