बारिश के बाद के आसमान में सुनाई देती आवाज सा
स्पष्ट उभरा हुया तुम्हारा अस्तित्व
दूब पर ठहरी हुयी ओस जैसी तुम्हारी स्वच्छ सजल देह
पहाड़ों पर बिछी हुयी कोई बर्फ की धुली हुयी चादर सी हो तुम
मात्र प्रेम के चारों ओर खुद को बुनती हुयी
आगे की ओर बढती हुयी नर्म कोमल लताओं सी
हर पल सजग
हर कतरा समर्पण
दे दी जाती हुयी जीवन को
कुछ हासिल कर लेने के मद में बलात लिप्त और मोहित पुरुष को
अपने स्पर्श और इशारों से समझाती शक्ति का उपयोग और संचयन
तुम भद्रता का मूर्त उद्धरण
और अनुशासन का उदाहरण
अस्तित्व के छोर तक गहरी तुम्हारी संवेदनाएं
भूख तृप्ति और तुष्टि को कौन जानता है तुम से बेहतर
प्रकृति सरीखी कहीं ऊंची कहीं गहरी
और कहीं घुमावदार तुम्हारी देह
फिर भी हर अंश सरल हर दंश संवेदन
आँखों में सुबह की नर्म धूप सी
सहज सरल और खिली हुयी चमक लिए
खिलखिलाती हुयी नदी जैसी लहराती तुम्हारी बातें
तरंगित लहक लिए हुए तुम्हारी आवाज
स्वच्छ धवल आँखें
जीवन के प्रति आश्वस्त निगाहें
सुन्दर कल्पनाओं में
वास्तविकता का रंग भरती हुयी अनुरक्ति
कोई आश्चर्य नहीं की दिल दुनिया और
दौड़ती हुयी जिन्दगी के किस्से
सब तुम्हारे ही इर्द गिर्द बुने हुए हैं
एक पथरायी हुयी रात की मूरत सा खामोश पुरुष
और एक चहकती हुयी सुबह की दिनचर्या सी दीप्त तुम
तुम्ही तो हो
जो जीवन की अनावश्यकता
दुःख दर्द आँच ताप
और अँधेरे से ऊबे हुए
भटकते हुए पुरुष मन में
भरती हो उमंग
दिखाती हो राह
नारी !
राह भी तुम
रास्ते की छाँव भी तुम
और जिससे मिल कर
हो जाता है पुरुष पूर्ण
वो आखिरी ठौर भी तुम
अ से
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