Feb 25, 2015

koan



कितने कोआन  थे यहाँ , 
अब तलाशो तो एक नहीं ,
एक पहेली थी तुम , 
जब तक मुझे पता ना था ,
मैं सुलझाता था तुम्हें , 
थोड़ा और उलझ जाता था ,

तुम्हें डर था समय से पहले अपना जादू खो देने का
मुझे खोज लेना था बाहर का एक रास्ता समय रहते 
पर ना तो तुम जादूगरनी थी ना मुझे ही कहीं जाना था ।
कैसा जादू है तुम्हारा कि अब 
मुझ पर कोई जादू नहीं चलता
कैसा जादू है तुम्हारा 
जो खत्म नहीं हुआ पर अब असर नहीं करता
कैसी पहेली हो तुम 
जो उलझी हुयी हो पर सुलझा दिया है मुझे
और कैसा मैं हूँ कि
मेरे पास नहीं है कोई रास्ता 
पर चले जाना है ।

Feb 24, 2015

इतना अकेला सा था कुछ


इतना अकेला सा था कुछ

जैसे सब कुछ हो अकेला अकेला
और सब कुछ रुका पड़ा हो साथ में ।
भरे हुये प्लेटफार्म से सबको लेकर 
जाने के बाद दोनों ट्रेन के
एक दायें और एक बाएँ
के बीचों बीच का निर्जीव शून्य ।
इतना खोया सा था कुछ
जैसे सब कुछ हो खोया खोया
और सब कुछ दिख रहा हो सामने ।
पूरे संसार को समेटकर एक फूल में
दे दिये जाने के बाद किसी को
लबों से सुनाई पड़े इनकार
के ठीक सामने की गहरी उदासी ।
इतना अधूरा सा था कुछ
जैसे सब कुछ हो अधूरा अधूरा
और पूरा का पूरा बैठा हो साथ में ।
अपनी हक़ीक़त से लड़कर
अपराध बोध के साथ
सागर किनारे नाराज़
साथ बैठा हुआ ख्वाब ।
अ से

Feb 21, 2015

विपर्यय : 1


लहर लहर प्रवाहमान
जल की तरंगों में
वृक्ष बन देखता हूँ
अपना अक्स
किसी रस्सी सा 
और बहने लगता हूँ
किसी सर्प सा !
अ से

प्रेम पाषाण


तुम मत झाँको उसमें गहरे
भले ही वो ये चाहती है
वो नहीं छिपा पाएगी अपना प्रेम
तुम कोशिश भी मत करो झाँकने की ।
तुम मत पूछो उससे फिर फिर 
कि क्या उसे प्रेम है तुमसे
कि कितना प्रेम है उसे तुमसे
भले ही वो ये चाहती है
वो नहीं जता पाएगी अपना प्रेम
तुम कोशिश भी मत करो जानने की ।
तुम मत समझाओ उसे कुछ भी
कि क्या नहीं करना चाहिए उसे
कि उसका क्या करना पसंद है तुम्हें
कि कैसा देखना चाहते हो तुम उसे
भले ही वो ढल जाएगी वैसे
पर नहीं रह पाएगी वो स्वाभाविक
वो नहीं रह पाएगी जो वो है ॥
यदि तुम प्रेम करना चाहते हो उसे
उसे करने दो ।
उसकी आँखों में खुद ही उतर आएगी
एक परत नमी की
तुम्हारे देखते ही
और तुम्हारे देखते ही देखते
उड़ जाएगी धूप में ओस बनकर
और महक जाएगा उसका प्रेम ।
और वो करेगी
वो सब कुछ
जैसा तुम चाहते हो
वो ढल जाएगी
अकहे ही तुम्हारे प्रेम में ॥
वो पाषाण है
ठोस भावनाओं की
जो बन जाएगी
एक सुंदर मूरत
ये उसका स्वभाव है ।
मत चोट करो उस पर
उसे मत कुरेदो
मत खुरचो
वो ढल जाएगी
तुम्हारी उपस्थिती मात्र से ॥
वो है एक पाषाण
प्रेम पाषाण ॥

अ से 

एक ताजा सुबह


पूर्व के वृक्ष पर
खिलता एक लाल गुलाब
महकती सुगंध रौशनी की
पत्तियों की चहचहाट
बिना और कोई आवाज़ ।
हवा का पूर्ण परास
पवित्रता की श्वास
शीतलता के होठों का
पलकों पर आश्वास ।
मृत्यु के हाथों
सौंप दी गयी सत्ता
नए दिन का जन्म
एक ताजा सुबह ।

