Sep 30, 2014

blue

नीला
मेरे एकांत का रंग था
नीला
पर कोई रंग नहीं था
नीला 
रंग भी था पर , अनुपस्थिति का ,पारदर्शिता का
नीला
रंग था , अँधेरे में से छन कर आती रौशनी का
नीला
बहुत विरल सा कुछ था , जो कहीं नहीं था ,
नीला 
प्रेम था सघन , बरसता हुआ 
नीला 
बहता था कल कल 
नीला
विस्तार था पटल का 
नीला 
मन की तृप्ति में था 
नीला 
भाव था मेरी कल्पनाओं का
नीला
लाल में था , हरे में था , सभी कुछ में था ,
नीला
पर खामोश था हरदम !
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अ से

Sep 29, 2014

उदासी


एक उदासी घेरे रहती है सोचकर
कि सभी कुछ की तरह तुम्हे भी
लौट जाना होगा एक दिन
कि समय की सुरंग के दुसरे छोर से
झाँकता है अँधेरा अज्ञात का
मैं नहीं जानता उन लोगों को
जो जीते हैं उम्मीद लेकर
मैंने देखा है लोगों को लौट जाते हुए
वो जो आते थे समय के दरवाजे से भीतर !

आखिरी चक्कर

बिजली चली गयी और पंखा घूमता रहा अपने आखिरी चक्कर ,
कुछ समय तो लगता है आखिर
एक वक़्त से बहते रहते प्राणों का प्रवाह थमने में
और उस वक़्त याद आते हैं बहुत से काम जो कि किये जाने थे
हर किये गए कार्य की अपनी गति है
एक बोले गए शब्द को कुछ समय लगता है शांत होने में
और तब तक बदल जाता है बहुत कुछ कभी कभी
और कभी कभी मर जाते हैं शब्द एक खामोश मौत !

अभिव्यक्ति

मैं
करता हूँ यात्रा
गढ़ता हूँ आकार
लिखता हूँ सार
वो
निकालता है रास्ते
गढ़ता है औज़ार
देता है सरोकार
हमें
मिला हुआ है दिन
मिट्टी पानी जमीन
जानने जताने की तालीम
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वाक् शिल्प गति
वैकारिक अभिव्यक्ति
विकार
प्राकृतिक अभिव्यक्ति
प्रकृति
दाक्षणिक अभिव्यक्ति
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उसकी अभिव्यक्ति
ये अभिव्यक्त संसार
और मैं भी एक प्रकार
मेरी अभिव्यक्ति
दर्शन कला व्यापार
और वो भी एक आधार
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अ से

Sep 26, 2014

समय गुज़र जाता है जैसे उड़ जाते हैं पंछी आँखों के सामने से ...


समय गुज़र जाता है

जैसे उड़ जाते हैं पंछी आँखों के सामने से
बदल जाते हैं कई रंग
आकाश पटल पर और झील के पानी में इस दौरान
वो देखता रहता है
बहते हुए पानी पर संयत 
कमल की तरह शांत और आत्मस्थ

वो देखता रहता है
वो देखता रहता है कि वो देखता रहता है

यही करता है वो
यही करता रहा है वो सामान्यतः ,
उसी सामान्य में आसन लगाये वो देखता रहता है 

परिदृश्य से आती रौशनी पर स्थिर अन्तर्दृष्टि साधे ,
अपने मन की स्थिरता के आधार पर , तौलता रहता है दृश्य की गति ,
देखता रहता है दम साधे हरदम  वो चीज जो दिखाई देती है उसे
आगम और अनुमान से मिलाकर दर्ज कर लेता है चित्र-लेख ,
एक विशाल घड़ी के घूमते हुए काँटों के मध्य चन्द्रमा को कला बदलते ,
एक विशाल थाल पर सजे नक्षत्रों और तारा समूहों के गति चक्रों को ,
देखता रहता है घूर्णन धीमे से धीमे पिण्ड का , स्थिर ध्रुवों पर दृष्टि टिकाये ,
प्रसन्नता अवसाद सुख दुःख , शांत जल के महासागर को अनेकों लहरों से घिरे हुए
मानस पटल पर अंकित करता रहता है मान-चित्र , मानवीय भू-गोल और ख-गोल के !
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सपना बिखर जाता है
जैसे झड़ जाते हैं पत्ते शाखों पर ही सूखकर
सब ठहर जाता है
कोर पर का आखिरी आँसू आँखों में ही डूबकर
पर वो देखता है राह
जैसे देखता है कोई अपना 
प्रीत में सबसे छूटकर

देखता रहता है 
गीत गाते उत्सव मनाते ,
लोगों को थक कर लौट जाते अपने अपने घर
समूहों में गले मिलकर एकांत में आँसू बहाते ,
मौसमों के बदलते मिज़ाज़ सब ओर बाहर भीतर ,

देखता रहता है 
बस बेबस देखता रहता है 
यही देखा है जाने कब से , तो देखता रहता है

जाने हुए की पैमाइश अनुसार खुद की लम्बाई चौड़ाई नापते हुए लोगों को ,
संसार के तौर तरीकों और समाज के दिशा निर्देश पर खुद को ढालते हुए लोगों को ,
अनंत में खोयी हुयी एक गुमनाम जिंदगी के नाम-बदनाम किस्सों को ,
समाज के लिए कोई हैसियत ना रखने वालो को भी समाज में अपनी इज्जत की परवाह करते ,
हँसता है रो लेता है और चुप हो जाता है फिर देखने लगता है और देखता रहता है
कई दिनों के भूखे को अपनी रोटी अपने बच्चों को खिलाते
थोड़ी सी जगह में सटकर बैठे आखिरी डब्बों में लटककर जाते
अस्वस्थ और कमजोर लोगों को स्वस्थ दूसरों को ढो कर ले जाते
किस्मत से मिले अधिकार पर भी अपना ठप्पा लगाते
मालिकाना हक के नाम पर मौलिकता के निवाले छीन ले जाते
और वो देखता रहता है बाढ़ भूकंप सूखे और भूस्खलन की मार को
प्रकृति की निर्ममता को आँखों में लिये बख्श देता है हर मूर्ख सनक सवार को
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खो जाता है सब
जैसे दिनभर का शोर रात हो जाने पर
खामोश हो जाता है
हर एक शब्द सांझ को पंछियों के लौट जाने पर
पर वो जागता रहता है
जैसे जागता है चंद्रमा 
सब के सो जाने पर

