" कुर्सी "
किसी दार्शनिक दर्जी की सुन्दर परिकल्पना
कुर्सी , एक आराम दायक वस्त्र ,
अस्तित्व को सुकून से ढक लेती है ,
दुनिया से अलग , अलग सी दुनिया की सवारी ,
हाथ बाँध कर मेरे , मुझे खुद में समा लेती है ,
अब मैं कहीं नहीं जाता , न ही ये कुर्सी ,
जैसे आकाश में खूंटा गढ़ाया , कोई अलहदा एहसास ,
रुका हुआ सा मैं अब , बदलता परिदृश्य ,
कोई खामोश सफ़र ध्वनित आवाजाही ,
अतीत की समय यात्रा पर , भविष्य की योजनायें बुनता ,
कुर्सी वर्तमान को मूर्त कर देती है ॥
........................................................अ-से अनुज ॥
किसी दार्शनिक दर्जी की सुन्दर परिकल्पना
कुर्सी , एक आराम दायक वस्त्र ,
अस्तित्व को सुकून से ढक लेती है ,
दुनिया से अलग , अलग सी दुनिया की सवारी ,
हाथ बाँध कर मेरे , मुझे खुद में समा लेती है ,
अब मैं कहीं नहीं जाता , न ही ये कुर्सी ,
जैसे आकाश में खूंटा गढ़ाया , कोई अलहदा एहसास ,
रुका हुआ सा मैं अब , बदलता परिदृश्य ,
कोई खामोश सफ़र ध्वनित आवाजाही ,
अतीत की समय यात्रा पर , भविष्य की योजनायें बुनता ,
कुर्सी वर्तमान को मूर्त कर देती है ॥
........................................................अ-से अनुज ॥
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