अ से 

Feb 20, 2015

पुरस्कार


उनके पास बहुत से हैं
सो वो दे देते हैं या बाँट देते हैं
कि पुरस्कार
अहंकार है देने वालों का
सम्मान के वस्त्रों में
अपने कोषागार में से
वो बाँट देते हैं एक अंश अपने दंभ का ।
ये उत्सुकता है पाने की
कुछ पा जाने की ललक
हर उस चीज के लिए जो बँट रही हो
महत्वपूर्ण है कितना मिल रहा है
क्या बँट रहा है से ,
कि सम्मान भी किसी वस्तु की तरह बँटता है
फिर फिर अपने को दे की तर्ज पर ।
पारितोषिक साधन है सामान्यतः
किसी की जीविका का
पर पुरस्कार
पुरस्कार एक तिरस्कार है
किसी काम की खूबसूरती के साथ
अपना नाम जोड़ने का
सम्मान का अपमान
एक बड़े मंच पर की गयी जादूगरी
जिसका भेद कैद होता है पर्दे के पीछे
बड़ी कुशलता से मारे गए पंछियों में ।
पुरस्कार दिया जा रहा है या लिया जा रहा है
क्या सचमुच ये किसी के काम का कोई सम्मान है
कि उसे घोड़ों के साथ रेस में दौड़ा दिया जाये
या तय कर दी जाये कीमत खूबसूरत काम की
या बड़ा दी जाये उसके नाम की ।
उनके पास बहुत से हैं
जब उन्हे देने होंगे तो वो दे देंगे
किसी भी नाम से
जब उन्हे बांटने होंगे वो बाँट देंगे
किसी भी काम पर
वो राजा है स्व्यंसिद्ध
वो निर्णायक है महाभारत के
वो रचयिता है किसी की नियति के
और वास्तव में
वो ही हक़दार हैं सच्चे पुरस्कार के
कि देखते ही बनती है
जुगाड़ बैठाने वालों की कुशलता ।
अ से

और जब गर्भ का स्पंदन खो गया ...


और जब गर्भ का स्पंदन खो गया
सृष्टि का अज्ञातमात्र सो गया
चेत का समवेत स्वर लुप्त हो गया
सृजन का मूल शब्द सुप्त हो गया
ब्रह्मा बिखर कर वेदहीन हो गया
संसार विसर्ग में विहीन हो गया ।
एक पल को
शिव ने शक्ति को जीर्ण कर दिया
कारण अकारण सब क्षीर्ण कर दिया
अब प्रकाश के लिए आकाश ना हुआ
आकाश के लिए अवकाश ना हुआ
वियोगी अंतर्ध्यान रहा
शून्य , एक , सब अ-मान रहा ।
तभी वो पल किसी में लीन हो गया
गिना ना जा सका बस तीन हो गया
शिव को अपना भान हो आया
फिर से शक्ति का ध्यान हो आया
आकाश का अवकाश समाप्त हो गया
प्रकाश दिक-काल में व्याप्त हो गया
शिव से आत्म में बैठा ना गया
इतना प्रचंड समेटा ना गया ।
एक से तीन हुये तीन से नो
बिखर गए शक्ति में कण कण हो
सब ओर भ्रम पर कहीं कोई योग नहीं
महामाया पर चल सका कोई प्रयोग नहीं
और तब
हार कर क्षरण ली फिर अपनी ही शक्ति की
हाथ जोड़ नमन कर महामाया की भक्ति की ।
अ से

Feb 14, 2015

यिन येन


वो दोनों परस्पर
आते हैं सामने
मिलना चाहते हैं
मिल जाना चाहते हैं ।
एक दायें झुकता है
दूसरी बाएँ
हो जाते हैं
यिन और येन
एक दायें झुकती है
दूसरा बाएँ ।
और फिर
हर दिशा प्रतिदिशा में
घूमते हैं
एक लयबद्ध गति में
नृत्य करते हैं
बहते संगीत में
मिल जाना चाहते हैं
घुल जाना चाहते हैं ... ।
और ठहर जाते हैं ।
ठहरकर
देखते हैं शून्य में
फैली एक मुस्कान को
दूर होती थकान को ।
और
देखते देखते
बहने लगते हैं
तीसरी दिशा में ... ।
बह जाते हैं ।

its a koan

its a koan ,
what is it she want
and i asked not
and i will never
may it took 
the time for ever
as i want it
to work in my favour
so the magic of it
lose must not .
i want to work
and work upon
i want to think
and think for long
i have to know it
so i will prolong
untill it shapes me
into what she want .