देखता रहता है 
कि उसने देखा है कई दफा पहले भी 
अपने साक्षीभाव में निमग्न आत्मलीन तल्लीन 

देखता रहता है 
जैसे कोई साधक त्राटक का 
जैसे कोई दर्शक एक नाटक का 

शहरी शोर शराबे से दूर ,
जमीन से चिपके हुए परंपरावादी अष्ठबाहूओं से मुक्त ,
समाज में सब ओर जड़ें जमाये बरगदी लोगों से ऊपर उठकर ,
चला गया है किसी पर्वत पर किसी ऊँचे स्थान पर अपनी शान्ति बचाए
देखता रहता है कंदराओं के मुहाने से झांकती हुयी शांत रौशनी में अपने अस्तित्व की झलक ,
सड़कों पर बेतरतीब दौडती जिंदगी से किनारा काटकर ,
मिट्टी हवा पानी में खामोशी से बसे हुए प्रकृति के परिवार को ,
सुबह होते ही क्षितिज से उग आती केसरिया ताजगी को अपने फेफड़ों में भर के
साँझ होने पर स्वतः ही अपनी सत्ता समेट लेते एक प्रचण्ड ज्योतिराज को नमन कर ,
वो देखता रहता है उन लाखों जीवों को जो बस चलते जाते हैं चलते रहते हैं अपनी प्रकृति के साथ !
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अ से

Sep 24, 2014

अन्तरिक्ष


मैं रचता हूँ ये पूरा आकाश अपने मन की असीमिति में
अपने अंतर्द्वंदों के बीच बचाए रखता हूँ ये ब्रह्माण्ड
अनंत अन्धकार के बीच हर समय जागृत रहता हूँ
छिटका हुआ रहता हूँ रोशनी सा इन मंदाकनियों में
मेरी आँखों का ये काला बिंदु कालछिद्र है सघन
दृश्य जिसमें समाकर प्रकाशता है मन को
और कितना आश्चर्य कि बचा रहता है दृश्य
इसका प्रकाश ग्रहण करते रहने पर भी सतत
मेरा कान एक भँवर हैं जैसे बनता है महासागर में
और आवाजें गुजरती है मेरे कानों से हवा के पाल पर
मेरा मानस पोत ले जाता है मुझे अन्तरिक्ष के सुदूर धोरों पर
और नाद फैलता है आकाश में रौशनी की तरह
जीवन की सूक्ष्म तरंगों से भरा हुआ है हर स्पर्श
प्राण उँगलियों के पोरों से प्रवाहित होकर बहते हैं
हर ओर फैला हुआ ये संसार केवल और केवल हवा है
वास्तविक निर्वात के लिए रख छोड़ी है सिर्फ रत्ती भर जगह !
अ से

Sep 23, 2014

Classic milds -- 3


छोटी छोटी मुलाकातों में
हाथ कोहनी से मुड़कर होठों की तरफ आता और मिलकर चला जाता
तर्जनी  और मध्यमा के बीच संभाला हुआ रहता विचारों का एक टुकड़ा 
वातावरण में बेतरह से रमते रहते सोच के गोल घुमावदार छल्ले
और विचारों के ताप से जमा होता रहता शब्दों का काला धुँवा
टुकड़ा टुकड़ा विचारों के बीच
कुछ कवितायें कागजों पर उकर आती
शब्द्नुमा काली चीटियाँ पंक्तिबद्ध चलती रहती
मन के दर पर एक शून्य से बिल में लौट जाती
अपने वजन से कहीं ज्यादा भारी अर्थों को ढोकर
जिंदगी बीतती रहती कश-कश
यादों के उड़ते धुंवें के बीच आँखें धुंधलाई रहती
स्मृतियाँ स-स्वर चिन्हों की शक्ल लेती और कहीं खो जाती
समय छंदबद्ध हो बीच बीच में गुनगुनाता रहता कुछ अधूरे नगमें
और असफलताएँ दर्ज होती रहती कड़वाहट की कसौटी पर
अंतिम दौर की आँच
उँगलियों पर महसूस होने लगती काल की छुअन
इन्द्रधनुष सा तैरने लगता साथ गुजरा हुआ समय
आँखों के सामने होती अगले दौर की रवायत
कवायद शुरू होती अंत को जल्दी पा लेने की
आखिर में बचा रह जाता जर्द सा एक ठूंठ
उन्ही तर्जनी  और मध्यमा के बीच
आखिर में पीछे छोड़ दिया जाता एक किस्सा जिंदगी का !
अ से

Sep 22, 2014

Classic milds -- 2


सिगरेट पीने वाले जो साथी थे
उनसे एक अदद सिगरेट उधार नहीं मांगी
ना कभी उन्होंने कभी उधार दिया..
वो कुछ यूं होता के हम बस एक हांथ आगे बढ़ा देते थे
एक दूसरे की ओर..
और दूसरा पहाड़ी के उस ओर खींच लेता था
उंचाई पर जब आंखों मे गुलाबी डोरे पड़ते थे
तब नीचे का मंजर..
ओह... कितनी सिगरेट्स ने सु-साईड कर लिया...
नीचे धुंआ दिखता था
ठंडा धुंआ...
मैं तो हमेशा से डरता आया हूँ इस एक बात से
की एक दिन मेरी आत्मा छोड़ देगी शरीर मेरा ,
तो मैंने धुँवा धुवां करके रख छोड़ा है जिस्म से बाहर उसे ,
हर एक कश के साथ
मैं स्वाद लेता हूँ मौत का
थोडा कड़वा है पर वाजिब है
और हर एक कश के साथ
हवा में मिला देता हूँ अस्तित्व अपना
की अब वोह इश्वर के फेफड़ों में सुरक्षित रहेगा
और कतरा कतरा मैं देता हूँ जिंदगी को अंतिम विदाई
की एक बारगी पूरी तरह चले जाते लोग मुझको सुहाते नहीं ,
की कोई जाए तो धीरे धीरे ,
की मेरी आत्मा सक्षम हो सके उसे जाते देने में ,
मद्धम मद्धम सुलगता रहे किसी की आंच से दिल मेरा ,
की मैं पीता हूँ सिगरेट
की एक बार में ही ना ख़त्म हो जाऊं पूरा का पूरा !

नाद और निर्वात

नाद

एक आवाज़
फ़ैल कर कुछ उसी तरह
जैसे फैलता है उजाला सूरज से
ले आती है अस्तित्व में
ये सकल संसार ...

