Mar 11, 2014

घर -1

घर की हवा में ,
आखिरी बार ,
एक लम्बी साँस ,
भरी और छोड़ दी गयी , 
या शायद खुद ही छूट गयी ,
और फिर वो चला गया ,

दरवाजे खिड़कियाँ बंद सब ,
एक सुनसान सा अँधेरा ,
भीतर सब खामोश , खाली , अचल ;

हवा रुक गयी है या अब भी बहती है , कोई बताने वाला नहीं ,
कुछ कुतरते दौड़ते चूहे , धूल की महक , मकड़ी के जाले ,
क्या आलम है क्या नहीं ,कौन जाने ;

आवाजें आती तो होंगी बाहर से , नल भी टपकता होगा ,
कोकरोच चीटियाँ मकड़ियां बहुत से जीव होंगे पर सब खामोश ,
परदे हिलते तो होंगे , कम्पन भी होते होंगे , पर कोई सुनने वाला नहीं ;

अब मकान यूँ ही पड़ा रहे या ढह जाए ,
कोई बाढ़ बहा ले जाए या मिट्टी निगल जाए ,
या चूहे उसे कुतर खाएं , किसे फर्क पड़ता है ;

देह पड़ी है जमीं पर , अचल ,
प्राण नहीं बसते अब इसमें !!

< अ-से >

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