Dec 26, 2013

प्राकृत गति


पत्थरों की दरारों में नयी घास उगी है ,
कल पकाए खाने में भी फफूंद लगी हे ,
जाने ये मच्छर कहाँ से आ जाते हैं ,
और ये झींगुर भी उत्पात मचाते हैं ॥

कल ही साफ़ किया था ये जंगल ,
आज फिर बारिश आ गयी ,
मेरा इकठ्ठा किया पानी ,
बाँध के साथ बह गया ॥

समय गुजरे की बात है ,
पूरी धरा को इमारत बना दिया था ,
नदियों को नाला, और नालों को नल ,
आज मशीनों पर काई जमी है ,
धरा पर फिर वनस्पतियाँ रमीं है ॥

उसकी बनावट मुझे सताती है ,
मेरी सजावट उसे नहीं भाती ,
मैं जो भी करूँ सब मर जाता है,
फिर वो ही दृश्य उभर आता है ॥

ना सृजन मरता है,
ना मृत्यु थकती है ,
फिर फिर वो ही प्रकृति बरसती है,
मेरे बदलाव की हर कोशिश अपने अस्तित्व को तरसती है ॥

ना मैं उसे समझ पाया ,
ना उसके हिसाब से ढल सका ,
ना उसको कभी खयाल आया ,
ना उसने खुद को बदलना चाहा ॥

बे-मायनी जद-ओ-जहद चलती रही ,
और ये ज़िन्दगी भी ,
चित्र विचित्र अनेकों कहानियों के साथ,
अपने अर्थ को तलाशती ॥

< अ-से >

No comments: