
बहती हैं , विचारों की हवायें ,
बहती हैं , बहती रहती हैं , दूर तक ,
चेतना जैसे ही इनका पीछा करती है ,
और हवाओं का स्पर्श भर करती है ,
अचानक से साकार हो जाता है कोई दृश्य ॥
दृश्य ,
अनदेखा दृश्य ,
सुनहला दृश्य ,
मादक हो उठता है अचानक ,
सब रंग बिरंगा सा हो जाता है ,
दृश्य घुलने लगते हैं ,
पिघलने लगते हैं ,
रसमय हो उठते हैं ,
इतने , की टपकने लगता है रस ॥
और रसने लगती है चेतना ,
बूंदों के पीछे , नीचे तक ,
तब तक , जब तक वो रस सूख नहीं जाता ,
और अचानक सब थम जाता है ,
सूखा हुआ रस एक सतह सा बना लेता है ,
अब वो गहरे भूमिल रंग का होने लगता है ,
और उससे उठने लगती है , महक ॥
महक चेतना को नया आयाम देती है ,
एक दिशा देती है ,
पर साथ ही मादकता भी परवान चढ़ती है ,
अचानक , अब सब कुछ सजीव हो उठता है ,
कुछ फूल खिल आते हैं , कुछ लताएं ,
और कहीं से आ जाते हैं तितलियाँ और भँवरे ,
चारों और जीवन बहने लगता है ,
निर्वात गुनगुनाने लगता है ,
और सोच में पड़ी चेतना ले लेती है एक रूप ,
इंसान का ॥ ................................................................ अ-से अनुज ॥ (सृजन)
( painting .. is of great painter Van Gogh )
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