
उसी समय अपने घर के सभी दरवाजे बंद कर वहाँ दीवार लगा देता ,
जब ये आसान सा जान पड़ता सफ़र अगर ये बता देता की वो यूँ ही ख़त्म नहीं होता !!
तब तक कोई जल्दी नहीं थी मुझे ,
ना ही रूप परिवेश में कोई दिलचस्पी ,
तो आइना देखे बिना ही निकल पड़ा ,
अब लगता है काश वो ही देखा होता ...
दरवाजे के बाहर से गलियारे और मोहल्ले के छोर तक ,
हर दुआ सलाम करने वाले को मैंने प्यार से देखा ,
सफ़र बताया , रास्ता सलाहा , सर फिराया और फिर चल पड़ा ,
वो मुस्कुराए तो थे पर कुछ बता न पाए ,
शायद उन्हें अंदाजा भी न रहा होगा ,
जैसे मुझे ना था ,
सफ़र वास्तव में उतना मुश्किल नहीं था ,
जिनका उद्देश्य नितांत निश्चित था ,
उन्हें जल्द ही काम निपटा लौटते देखने की ,
और जो खासे बेईमान रहे थे अपने दिलों से
उनके भी अच्छी खासी दुनियादारी कमा
आधे रास्ते से ही लौट आने की कहानियाँ सुन चुका था मैं ,
मेरा कोई उद्देश्य भी था या नहीं
मुझे ध्यान नहीं आता ,
कुछ पाने की कभी कोई इच्छा भी नहीं रही ॥
तो मैं खालीपन के चौराहे पर ,
बिखरी हुयी बातों की सड़क को निहारता ,
उडती हुयी अफवाहों की गर्मी में ,
किसी भी आश्चर्य से अनजान खड़ा था ,
और तभी एक बेचैनी की तरह कोई बस आई ,
मेरी सोच का सफ़र शुरू हुआ ....
बस में मेरे अतीत के कई अलग अलग स्वभावों
और शक्ल की तरह के लोग थे ,
जो तरह तरह की धुन ओढ़े पहने ,
अपनी अपनी ढफलीयों पर गाते बजाते
और अपने ही गीत गुनगुनाते नज़र आते थे ,
कभी कभी कुछ दो चार की ताल बैठने लगती थी
पर ज्यादा देर तक नहीं ,
और अन्यथा ताल मिलाने का सबब ही न था ,
हाँ कुछ ताल ठोकते जरूर नजर आते थे ,
सब कुछ बातों का ही बना था ,
सब कुछ विचारों सा तैर रहा था ,
और उसमें एक समझ सा मैं रमने लगा ,
यही वो क्षण था जब मेरे खयाल में मेरा जन्म हुआ ,
शायद अभी तक तो मैं मेरे शांत घर की कोख में ही पल रहा था ,
" बस " अतीत के रास्ते पर बेतहाशा दौड़ने लगी
और बाहर के दृश्य धुंधलाने लगे ,
कुछ खासी यादें ही नज़र आती थी ,
और मैं रमने लगा ,
अब मुझे सहयात्रियों की चर्चाएं कुछ कुछ सुनाइ देने लगी ,
धर्म राजनीति खेल कूद और प्रेम
और न जाने किन किन विषयों के नदियाँ बह रही थी ,
मैं मन सा उनमें गोते खाने लगा ,
विषय विचार के बदलते ही भाव बदल से जाते थे ,
लोगों ने दल से बना लिए थे
और पक्ष विपक्ष की बातें होती थी ,
मुझे उनके हर पक्ष से इतर ,
कुछ न कुछ तो आसमान नज़र आता था ,
और मैं भी अपने बयान देने लगा ,
मेरे बयां किसी पक्ष में नहीं गए ,
वो जस की तस ,
कुछ नीरस और कुछ बहस रोकने की गुजारिश थी ,
तो कुछ अपनी ही दर्शन अभिव्यक्ति ,
और वो ऐसे में अपना हुल्लड़ छोड़ देने को कतई तैयार नहीं थे
मुझे या तो दोनों ही पक्ष सही और समान लगते थे
या फिर दोनों ही बेमायनी ,
पर उनके राग न मिलते ,
हाँ द्वेष कुछ एक सरीखे थे ,
तीसरे पक्ष की आलोचना पर वो एकमत से नज़र आते थे ,
मेरी कुछ बातों से वो प्रभावित होते तो थे ,
पर अपना पक्ष और ना जाने क्या खो देने के डर से पकडे रहते थे ,
वो अपनी अपनी मौज मस्तियों में डूबे हुए ,