वही आवाज़
जब आती है विनष्टि पर
तो समेट लेती है सबकुछ
फिर अपने ही भीतर ...

सिमटी हुयी हैं
सारी भौतिक गतिविधियाँ
इस संकुचन और प्रसरण में ही
जो होता है अवसाद विकास सरीखा
उनकी आध्यात्मिक अवस्था में!

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निर्वात

खाली नहीं होती एक खाली बोतल ,
होठ लगाकर किसी प्लास्टिक की बोतल के मुंह से ,
अगर उसे खींचा जाए तो वो सिकुड़ जाती है ...
निर्वात इतना आसान नहीं होता ,
आप इतनी आसानी से नहीं देख सकते , खालीपन को ,
वो खींचता है , अपनी पूरी क्षमता से ,
सबकुछ अपनी ओर ...

वो अब भी संघर्ष करता है ,
वो भी भर जाना चाहता है , उसी सब से ,
जिससे भरे हुए हैं बाकी सब , उसके आस पास ...

कि एक सच्चा निर्वात ,
एक सच्ची आवाज़ के साथ जन्मता है ,
जो समेट सकता है समूचे अस्तित्व को अपने भीतर ,
और उसे नष्ट कर सकता है पूरी तरह ,
अपने खालीपन में ले जाकर !

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Sep 21, 2014

धूप से फूल .. सांझ सी ख़ामोशी
















वापसी की चुप
यात्रा अपने अंत की ओर
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धूल से आता खिलकर 
धूप सा फूल
धूल फिर से हो जाता
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प्रकाश में आता
खिलना फूल हो जाता
फिर ढलता ख़ामोशी में
फूल एक स्मृति सा
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वे आते
और बधाई मुस्कुराते
बोलते एक भी शब्द नहीं
बहुत आखिरी तक
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अ से

सार-असार


वेदनाओं से गढ़ा गया जिसे
आनंद लील जाता है सारा संसार
संकल्पों के ताने बाने से बना
क्षण भर में भंग हो जाता असार

आनंद में है प्रलय इसका 
नियति सब भूल जाना है
डूब जाना है इस विप्लव में
हर एक बाँध टूट जाना है

दूर दूर तक ख्वाब होंगे
डूब के कोई पार ना होगा
खोजने वाला खोजता रहेगा
कहीं कोई सार ना होगा

आशाओं का जंगल मंगल है
मैदान ये हरियाता हरिया है
किसी दिशा कोई दर दीवार नहीं
हर ओर बस दरिया ही दरिया है

अंत को शुरू में देख लेता वो
दूर की निगाह अच्छी है
अंत को अंत तक झेल लेता जो
एक वही जिंदगी सच्ची है

आवाज़ के जादुई रेशों से
बुना हुआ है ये सारा संसार
पर बातें आखिर होती हैं बातें
यही है इसका सार-असार !
अ से

Sep 19, 2014

अक्षर


अनुभूतता रहा मैं जीवन और गढ़ता रहा आकार अपना ...

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कभी चुनौती देते हवा और पानी के बहाव से जीवट मिलता है ,
तो कभी उखड जाने के डर से मैं अपनी जडें गहरी जमा लेता हूँ ....

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उपस्थिति दर्शक है ,
अनुभूति ज्ञान  ,
अभिव्यक्ति पूरा संसार ... !!

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मेरी जमीं वहीँ जहाँ मैं ठहर पाऊं ,
भाव किसी जलधार से निरंतर बहते हों ,
अनल पावक स्वप्न हों आँखों में सजीव ,
आजादी की हवा बहती हो साँसों में ,
आकाश भी साफ़ सुनाई दे इतना सब्र मिले !!
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कभी रात से प्रभात की ओर ,
कभी धूप से छाँव की ओर ,

प्यास और उजास के चित्र बनाता सा मन ,
रुके हुए पटल पर दौड़ लगाता सा मन !!
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हलचल हवा पानी में , सोच मन मानस में ,
दौड़ती मशीने , संवेदन इंसान ,
पत्थर औ दिल , जिस्म औ जान ,
सब ,
एक ही कर देखता ,
जो अचल है वो अचल है !!
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श्रुति स्मृति और ज्ञान ,
वस्तु वास्तु जहान ,
सारी जान ओ शान ,
सबकी जमीन एक होश है ,

पर इतना सुकूं क्या अच्छा है ,
की सब भूलकर वो मद-होश है !!----------------------------------------------------------------------

अ से 

किसे चाहिए एकांत , एकांत में ...




















किसे चाहिए एकांत , एकांत में
मुझे चाहिए एकांत , उपस्थिति में कुछ लोगों की
इसीलिए , मैं जलाता हूँ तीली और सुलगा लेता हूँ सिगरेट अपनी
जब मैं खड़ा होता हूँ चौराहे पर
या किन्ही दो लोगों से बात करते हुए 
मुझे चाहिए एकांत लोगों के शोर में
मुझे पसंद है दोस्तों के साथ का एकांत !
सिगरेट सुलगाना , कश खींचना और धुँवा उड़ाना
एक के बाद एक , ख़ामोशी से नज़रें घुमाना यहाँ वहाँ ,
और बात करना दोस्तों से , जाने क्या बात , कहाँ से आयी हुयी !
बार में बैठे हुए , प्याले को लाना ठोड़ी की ऊंचाई तक
मेज़ पर कोहनी टिकाना और सोचना कुछ , ना जाने क्या
मुझे पसंद है पीना , पीना पसंद नहीं पर
पसंद है मुझे अकेला हो जाना , अकेलेपन में नहीं पर
पसंद है मुझे एकांत , सिगरेट सुलगाते हुए
कश खींचते और छोड़ते हुए
मन को बहलते बहलाते हुए
किसी की उपस्थिति में अनुपस्थित होकर
मुझे चाहिए एकांत , अकेले में नहीं
पूरी दुनिया के होने पर !

