अंतर सारे सतही ही रह जाते हैं , ऊपर उठते ही इनका कोई मायना नहीं रहता ,
पृथ्वी स्वीकार करती है अपनी ही दासता , आकाश को खुदका भी इल्म नहीं रहता ॥
ज्ञान की दिशा में जो गूढ़ है , तत्व की दिशा में जो महत् है ,
ध्यान की दिशा में जो सूक्ष्म है , दृश्य की दिशा में जो आकाश है ,
गंध की दिशा में वो पवित्रता और ध्वनि में नाद ॥
पृथ्वी पर सारी लड़ाई पृथ्वी की ही है ,
यहाँ जिस वक़्त युद्ध के गीत गाये जाते हैं ,
उसी वक़्त कोई गांधी अहिंसा का पाठ पढ़ाते हैं ॥
न राम रहे न कृष्ण रहे न यीशु रहे न बुद्ध , बहुत से और भी नहीं रहे ,
कई और हुए जो नाम के लिए लड़ते रहे उनका इतिहास में अब कहीं जिक्र भी नहीं ,
कोई इंच भर जमीन भी न बचा सका ॥
अहिंसा ही परम धर्म है , किसी को क़त्ल करने से पहले खुद क़त्ल होना होता है ,
वो मर चुके हैं जिन्हें ईश्वर की चीखें नहीं सुनाई देती ॥
पृथ्वी अनोखी है और शापित भी ,
यहाँ तीन समुद्रों के जल मिलकर भावनाओं के अनंत क्रमचय बनाते हैं ॥
यहाँ बिखरे पड़े हैं किसी विशाल आईने के खरबों टुकड़े ,
जिनमें अन्योन्य कोणों से दिखाई देते हैं , जीवन के प्रतिबिम्ब ॥
पर कोई प्रतिबिम्ब पूर्ण वास्तविक नहीं होता ,
सबसे प्रायिक बिम्ब ही सत्य के सबसे समीप है ,
मात्र अद्वैत की ही प्रायिकता एक है ॥
अ-से
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