Apr 10, 2014

खिड़कियाँ निहारती है पंखे को



खिड़कियाँ निहारती है पंखे को
फिर एक लम्बी साँस छोड़
झुका लेती है आँखें !
बल्ब चमकते रहते हैं बेसबब 
रोशनी तो बिखरती है पर खुशियाँ नहीं !

मकड़ियां थक कर सो चुकी हैं अपने जालों में
कई जगह से टूट चुके हैं तार उनके !
किताबें अवसाद में लेटी हुयी हैं
धूल भरी चादर औढ़ कर
उनमें कहानियाँ तो हैं पर आवाज़ नहीं है !
अ से

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