अ से 

सब कुछ अनायास



क्यों करते हैं हम वो जो हम करते हैं
बिना जाने की हम उसे करते हैं
बिना जाने कि हम उसे कर रहे हैं
बिना जाने की हम उसे क्यों कर रहे हैं
कई दफा जानते हुए भी पर ना चाहते हुए 
कई दफा जानते हुए और चाहते हुए भी अनायास ही !
नदी बहती है बहती रहती है कहाँ से आता है ये बहाव
कहाँ से उठती हैं लहरें हिलोरे भरते अथाह समुद्र में
और हवा वो किसकी तलाश में भटकती फिरती है !
संवेग ,
संवेगों का गणित , संवेगों का घटित , संवेगों का आपतित
सब कुछ अनायास
और अनायास होते हुए भी सायास , संवेगों के लिए
और हमें लगता है जैसे हमारा प्रयास
जबकि सब कुछ अनायास !
सब कुछ अनायास
जैसे बारिश में दिल का मौसम नम हो जाना
प्रेयसी की याद आते ही जहां का रिक्त हो जाना !
जैसे गांडीव
और उसका प्रकट होना
हाथ में अर्जुन के शर आना
और लक्ष्य सध जाना सब अनायास
गांडीव
जिसकी प्रत्यंचा की टंकार मात्र से
उठते हैं ऐसे संवेग
की झड़ जाते हैं पत्ते बूढ़ी शाखों से
पंख पंछियों के और हिरन दौड़ने लगते हैं इधर उधर
सब अनायास
की जितने क्षण तक साधता है अर्जुन निगाहें लक्ष्य पर
उतनी ही खिंचती है प्रत्यंचा पीछे तक
और उतना ही एकत्र और पुष्ट हो जाता है वेग उसका
पर हर तीर के आगे चलता है एक त्रिशूल
और छिन जाता है लक्ष्य भेद का पुरस्कार उससे
छिन जाता है लक्ष्य भेद का आरोप भी उससे !
एक लक्ष्य है हर किये जा रहे कार्य का
एक लक्ष्य है हर घटित हो रही क्रिया का
हर ना हो रही क्रिया
और ना किये जा रहे कार्य का भी
है एक लक्ष्य
और सब कुछ जो होता है
वो होता है उसी एक लक्ष्य के लिए
हालाँकि वो लक्ष्य कुछ करता नहीं है
पर वो लक्ष्य प्रेरणा है
हालाँकि वो लक्ष्य प्रेरणा है
पर वो लक्ष्य हासिल होने के उद्देश्य से नहीं है
वो है क्यूँकी वो है
इसमें कोई विकल्प नहीं है
ना ही कोई तर्क काम करता है
क्यूंकि हर संकल्प विकल्प और तर्क वितर्क का
हर युद्ध और हर अंतर्द्वंद का लक्ष्य भी वही है
वही एक लक्ष्य !
जो हुआ जो होगा जो हो रहा है
हो रहा है
एक उद्देश्य से
एक उद्देश्य से प्रेरित
एक उद्देश से कार्यान्वित
फिर भी निरुद्देश्य
हो रहा है सब अनायास ही
जो हुआ था वो महत्वपूर्ण नहीं है
जो होगा वो महत्वपूर्ण नहीं है
जो हो रहा है वो भी महत्त्वपूर्ण नहीं है
फिर भी सब कुछ महत्वपूर्ण है
फिर भी सब कुछ महत्वपूर्ण है जो हो रहा है
क्यूंकि मैं हूँ क्यूंकि तुम हो क्यूंकि हम हैं वहाँ !

अ से 

Sep 18, 2014

खामोशी



जैसे अर्थ बदल सा जाता है शब्द का वाक्य के साथ
वैसे ही कुछ तेरी खामोशी का भी वाक़िये के साथ
पता है ख़ामोशी भी एक शब्द है
मायने जिसके काफी गहरे और गंभीर हैं
ताश के जोकर की तरह
कहीं भी लगाया जा सकता है इसे
वो तुरुप का पत्ता है ये
जो कहीं भी चला जा सकता है
बस एक बार खुद को समझ आ जाएँ
इसके सही अनुप्रयोग
सिर्फ शब्द ही मोड़ नहीं देते
एक कहानी को
ख़ामोशी भी बदल देती है
बुरी तरह से
एक लम्बी ख़ामोशी भी
ले आती है बदलाव
कभी ना लौटा सकने वाला
बहुत भारी शब्द है
ये खामोशी
झिलमिलातें हैं जिसमें कई रंग
बैरंग होते हुए भी
ठीक सांझ की झील की तरह
नज़र आते हैं घुलते लहराते
सतत रंग बिरंगे आकार इसमें
पर हर शब्द एक बात है
उस पर ख़ामोशी
एक ख़ास बात
कि इसमें तलाशे जा सकते हैं
फिर अपने ही मायने
कि हर कोई तलाशता है
पर आखिर पता किसे होता है
और हो जाया करती हैं इसीलिए
ग़लतफहमियाँ कई दफा
अब मेरी इस ख़ामोशी को अन्तराल ना समझना अपने बीच ,
ये तो भरी जा रही है नयी पुरानी रंग बिरंगी खट्टी मीठी कहानियों से ॥
अ से 

कौन

किस गर्भ से जन्म लेता है शून्य आकाश
किसकी गोद में पलकर बड़ा होता है
कौन देता है शब्द को अर्थ उसका
अर्थ से कैसे फिर वो प्रकट होता है
कौन चुरा लेता है फूलों से उनकी आवाज़
खिलखिलाते हैं पर कहना क्या चाहते हैं !
कौन तय करता है क़दमों का ठिठक जाना
कुछ दूर पर मुड़ते हैं और फिर से लौट आते हैं !
अ से

Sep 16, 2014

लकीरें



उसने खींची एक लकीर
रास्ते का रूपक , चिन्ह
कोई आया
और उसे खींचकर कर दिया सीधा
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उसने खींची एक लकीर
दूसरे ने आकर उसे गहरा कर दिया
और फिर वो होती चली गयी गहरी हर बार
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उसने खींची एक लकीर
और लगाने लगा अनुमान
क्या हो सकता है उसके दूसरी ओर
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उसने खींची एक लकीर
फिर दूसरी फिर तीसरी
बना दिया एक नक्शा पूरा
और अब उलझा हुआ है वो
उन लकीरों में
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उसने खींची एक लकीर
दुसरे ने उसके समानान्तर
तीसरे ने खींची समकोण पर
उनको काटकर
चौथे ने कुछ सोचा
और खींच दी विपरीत
पर विपरीत खींच ना पाया
उसने देर तक देखा उसे
और कागज़ फाड़ दिया !
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उसने खींची एक लकीर
क्यूंकि और लोग भी यही करते हैं
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अ से

picture prompt --2

खुलती हैं आँखें
आता अस्तित्व में
संसार दृश्य और ...
फ़ैल जाता 
पानी में लहर सा
आकाश में होकर रौशन
जीवन जग में
एक उबासी के बाद ...
साकार हो उठता
हर सपना उसका है
उसके दसों ओर ...
और एक
बीत जाता है
दिन और ...
थका हुआ
उबासी लेता
वो फिर से है ...
और जग
अव्यक्त में
डूब जाता
अँधेरा एक !
-----------------------------
eyes , they open ,
he yawns ,
and the world
comes into being ,
he creates everything
around him ,
one more day ends
tired , he yawns yet again
the world goes into
slumber , unexpressed !
-------------------------------
anuj