बेतहाशा गाते हँसते और खुश रहते ,
कुछ स्वभाव मेरी ही तरह शांत थे ,
मेरे वक्तव्यों के समर्थन भी करते ,
पर उन्होंने किसी बेनतीजा बहस की उतपत्ति ,
और उसे बनाये रखने का कारण नहीं बनना चाहा ,
फिर भी जाने क्यों वो मुझे भाये ,
और कुछ एक ही सी बातों की मिठास भी फैली ,
मेरी ही बात को वो अपने ही अंदाज़ में किसी और तरह कहते ,
और उनकी ही किसी बात को मैं ,
सच कहूँ तो मुझे वो दो चार मानस ही सम समर्थ नजर आए ,
अन्य शोक और आशा के भंवर में फंसे हुए ॥
" और वो ही लोग आपको सच्चे लगते हैं जो आपके ही पक्ष में बोलें ,
फिर चाहे आप किसी पक्ष में हों किसी विपक्ष में या उदासीन "
" हर कोई अपनी ही मान्यताओं के प्रमाण तलाशता है ,
और जो कुछ सुनना चाहता है वही सुनता है ,
इसी से उसके अहम् को संतुष्टी मिलती है ,
" उदासीनता के पक्षी केंद्र की ओर उड़ान भरना पसंद करते हैं ,
इसके विपरीत सुख जैसे भावों की चाह रखने वाले ,
बाहर आकाश में पंख मारते भटकते फिरते हैं "
हर वृत्त के अन्दर वृत्त और उसके बाहर वृत्त की एक स्थिति है ,
और अब तक मुझे पता लग चुका है ,
की सोच और बहस के सफर में इन वृत्तों से बाहर नहीं निकला जा सकता ,
इन वृत्तों की खासियत ये है की ,
वक्रता त्रिज्या बढने के साथ ही ये उथले ,
और घटने पर गहरे व्याप्त और सूक्ष्म हो जाते हैं ,
पर निकलने का कोई रास्ता नज़र नहीं आता ॥
समय गुजरने लगा , रात अन्धियाने लगी ,
अपने अपने टिफ़िन खा चुकने पर कुछ स्वभावतः सो गए ,
कुछ सफ़र में छूट गए और कुछ अँधेरे में डूब गए ,
कुछ इतने गहरे चले गए की फिर नज़र न आये ,
और उस वक़्त पहली बार ,
मैं कोई भीड़ नहीं था ,
तब आप मुझे अकेला कह सकते हो ,
इतनी बातों , किस्सों , कहानियों ,
लोकोक्ति , मुहवारों , सीख , समझों की श्रुतियों के साथ ,
उस सफ़र पर मेरा वास्तविक सफ़र शुरू हुआ ,
और पहले दफा की ख़ामोशी में मुझे नींद आ गयी ,
बस के नाईट लैंप का रैंडम टाइमर सक्रीय हुआ ,
स्वप्नमय संसार में कोई रौशनी मुझे फिर से उसी सफ़र पर ले चली ,
मैं निर्णय , निश्चय , तत्व , मंजिल ,
उद्देश्य के रास्तों पर बेवजह भटकने लगा ,
रात गुज़र गयी ,
सुबह मैं फिर से उसी बस में था ,
थोडा और बेबस ॥
सोच के सफ़र में यात्रा करना और लौट आना दो अलग अलग चीजें है ,
इसके चलते इसके यात्री एक समय बाद रूप और भाव भी बदल लेते हैं ,
वोंग कार वाई की यादों की ट्रेन की तरह ये बस भी बस चलती रहती है ,
नो एस्केप का हॉर्न बजाते हुए ॥
कभी कभी इनसे बाहर झाँकने का सौभाग्य और अनुभव तो मिलता है , पर सब क्षणिक ,
मैंने कई किस्से कहानियाँ सुने हैं , जो केंद्र की तरफ एक दरवाजा बताते हैं ,
जिसकी तरफ अधिकतर उदासीन पक्षी जाते हैं , पर वो अदृश्य निर्जीव बिंदु है ,
और दूसरी तरफ मोह की बढती वक्रता , पागलपन का रूप लेने लगती है ,
ममत्व के किनोरों पर , अहम् की ऊँचाइयों से बने ये वृत्त ,
एक सर्पिलाकार सीढ़ीनुमा जाल बना लेते हैं ,
और इस सबके बीच में कहीं खो गया हूँ मैं .... //
अ-से
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