खिड़कियाँ निहारती है पंखे को
फिर एक लम्बी साँस छोड़
झुका लेती है आँखें !
फिर एक लम्बी साँस छोड़
झुका लेती है आँखें !
बल्ब चमकते रहते हैं बेसबब
रोशनी तो बिखरती है पर खुशियाँ नहीं !
रोशनी तो बिखरती है पर खुशियाँ नहीं !
मकड़ियां थक कर सो चुकी हैं अपने जालों में
कई जगह से टूट चुके हैं तार उनके !
कई जगह से टूट चुके हैं तार उनके !
किताबें अवसाद में लेटी हुयी हैं
धूल भरी चादर औढ़ कर
उनमें कहानियाँ तो हैं पर आवाज़ नहीं है !
धूल भरी चादर औढ़ कर
उनमें कहानियाँ तो हैं पर आवाज़ नहीं है !
अ से
No comments:
Post a Comment