बे-आवाज़


आवाज़ सुनी नहीं जाती
दबा दी जाती है हर बार
पर सुना है नीचे जाने पर 
प्रतिध्वनि ऊपर उठ आती है । 
कभी कोई जिद नहीं
तुम लोगों से ज्यादा
शायद ही महत्वपूर्ण
कुछ उसके बाद भी
कभी कोई जिद नहीं
अब बस एक
यही जिद है उसकी । 
साँसे
जिन्दा रह सकती हैं बेधड़क
जिस्म
धड़क सकते हैं बेआवाज़
पर वो
वो उसे जीवन नहीं कहती
जो उसकी आत्मा का ना हो । 
संसार की सबसे ऊंची शिला पर
जीवन के सबसे गहरे गर्त में
ये दो कदम के फासले
तय करेंगे आखिर क्या
वो जिन्दा थी या ज़िन्दा है 
क्या है ये सब !
आखिर था क्या !

स्त्री अस्तित्व


उसको ओढ़ा दो सारी अवस्थायें
अच्छी भावनाओं के नाम पर
समाज और सुधरेपन के आयाम पर
और क्यों नहीं प्रेम के
अपनी शुद्धतम भावनाओं के 
और भर लो मानसिक खोखलापन
अच्छेपन की खुशफहमियों से !
पर मत ओढ़ने देना तरुणाई
युवा मत रहने देना उसे
कर लेना कैद
उसकी सबसे गहरी साँसों को
छुपा लो उसका यौवन
कहीं वो बाहर ना हो जाए
तुम्हारे नियंत्रण से !
बहने दो
डूबने दो उसे
सारी भावनाओं में
पूरी तरह
पर स्वातंत्र्य
नहीं स्वतंत्रता नहीं
इसका अभाव कर दो
करार कर दो
स्वच्छंदता गैर कानूनी !
दो उसे किरदार सभी
निभाने को
और मांग करो
सबसे अच्छे अभिनय की
पूरी कुशलता
देखना कहीं कोई कमी ना रह जाए
किसी भी रिश्ते में
पर कभी मत स्वीकारना उसे
सिर्फ एक स्त्री
बनाना माँ बहन पत्नी बेटी
तय करना हदें
और फिर प्रेमिका भी
और उसकी भी हदें तय करना
दबा देना उसे गिन गिनकर
एक के ऊपर एक
कई समतल तहों के नीचे
जिनमें ना रहे कोई गुंजाइश
हवा आने की कहीं से भी !
और इस तरह
तुम बचा लेना उसे
बुरी नज़रों से
दुर्भावनाओं से
दुर्घटनाओं से
संभावनाओं से
की कहीं वो हो ना जाए युवा
कहीं बह ना निकले निरपेक्षता के संग
की कहीं वो बना ना ले
स्वतंत्र अस्तित्व अपना !

सब कुछ कितना पुराना


कितना पुराना
सब कुछ
कितना पुराना
हवा
और बहाव भी
पानी पहाड़ झरने
और नदियाँ
लहरें भी सागर का ज्वार भाटा
ये मिट्टी ये आकाश और ये दिन रात
सब था
मेरे जन्म के दादाजी के पहले
ये हिस्से
बंटवारे के ये किस्से
कितने पुराने
और कितनी पुरानी ये आदतें
हिस्से करने की
और सुलझाने की
ताकि हो सही सही
बराबर बँटवारा
हैसियत के अनुसार
पर ये सब नए
उस बच्चे से पूछो
भूल गया होगा वो
या याद नहीं किया अभी
वो ही बताये
वो नहीं जानता होगा पर
पर सब पुराना
ये बच्चा भी
हर बार फिर वही बच्चा
सब पुराना
सबसे पुरानी तुम
उससे पुराना तुम्हारा-प्यार
प्यार उससे भी पुराना
माँ का
और उससे भी पुराना प्यार
पुराना सब
बहुत पुराना
सबसे पुराना मेरा दिल
उससे भी पुरानी मेरी आत्मा
आत्मा से भी पुराना कौन
पुराना कौन
पुराना क्या
क्या क्या ?
उत्पत्ति की उत्पत्ति
क्या
ज्ञान का ज्ञान
क्या
बोध का बोध
क्या
क्या क्या !
कितना पुराना
सब कुछ
कितना पुराना !
अ से

picture prompt --1


i fly not ,

i set and reach 
to the top .
-----------------------
to the top 
it needs one more jump .
----------------------------
air all around
still no breath
lungs need some volume
i fill it with vastness
-------------------------------
i inhale pleasure
to exhale art
in my expressions .
----------------------------------

crime against the time



older than life
older than time
love is something very old
love is a walk starts before the clock

Everything is new
Everything is anew for love
its begining is an intriguing story
love is a crime running against the time .


( जीवन से अधिक पुराना
समय से अधिक पुराना
प्रेम बहुत पुराना कुछ है
प्रेम एक यात्रा है जो घड़ी से पहले शुरू होती है

सब कुछ नया है
सब कुछ नए सिरे से प्यार के लिए
इसकी शुरुआत एक दिलचस्प कहानी है
प्यार समय के खिलाफ एक अपराध चल रहा है  )

Rereading


भीतर जाना 

निपटा कर 
आखिरी पन्ना 
और फिर पढना 
अपनी जिंदगी !

