अलविदा के लिए शब्द तलाशते ,
खामोश मन के गहरे संवेदन ,
और धुंधलाते परिदृश्य के बीच ,
वो मासूम चेहरा ,
चेहरा , जो उस वक़्त ,
अधिक मायने रखता था ,
किसी भी और बात से ,
जो समेटे था अपने में ,
मेरा पूरा संसार ,
और जिस पर चमकती थी ,
दो बड़ी बड़ी आँखें ,
आँखे , जो स्थिर थी मुझ पर ,
शब्दहीन , खामोश , अनजान सी ,
जो जानती नहीं थी ,
आने वाला पल ,
डबडबाने लगी ,
बिना हॉर्न दिए चलने लगी ट्रेन के साथ ,
ट्रेन , जो दूर जा चुकी थी ,
कुछ ही पल में ,
जबकि अभी वो पल ,
उतरा भी नहीं था , जहन में ठीक से
आँखों में थी बस अब ,
खाली पटरियां ,
और भर आये आंसू ,
आंसु , जिनको थामने का प्रयास ,
देने लगा गति ,
क़दमों को अनायास ,
परिदृश्य को चीरता ,
दौड़ने लगा मन ,
मन , जो अब ,
चाहता नहीं था रुकना कहीं ,
दौड़ता रहा , तब तक ,
जब तक अधखुला था ,
दुःख का संसार ,
दुःख , जो एक बीज सा ,
चला जा रहा था उड़ता हुआ ,
उस जमीन की तलाश में ,
जहाँ हो सके वो नम ,
और पाते ही वो जमीन ,
समा गया अँधेरे में ,
अँधेरा , जहाँ कुछ और नहीं था ,
सिवाय खामोश टपकते आंसुओं के ,
उस ट्रेन के साथ दौड़ती यादों के ,
और खाली पटरी सरी चाहत के ,
चाहत , आखिरी दो शब्द की ,
जो फंस गए थे कहीं ,
उस आखिरी पल
और पटरियों पर फिसलते वक़्त के बीच ,
शब्द जो दब गए ,
जो पकड़ नहीं पाए ,
उस ट्रेन की साजिश और गति को ,
शब्द , जो आज तक तलाशते हैं ,
अपना मुकाम ,
वो दिल ,
जहाँ बोये जाने थे वो ,
अलविदा के लिए , रखे हुए ,
प्रेम बीज !!
अ-से
खामोश मन के गहरे संवेदन ,
और धुंधलाते परिदृश्य के बीच ,
वो मासूम चेहरा ,
चेहरा , जो उस वक़्त ,
अधिक मायने रखता था ,
किसी भी और बात से ,
जो समेटे था अपने में ,
मेरा पूरा संसार ,
और जिस पर चमकती थी ,
दो बड़ी बड़ी आँखें ,
आँखे , जो स्थिर थी मुझ पर ,
शब्दहीन , खामोश , अनजान सी ,
जो जानती नहीं थी ,
आने वाला पल ,
डबडबाने लगी ,
बिना हॉर्न दिए चलने लगी ट्रेन के साथ ,
ट्रेन , जो दूर जा चुकी थी ,
कुछ ही पल में ,
जबकि अभी वो पल ,
उतरा भी नहीं था , जहन में ठीक से
आँखों में थी बस अब ,
खाली पटरियां ,
और भर आये आंसू ,
आंसु , जिनको थामने का प्रयास ,
देने लगा गति ,
क़दमों को अनायास ,
परिदृश्य को चीरता ,
दौड़ने लगा मन ,
मन , जो अब ,
चाहता नहीं था रुकना कहीं ,
दौड़ता रहा , तब तक ,
जब तक अधखुला था ,
दुःख का संसार ,
दुःख , जो एक बीज सा ,
चला जा रहा था उड़ता हुआ ,
उस जमीन की तलाश में ,
जहाँ हो सके वो नम ,
और पाते ही वो जमीन ,
समा गया अँधेरे में ,
अँधेरा , जहाँ कुछ और नहीं था ,
सिवाय खामोश टपकते आंसुओं के ,
उस ट्रेन के साथ दौड़ती यादों के ,
और खाली पटरी सरी चाहत के ,
चाहत , आखिरी दो शब्द की ,
जो फंस गए थे कहीं ,
उस आखिरी पल
और पटरियों पर फिसलते वक़्त के बीच ,
शब्द जो दब गए ,
जो पकड़ नहीं पाए ,
उस ट्रेन की साजिश और गति को ,
शब्द , जो आज तक तलाशते हैं ,
अपना मुकाम ,
वो दिल ,
जहाँ बोये जाने थे वो ,
अलविदा के लिए , रखे हुए ,
प्रेम बीज !!
अ-से
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