Oct 16, 2013

अश्वत्थ सा आत्मकेन्द्रित, तुलसी सा रतमग्न विज्ञान ,
साध, भक्ति और समर्पण के साथ ।

गन्ने और बाँस सा बढता उत्तरोत्तर ज्ञान ,
सुगंध और मिठास की निश्चित दिशा लिए ।

आम्र सा फलदायी , नीम सा गुणकारी ,
अपने को उपयोगी बनाने की होड़ में ।

विध्या के पौधे सा निर्वेद ,
शाखाओं की अनन्तता का भान कराता हुआ ।

वृक्ष से मूल , पौधे से बीज तक की यात्रा है ज्ञान विज्ञान ,
ना की बरगद की तरह फैलते विचारों को अस्तित्व देने का नाम ।

जमीन पानी और हवा हर जगह जडें फ़ैलाने वाला ,
सारे रसों और वेदनाओं में फंसा हुआ ,
हर ओर बढता फिर भी दिशाहीन ,
बिना लक्ष्य फैलता ,
कुबेर की तरह संचय को ही जीवन माने हुए ।

एक प्राचीन कहावत है , " बरगद और पीपल एक दुसरे की छाया तले नहीं पनपते " ,
कुछ ऐसी ही स्थिति वर्तमान दुनिया में उन लोगों की है ,
जिनके लिए जीवन साधना और बोधि-वृक्ष हुआ करता है ॥

................................ < अ-से > .............................................

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