प्रेममिति


(1)
तेरी ये त्रिविम दुनिया
क्यूँ हो जाती है चौरस
मेरी आँखों में आकर
कि फिर मन उसमें 
तलाशता है गहराई !
(2)
तेरे मेरे बीच
क्यों बनता है ये समकोण
कि तेरे स्पर्श से आती
तरंगों की ज्या
छूने लगती है अनंत
और मेरा दिल कभी
तुझ तक पहुँच नहीं पाता !
(3)
कितना वक़्त लेती है
आने में ये रोशनी
तेरे आँखों से
मेरी आँखों तक
और कितना कुछ
बीत जाता है इस दरम्यान !
(4)
रस रंग और उल्लास
ये उपस्थिति तेरी
तेरा ये चुम्बकीय प्रेरकत्व
बदल जाती है क्रियाविधि
कितनी कुछ इस ह्रदय की !
( त्रिविम - 3 D , चौरस - चपटी , ज्या -sine , समकोण -right angle , क्रियाविधि -functioning )

बस यूँ ही कटता सफर



खुली आँखे
कुछ ना देखते दो लोग
फर्श पर उगी हुयी शाम
मन मेँ ठहरी हुयी एक नदी
ट्रेन सा गुजरता हुआ वक्त
और फिर एक आह
किसी का उठना
और भीतर चले जाना
बस यूँ ही कटता सफर ।

कर्तव्य


(1)
उन्होंने देखा 
खेलते हुए कुछ बच्चों को 
और बाकी सब कुछ की तरह ही 
चाहा ये सब भी मेरे पास हो !

(2)
वो सोचते थे 
अपने भविष्य के बारे में 
तलाशते थे अकेलेपन का विकल्प 
और हर बार उन्हें यही मिलता था 

(3)
उन्हें पता था 
अपनी थकान का 
कुछ साल बाद की ढलान का 
उन्हें चाहिए थी कोई नयी ऊर्जा 
कुछ और हाथ 
खुद से कुछ वक़्त पीछे चलने वाले !

(4)
वो चाहते थे 
निभाना अपना किरदार 
इस खेल में 
हिस्सा लेना बराबरी का 
और उन्होंने फिर वही किया 
जो उनसे अपेक्षित था 
और इस तरह उन्होंने कुछ नहीं किया 
की वो दौड़ाये जाते रहे संसार के द्वारा 
और इस तरह वो मुक्त रहे कर्मों से 
हर वक़्त कर्तव्यों में फंसे रहकर !

अ से

क्या जरूरी है



क्या जरूरी है तलाशना
मानवाकृति में भावना
उस पहाड़ को देखो
वो साधना रत है
पृथ्वी को देखो 
वो नृत्य मग्न है
पानी को देखो
रमते हुए
अग्नि में तत्परता
और देखो आकाश को
सबसे विरक्त !
अ से

" पोस्त-मणि "