Feb 13, 2015

देह मुक्त कर देना चाहती है ...


देह मुक्त कर देना चाहती है आत्मा को मेरी ,
आत्मा चीखती है अँधेरों से घबराकर
और कोई आवाज़ भर नहीं होती
कि शब्द स्फुटित नहीं होते ।
आत्मा जकड़े रहना चाहती है देह को मेरी ,
देह जलने लगती है रौशनी में आकर
और कोई बुझा नहीं पाता इसे
कि प्यास बुझती नहीं है ।
अ से

Feb 11, 2015

मैं देखता हूँ अपने आस पास ...


नींद खुलती है और मैं देखता हूँ अपने आस पास
सबकुछ , अँधेरा और रौशनी और अपनी ऊर्जा
महसूस करता हूँ ,
और उठ बैठता हूँ ,
बिस्तर से उतरता हूँ कदम जमीन पर रखता हूँ 
और लड़खड़ाता हूँ चलने की कोशिश में
और संतुलन को पुनः स्मृत कर संभल जाता हूँ
मैं चलने लगता हूँ ।
मैं चलने लगता हूँ भोर की रौशनी में
दिन धूप भाग दौड़ करता हूँ
और फिर शाम को सहेज लाता हूँ बचे हुये पल
बची हुयी ऊर्जा के
फिर से स्मृत करता हूँ अपना संतुलन
पंजों को आराम देता हूँ
और अँधेरा घिर आता है ।
अभी बहुत कुछ है जिसे आराम देना है पर
अभी काफी वक़्त है फिर से सुबह होने में
और उतार देता हूँ ये वस्त्र
कि अभी इनकी जरूरत नहीं ।
अ से

एक प्रश्न था


एक प्रश्न था
दो उत्तर थे
तीन दृष्टियाँ
चार रास्ते थे
पाँच मुख 
और छः मन ।
अ से

Feb 10, 2015

वक्त खामोश है

1.
वक्त खामोश है
पर लहरोँ का शोर सुनाई देता है
और कभी कभी सुनाई देती है 
खामोशी उसकी ,
कभी कभी ही तो शांत होती है वो
या अक्सर तब जब वो उदास होती है ।
शांत रातोँ मेँ मन का पोत इसी तरह हिलोरेँ खाता है ,
जब कुछ गुज़र जाता है तो वो एक लहर बन जाता है
और हर एक लहर के साथ थोड़ा और ठहर जाते हैँ हम ।
वो भी रात के खाली आसमान सी
ठहर चुकी है
और हर एक गुज़रते लफ्ज़ के साथ
गहराती जाती है
और उस गहराई से उठती रहती हैँ
अनजान बातें ,
जिनमेँ से कुछ भूलता रहता हूँ और कुछ
रह जाती है ठहरी हुयी
अगर साथ होता कुछ और वक्त
कुछ और लहरेँ उठती ,
कुछ और ठहर जाते
हम लोग ।
घड़ियाँ घूम रही हैँ पर अब उनमेँ
आकर्षण नहीँ इंतज़ार का
वो टहल रही हैँ किसी बूढ़ी सुन्दरी सी
बिना किसी उम्मीद
और मैँ इन ठहरी हुयी आँखो से
नहीँ देखता कुछ सिवाय
चित्राये हुये एक स्वप्न के
जिसमेँ चलती हैँ कुछ लहरेँ
आँखों में लगती हवा की
और कुछ ठहर गयी हैं वहीं ।
जैसे जैसे जवान होती है ये रात
ये लहरेँ होती हैँ अपने शबाब पर
पर फिर बूढ़ी होती रात के साथ ही ये भी
दम तोड़ने लगती हैँ किसी ख्वाब की तरह
और फिर से होती है एक सुबह
और फिर से शुरु होता है
रात का इंतेज़ार ।

