
परम शांतिमय स्वव्याप्त अ-कार में ,
हुआ एक शब्द ,
हुआ एक बोध ,
प्रकट हुए सूर तब जलने लगे सब ओर ,
चमकने लगे सूर्य हुयी आभा हर ओर ,
और फैलने लगा प्रचंड आ- नाद चारों छोर ,
अकार ... आकार लेने लगा ... उजस उठी सृष्टि ,
प्रकट पृथ्वी हुयी तभी , सुनी उसने उद्घोषणा ,
माँ का दिल जल उठा , कुपित हुयी तब पूषणा ,
कृ-कार (धरा) ने कहा हे देव सूर्य ,
ये मुझे मंजूर नहीं ,
आप हो एक परम बोध ,
बच्चे मेरे इतने ऊर्ज नहीं ,
आप परम तेज पुंज ,
नादान मेरे मनवान बच्चे ,
कैसे सहेंगे आपको ,
उन्हें भी कुछ वक़्त बख्शें ,
आपको थोडा ढलना होगा ,
गुजारिश है ये आपसे ,
सूर्य ने कहा धरा से ममता ,
खयाल उनका तुम्हे ही रखना होगा ,
अगर उन्हें बचाना है तो ,
तुम्हे भी खुद ही जलना होगा ,
पर ये कह कर वो कुछ शांत हुए ,
नाद कुछ आल्हाद में बदला ,
वो प्रकाश , बोध , प्रशांत हुए ,
सूर्य के इस अकहे कर्म को ,
धरा ने फिर फिर नमन किया ,
और अपने बच्चों को पीठ पर लाद ,
ममता की ओढ़नी से छाँव बंध किया ,
और उसने लिखी प्रकृति की किताबें ,
और गाया प्रकाश कर्म का ,
की उसके बच्चे भी सीखें परम बोध से ,
गुणगान सृष्टि धर्म का , .... !!
उसके ओट में दिन ... रात हुआ ,
उसके आँचल में ... दिल सांच हुआ ,
उसकी गोद में सिमटा हुआ सा प्रेम ,
उसकी बातों से जग ज्ञात हुआ !!
~ अ-से
pic courtsey: गूगल / " Debdutta Nundi "
No comments:
Post a Comment