शाम हो चुकी थी , बड़ी घबराहट के उसने बाहर आने की हिम्मत जुटाई ,
सूंघते नथूने , सब दिशायें तरेरती हुयी आँखें , किटकिटाते हुए दाँत और अति सक्रिय मस्तिष्क ,
वो छोटा सा चूहा कुछ देर पहले की घटना से अभी तक डरा हुआ था ,
जब उसने काल से दौड़ लगाकर पृथ्वी में बनी इस नन्ही सी गुहा इस बिल में शरण ली थी ,
जब से उसने दौड़ना सीखा था वो इसी तरह से दौड़ रहा था खुली हवा उसके लिए कभी सुरक्षित नहीं रही ,
दिन में बिल्लियों और रात में उल्लुओं के रूप में काल हर जगह उसे पहरा देते नज़र आता था !
सब ओर सुरक्षित वातावरण पाकर वो बाहर निकला और खाने कुतरने के लिए कुछ तलाश करने लगा ,
अभी वो कुछ दूर ही पहुंचा था कि उसे अपनी ओर दौडती हुयी दो आँखें नज़र आई ,
और वो सब कुछ भूल कर फिर से भागने लगा और भागते भागते एक कुटिया में घुस गया ,
जहाँ एक ऋषि अपने नित्य पाठ में व्यस्त थे , वो दौड़ कर उनकी ओट में दुबक गया !
ऋषि अपने कार्य में उत्पन्न व्यवधान से पहले तो क्रोधित हुए ,
पर फिर उस नन्हे से जीव को काँपता हुआ देखकर उन्होंने पूछा कि वो इतना भयभीत क्यूँ है ,
चूहा अपने पिछले दो पंजों पर खड़ा होकर हाथ जोड़कर बोला ,
" हे महात्मन मुझे मृत्यु से बड़ा भय लगता है और ये बिल्ली हमेशा ही मेरी ताक में बैठी रहती है ,
काश अगर मैं बिल्ली होता तो मैं निर्भय होकर अपना जीवन यापन कर पाता ! "
ऋषि बोले , " काल सभी के लिए मुँह खोले खड़ा है मृत्यू हर किसी को व्यापती है
बस सभी के लिए वो अलग अलग शक्ल लेकर आती है बिल्ली बनकर तुम्हें क्या फायदा होगा ! "
पर वो डरा हुआ चूहा सिर्फ इतना कह पाया की , हे महात्मन ! अगर संभव है तो आप इतनी कृपा कर दीजिये !
उस नन्ही सी बुद्धि को और अधिक ना समझाकर शरण में आये हुए की रक्षा का धर्म सोचकर उन्होंने कहा
कि हर वक़्त तो मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रख सकता पर अगर बिल्ली बनने से तुम अपनी रक्षा में समर्थ हो , तो तथा अस्तु !
और अभिमंत्रित जल के कुछ छींटे पड़ते ही वो चूहा बिल्ली बन ख़ुशी ख़ुशी कुटिया से बाहर चला गया !
बिल्ली बनने के पश्चात् उसका स्वभाव उसकी क्रियाशीलता और उसकी इच्छाएं बदल चुकी थी ,
वो अपने को ज्यादा सजग , फुर्तीला और चतुर महसूस करने लगा और वहीँ कुटिया के आसपास छोटे मोटे जीवों को खाकर रहने लगा ,
कुछ दिन सुकून से गुजारने के बाद एक दिन उसने अपनी और गुर्राते हुए एक जीव और दो गुस्सायी हुयी आँखों को देखा ,
नज़रें मिलते ही वो कुत्ता उसकी और लपका और उसने अनायास ही खुद को पूरी जान से दौड़ता हुआ पाया ,
सामने फिर वही कुटिया पाकर उसने कुटिया में शरण ली और ऋषि से कहा की है भगवन् मुझे आप कुत्ता बना दें ,
बिल्ली होकर भी मैं काल के इस चेहरे से अत्यंत भयभीत हूँ !
मृत्यु को सामने पाकर आखिर किस सामान्य जीव की बुद्धि काम करती है ऐसा सोचकर ऋषि ने अबकी बार उसे ज्यादा कुछ ना समझाकर उसे कुत्ता बना दिया और वो वहां से बहुत खुश होकर चला गया !
एकांत में बैठकर जबकि आप समस्याओं के अधीन ना हों काफी दूर की दृष्टि साध सकते हो ,
पूरे जीवन काल को एक क्षण में लाँघकर उसके नतीजे पर विचार कर सकते हो ,
सुनी हुयी कहानियों और अनुभव के आधार पर अपने जीवन को दिशा देने का उपक्रम कर सकते हो ,
पर पल पल को जीते हुए जीवन के बदलते समीकरणों के साथ गति करना ,
संकल्पों और नियमों की सरल रेखा पर तो सामान्यतः असंभव ही है !
तब आप सिर्फ सामने आयी हुयी विभीषिकाओं को टालते हुए , पल दर पल अपने को समस्याओं से दूर रखते हुए जीते हो ,
और किसी भी तरह की मृत्यु को टालते रहना ही जीवन का उपक्रम बना लेते हो !
आगे उस कुत्ते का जीवन जंगली सूअर और फिर क्रमशः बन्दर भालू और हाथी द्वारा बाधित हुआ ,
और हर बार वो ऋषि से प्रार्थना कर अपने को अगले रूप में बदलता रहा ,
ताकि मृत्यु का उसका भय कम हो और वो चैन से जीवन व्यतीत कर सके !
हाथी बनने के बाद वो खुद को बहुत भारयुक्त महसूस करने लगा ,
समय उसको बढ़ा हुआ महसूस होता और वो काफी शान्ति भी अनुभव करता था ,
कभी कभी वो मस्ती में आकर झूमता और वन में दौड़ता भी था ,
पर बाघ और सिंह जैसे हिंस्र पशुओं से अब भी उसे भय रहता ,
और फिर ऋषि की सहायता से वो खुद भी एक हिंसक शेर में बदल गया ,
कुछ समय उसने बिना किसी की परवाह अपने जैसे हिंसक स्वभाव के जीवों के साथ व्यतीत किया !
एक दिन उस वन से एक पालकी गुजरी , कुछ लोग उसकी सुरक्षा के लिए साथ चल रहे थे ,
और तभी एक शेर की दहाड़ सुनाई दी , एक स्त्री ने पालकी से बाहर झाँक कर कुछ इशारा किया ,
कुछ लोग अपने भाले और तीरों के साथ उस दिशा में गए जहाँ से वो आवाज़ आई थी ,
और उस शेर को तीरों और बरछों से भेद कर पकड़ कर ले आये ,
तब इस दृश्य को देखकर उस सिंह को भी अपनी मृत्यु नज़र आने लगी और उसने ऋषि के पास जाकर कहा ,
" हे महान ! आप मुझे एक स्त्री में बदल दें उसके एक इशारे पर इतना शक्तिशाली शेर भी मार दिया गया "
ऋषि को भी इस हिंस्र पशु से बेहतर उसका मनुष्य होना लगा और उसने उसे एक सुन्दर कन्या में बदल दिया ,
अपनी विद्या के प्रभाव से उसकी उत्पत्ति के कारण वो उसका धर्मपिता हुआ ,
और उसने मंत्रोच्चार के साथ उसका नामकरण किया " पोस्तमणि " !
पोस्तमणि इस रूप में आने के समय से ही एक सुन्दर तरुणी थी ,
मनुष्य बनने तक के सफ़र में वो अपना बहुत सा भय पीछे छोड़ आई थी और उन्मुक्त होकर हर पल को जीना चाहती थी ,
जीव जंतुओं के ह्रदय की उसको भली प्रकार थाह थी और वो उस वन में मुक्त स्वच्छंद विचरण करने लगी ,
जल्द ही उसके रूप लावण्य और गुणों की खबर उस वन से बाहर पहुँच गयी ,
कानों से मुँह तक आने के रास्ते में किसी बात के साथ कुछ और विशेषण जुड़ जाना सामान्य ही है
जो लोगों ने अपनी घ्राण शक्ति से पैदा किये होते हैं ,
और जितने कानों और मुँह वो बात गुज़र कर जाती है
उतने ही अलग अलग रंग और महक की कहानियाँ उसके साथ जुड़ जाती हैं !
उस कन्या की मोहक तस्वीर राजा तक इतनी अलग अलग जबानों से पहुँच चुकी थी
कि राजा अकहे ही उसके मोहपाश में पड़ चुका था ,
कुछ ही समय पश्चात् उसने उस वन की ओर रुख किया
और वहाँ पोस्तमणि को देखकर अपने ह्रदय की सभी उत्सुकताओं की पुष्टि कर ली ,
ऐसी चंचलता जो आँखों में समा नहीं पाए ,
ऐसा उन्मुक्त रूप जो ह्रदय को भारशून्य कर दे ,
ऐसे नर्म झोंके जिनमें होश संभाले ना संभले ,
और ऐसा आनंद जो बारिश में नाचता मयूर ही जानता हो ,
वो एकटक उसे देखता रहा अपनी स्वप्न मुग्धता तक !
होश सँभालने पर उसको नज़रों से ओझल पाकर राजा को अजीब सी बैचैनी खाने लगी ,
वो उसको तलाशता हुआ पास ही ऋषि की कुटिया तक पहुंचा ,
और उनको सब हाल बताकर उसने पोस्तमणि का हाथ मांग लिया ,
ऋषि के पास कन्यादान लेकर अपने पितृ धर्म से उऋण होने का मौका था ,
उन्होंने बस इतना कहा की शुरू से ये वन ही पोस्तमणि का घर रहा है तो नगरीय तौर तरीको में ये उतना सहज नहीं रह पायेगी
अतः इसका ख़ास ख़याल रखना और इसको किसी भी ईर्ष्या और भय से मुक्त रखना ,
ऐसा कहकर कुछ जल छिड़ककर पोस्तमणि का हाथ उस राजा के हाथ में देकर उन दोनों को आशीर्वचनों और स्वास्थ्य संपत्ति की मंगल कामनाओं के साथ विदा किया !
पोस्त मणि के भाग्य में स्थिरता नहीं थी , उसने इतने से जीवन में इतने जीवन और तरह तरह के भय देख लिए थे ,
राजा का उससे विशेष लगाव था और राजमहल में अधिकतर समय राजा उसी की साथ व्यतीत करने लगा ,
उसको अपने राजकाज और सामाजिकता में रूचि नहीं रह गयी थी , वो एक कमलिनी के प्रेम में डूबा हुआ वो भंवरा हो गया था जिसे अपनी स्वतंत्रता और जीवन की भी सुध ना रहे जिसके रात दिन उसी पुष्प मद में कैद होकर रह गए हों !
इस दौरान मंत्री राजा को कामकाज के प्रति आश्वस्त रखते रहे ताकि सत्ता से उसका ध्यान हटा रहे ,
और बाकी रानियाँ और राजा की प्रिय रही दासियाँ इस वनचरी से ईर्ष्या रखने लगी ,
एक दिन मौका पाकर उन्होंने पोस्तमणि के खाने में विष मिला दिया जबकि वो वन की ओर जाने वाली थी ,
विष पचा ना पाने के कारण पोस्तमणि की सुध जाने लगी और वो अंधी होकर एक कुँवे में गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गयी !
दिनभर में पोस्त मणि के वियोग में राजा के प्राण सूखने लगे , उसकी मृत्यु की खबर उसके गले से नीचे नहीं उतर रही थी ,
जिस जीवंत मुस्कान से मुरझाये हुए पौधे खिल उठते थे जिस के चेहरे से हमेशा पूर्णिमा की चांदनी छिटकती थी ,
जिस की खिलखिलाहट से भोर हुयी समझ पंछी चहचहाने लगते थे वो भला कैसे काल की अमावस के अँधेरे में खो सकती है !
कुछ और उपाय ना पाकर राजा ऋषि के पास जाता है और उन्हें सब बात बताकर कहता है
कि पोस्त मणि के बिना उसका जीवन अधूरा है उसके प्राण अधर में हैं और कुछ भी उपाय करके उसे जीवित कर दो ,
राजा को सांत्वना देकर ऋषि उस कुंवे की ओर जाते हैं और वहाँ पोस्तमणि की देह को पास की मिट्टी में दफ़न करवाकर
अभिमंत्रित जल छिड़क कर कहते हैं की अब यहाँ एक पौधा जन्म लेगा जिसमें सुन्दर फूल लगेंगे
और जिसका फल पोस्तमणि के जीवन रस को अपने में संचित करेगा ,
जीव जंतु इस रस के लालच में इसे खायेंगे और इस तरह इसके बीजों का परिवहन और अंकुरण होगा ,
और इस तरह पोस्टमणि उस पौधे की शक्ल में हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गयी !
आदतें सुबह की चाय की तरह होती है जो ना मिलने पर इंसान वो पाना तो चाहता है
पर उसके लिए किसी का क़त्ल या चोरी नहीं करता ना ही वो बैचैन होकर घूमता है
वो बस उस क्रिया की चाहत रखता है जो उसे माहौल में ढलने का थोडा वक़्त दे थोडा सुकून पहुंचाए ,
पर , निर्भरता अफीम की लत की तरह होती है जो ना मिलने पर क्षय का कारण बन जाती है
जिसके लिए उसका लती बैचैन हो जाता है हिंसक हो उठता है
जो उसे पाने के लिए चोरी और हत्या करने पर भी उतारू हो जाता है !
कहते हैं वही पौधा अफीम का पौधा है जिसके रस में पोस्तमणि के जीवन की कहानी संचित है
और जिसके सेवन से मनुष्य को अपने स्वभाव में कुछ वैसे ही परिवर्तन महसूस होते हैं
जैसे उस चूहे को क्रमशः बिल्ली कुत्ते ... सिंह बनकर हुए थे ,
और जिस पर इंसान उसी तरह निर्भर हो जाता है जैसे कि वो राजा हो गया था !
-------------------------------------------------------------------------------------- ( समाप्त ) 