 2. 
वक्त खामोश है
पर मन
घूमता रहता है अब भी 
सँकरे गलियारोँ मेँ इसके ,
तलाशता है
जाना पहचाना चेहरा कोई
कोई जगह सुकूनबख्श ,
ये ठहर सके जहाँ
और भर सके फेफड़ोँ को
आश्वस्तता से ।
इस प्रपञ्च को लगातार
देखते सुनते समझते
बोझिल हो जाता ये मन
चाहता है
अलग कर लेना खुद को
पर सूखने लगते हैँ प्राण
कोशिश भर मेँ
कि आँखें बंद होती हैं
और सामने आ जाती है प्यास
उसे फिर से देखने की
उसे फिर फिर देखने की कि जैसे
अगले ही मोड़ पर खड़ा हो अतीत ।
जिन खुली आँखो मेँ ये पूरा संसार
सबब होता है बैचेनी का
उन्ही अधखुली आँखो को एक चेहरा
सुकून देता है शाश्वतता का
और उसको देखने की चाह
अधीरता ।
मन
भटक रहा है
वक़्त के गलियारों में
बेतरह बेसबब
वो दोराहे
छूट चुके हैँ बहुत पीछे
और चाहतेँ
सिमट चुकी हैँ
चलन के चौराहोँ पर
पर वो चेहरा
नज़र नहीँ आता किसी ओर
इन रास्तों के कुहासे में
और इस सब के बावजूद
आसान नहीँ अब भी
बँद कर पाना आँखें पूरी तरह
कि मन
कि मन फिर फिर दौड़ता है
एक शाश्वत प्यास में ।
अ से

Feb 9, 2015

There is no one there ...


There is no one there
you are all alone sitting on a chair
in a dark room doors shut lights off
even the dogs are sleeping at the time of night
and you hear no sound 
and so you are not in touch with any one
and when you are not in touch with anyone you see nothing .
there is darkness everywhere around
and when you see nothing
there is not a single thing of your interest
no juice , so you cant taste anything
cant smell what gonna happen ...
so you are free all by yourself .
now
feel like god . wink emoticon

वो परे है इस सब से ...


ये सारी दुनिया चकमकाती चमचमाती झिलमिलाती जगमगाती
रौनक तरंग उमंग औ खुशियाँ ख्वाब ख्वाहिशें ख़याल औ खुमारी
गम आँसू मुस्कान
और प्रेम ।
वो जानते हैं मुश्किल है इस सब से परे जाना
संभव नहीं लगता इस सबसे से परे होना सबकुछ खोना
और वो सोचते हैं कि क्या कोई है ऐसा
इस सब से दूर , ठहरा हुआ अपने आप में ।
रूप लावण्य और मादकता जिसका ध्यान आकृष्ठ नहीं करती
वो जो इस सब के बिना भी अपनी ही दुनिया में मस्त रहता है
जिसे नहीं चाहिए और कुछ भी
वो आत्मलीन बस अपने हृदय में आनंद लिए डूबा रहता है
इस अद्भुत आश्चर्य की भक्ति में ।
और वो कहते हैं
कोई इससे भी परे है ।

अ से 

Feb 7, 2015

I do not love you --- Pablo Neruda


प्यार करता नहीं हूँ मैं तुमसे पर मुझे प्यार है तुमसे
और प्यार करता हूँ पर प्यार मिलने के लिए नहीं
तब भी इंतज़ार करता हूँ जब मुझे उम्मीद ना हो 
शांत जलने लगता है दिल मेरा
मुझे तुमसे प्यार है सिर्फ इसलिए कि मुझे तुमसे प्यार है
मुझे नफरत है तुमसे बेइंतेहा मुझे इस बेबसी से नफरत है
और तुम्हारे लिए मेरे प्रेम के बदलाव का पैमाना
तुम्हें देखना नहीं है बल्कि आँखें बंद करके प्रेम करना है
जबकि शायद जनवरी की रौशनी जला देगी
इसकी निर्मम किरणों से मेरे दिल को
चुराकर मेरी चाभी सच्ची शांति की राह की
पर इस कहानी में सिर्फ मैं हूँ जिसे मरना है
और मैं मरूँगा इस प्यार से कि मुझे प्यार है तुमसे
कि मुझे प्यार है तुमसे , प्रिय , रक्त में और रौशनी में ।

I do not love you --- Pablo Neruda