जब वक़्त मुड़ कर नहीं देख पाता ,
तो इतिहास खुद को दोहराता क्यों है ॥
गुनाह नहीं जब कुछ भी जमी पर ,
फिर बाद में कोई पछतावा क्यों हैं ॥
इंसान के सिवा सब मूक पशु हैं ,
तो आपस में फिर बतियाते क्यों हैं ॥
जब धूप उड़ा देती है रंग सबका ,
तो पत्तियों में रंग भर आता क्यों है ॥
गर अमृत नहीं धरा पे जब ,
तो सावन में सब हरियाता क्यों है ॥
नहीं अगर वास्ता अब मुझसे ,
फिर फिर कोई लौट आता क्यूँ है ॥
अगर नहीं बची है इंसानियत दिल में ,
तो कोई मासूम बचपन की याद दिलाता क्यूँ है ॥
.......................................................अ-से अनुज ॥
तो इतिहास खुद को दोहराता क्यों है ॥
गुनाह नहीं जब कुछ भी जमी पर ,
फिर बाद में कोई पछतावा क्यों हैं ॥
इंसान के सिवा सब मूक पशु हैं ,
तो आपस में फिर बतियाते क्यों हैं ॥
जब धूप उड़ा देती है रंग सबका ,
तो पत्तियों में रंग भर आता क्यों है ॥
गर अमृत नहीं धरा पे जब ,
तो सावन में सब हरियाता क्यों है ॥
नहीं अगर वास्ता अब मुझसे ,
फिर फिर कोई लौट आता क्यूँ है ॥
अगर नहीं बची है इंसानियत दिल में ,
तो कोई मासूम बचपन की याद दिलाता क्यूँ है ॥
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