Sep 3, 2014

वृक्ष

और फिर जैसे सिलने के बाद
दर्जी उलट देता है कमीज को अन्दर से बाहर
कुछ वैसे ही ईश्वर ने पलट दिया सृष्टि को !
अब पहाड़ 
छुपाये बैठे हैं
सबसे गहरी बात अपने शिखरों पर
सागर लबालब भरे हैं भावनाओं से
और पृथ्वी बोध की सबसे शुद्ध प्रतिमूर्ति है !
पौधे प्रकृति की कविताएँ हैं
जो बहुत लम्बी ना जाकर
सीधे पहुँचती है उद्देश्य तक
और अपने पराग छोड़
महका देती हैं ह्रदय को !
और वृक्ष
वृक्ष वो सच्ची कहानियाँ है
जो सदियों से चली आ रही हैं ,
कहानियाँ
जीवंत एहसास की
सुदृढ़ विश्वास की
उस मुक्त प्रकाश की
जिसको देखता है वृक्ष हर पल
उस खुले आकाश की
जिसमें सब ओर फैलती है शाखाएँ संसार की
उस स्वच्छंद हवा की
जिसमें साँस लेते हैं हज़ारों पत्ते हर समय
उस छाँव की
जिसमें सुरक्षित है जीवन
उस खामोश उपस्थिति की
जो बचाए रखती है नमी को किसी भी बंजर प्यास से !

वृक्ष वो सच्चा उपन्यास है
जिसके पन्नों में ख़ुशी ख़ुशी गुज़र जाता है बचपन !
अ से

Sep 1, 2014

कला

(1)

उसने दिए मुझे 
कलम और कूँची 
और अपेक्षा की 
सृजन की ,
जैसा प्रकृति करती है 
जीवन और रस की भाषा में !

(2)

मुझे मिले कुछ शब्द
और मेरे हर ख्वाब हर भाव
हर वेदना को एक रंग
जिनसे रंगता रहा मैं अपने शब्दों को
और खाली पड़े केनवास पर
साकार होता रहा एक जीवंत चित्र !

(3)

बारिश में नहाकर
जब जमीन बुदबुदायी
तो उसके शब्दों से
नर्म दूब खिल आयी
जादू है किसकी आवाज़
जो भरती है जीवन इन चित्रों में !

(4)

अक्षरों से शब्द शब्दों से वाक्य
वाक्यों से सार
कौन है जो जोड़ता है
कोशिका संसार
जीवन से जीवन
जहान से जहान
दिल से दिल जोड़ता है
एक कलाकार महान !

अ से