पूर्व (पहले ) की दिशा में ही घूमता है जीवन फिर फिर ,
पश्चिम में (पश्चात् ) अस्त होना ही है चेतना का सूरज ,
और फिर से भोर तक विराम !!
उत्तर और दक्षिण स्थिर ही रहने हैं सदा ,
परस्पर संयोजन से ...
उत्तर कला और प्रकृति और दक्षिण कौशल और कर्म के सहित ,
त्याग की धुरी बने रहते हैं !!
इस चतुर्भज की आवर्त गति से ही ये दुनिया गोल है शायद ,
यूं घूमते रहना ही समय है ... आखिर ... !!
< अ-से >
पश्चिम में (पश्चात् ) अस्त होना ही है चेतना का सूरज ,
और फिर से भोर तक विराम !!
उत्तर और दक्षिण स्थिर ही रहने हैं सदा ,
परस्पर संयोजन से ...
उत्तर कला और प्रकृति और दक्षिण कौशल और कर्म के सहित ,
त्याग की धुरी बने रहते हैं !!
इस चतुर्भज की आवर्त गति से ही ये दुनिया गोल है शायद ,
यूं घूमते रहना ही समय है ... आखिर ... !!
< अ-से >
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