शाम हो चुकी थी , बड़ी घबराहट के उसने बाहर आने की हिम्मत जुटाई ,
सूंघते नथूने , सब दिशायें तरेरती हुयी आँखें , किटकिटाते हुए दाँत और अति सक्रिय मस्तिष्क ,
वो छोटा सा चूहा कुछ देर पहले की घटना से अभी तक डरा हुआ था ,
जब उसने काल से दौड़ लगाकर पृथ्वी में बनी इस नन्ही सी गुहा इस बिल में शरण ली थी ,
जब से उसने दौड़ना सीखा था वो इसी तरह से दौड़ रहा था खुली हवा उसके लिए कभी सुरक्षित नहीं रही ,
दिन में बिल्लियों और रात में उल्लुओं के रूप में काल हर जगह उसे पहरा देते नज़र आता था !
सब ओर सुरक्षित वातावरण पाकर वो बाहर निकला और खाने कुतरने के लिए कुछ तलाश करने लगा ,
अभी वो कुछ दूर ही पहुंचा था कि उसे अपनी ओर दौडती हुयी दो आँखें नज़र आई ,
और वो सब कुछ भूल कर फिर से भागने लगा और भागते भागते एक कुटिया में घुस गया ,
जहाँ एक ऋषि अपने नित्य पाठ में व्यस्त थे , वो दौड़ कर उनकी ओट में दुबक गया !
ऋषि अपने कार्य में उत्पन्न व्यवधान से पहले तो क्रोधित हुए ,
पर फिर उस नन्हे से जीव को काँपता हुआ देखकर उन्होंने पूछा कि वो इतना भयभीत क्यूँ है ,
चूहा अपने पिछले दो पंजों पर खड़ा होकर हाथ जोड़कर बोला ,
" हे महात्मन मुझे मृत्यु से बड़ा भय लगता है और ये बिल्ली हमेशा ही मेरी ताक में बैठी रहती है ,
काश अगर मैं बिल्ली होता तो मैं निर्भय होकर अपना जीवन यापन कर पाता ! "
ऋषि बोले , " काल सभी के लिए मुँह खोले खड़ा है मृत्यू हर किसी को व्यापती है
बस सभी के लिए वो अलग अलग शक्ल लेकर आती है बिल्ली बनकर तुम्हें क्या फायदा होगा ! "
पर वो डरा हुआ चूहा सिर्फ इतना कह पाया की , हे महात्मन ! अगर संभव है तो आप इतनी कृपा कर दीजिये !
उस नन्ही सी बुद्धि को और अधिक ना समझाकर शरण में आये हुए की रक्षा का धर्म सोचकर उन्होंने कहा
कि हर वक़्त तो मैं तुम्हारा ध्यान नहीं रख सकता पर अगर बिल्ली बनने से तुम अपनी रक्षा में समर्थ हो , तो तथा अस्तु !
और अभिमंत्रित जल के कुछ छींटे पड़ते ही वो चूहा बिल्ली बन ख़ुशी ख़ुशी कुटिया से बाहर चला गया !
बिल्ली बनने के पश्चात् उसका स्वभाव उसकी क्रियाशीलता और उसकी इच्छाएं बदल चुकी थी ,
वो अपने को ज्यादा सजग , फुर्तीला और चतुर महसूस करने लगा और वहीँ कुटिया के आसपास छोटे मोटे जीवों को खाकर रहने लगा ,
कुछ दिन सुकून से गुजारने के बाद एक दिन उसने अपनी और गुर्राते हुए एक जीव और दो गुस्सायी हुयी आँखों को देखा ,
नज़रें मिलते ही वो कुत्ता उसकी और लपका और उसने अनायास ही खुद को पूरी जान से दौड़ता हुआ पाया ,
सामने फिर वही कुटिया पाकर उसने कुटिया में शरण ली और ऋषि से कहा की है भगवन् मुझे आप कुत्ता बना दें ,
बिल्ली होकर भी मैं काल के इस चेहरे से अत्यंत भयभीत हूँ !
मृत्यु को सामने पाकर आखिर किस सामान्य जीव की बुद्धि काम करती है ऐसा सोचकर ऋषि ने अबकी बार उसे ज्यादा कुछ ना समझाकर उसे कुत्ता बना दिया और वो वहां से बहुत खुश होकर चला गया !
एकांत में बैठकर जबकि आप समस्याओं के अधीन ना हों काफी दूर की दृष्टि साध सकते हो ,
पूरे जीवन काल को एक क्षण में लाँघकर उसके नतीजे पर विचार कर सकते हो ,
सुनी हुयी कहानियों और अनुभव के आधार पर अपने जीवन को दिशा देने का उपक्रम कर सकते हो ,
पर पल पल को जीते हुए जीवन के बदलते समीकरणों के साथ गति करना ,
संकल्पों और नियमों की सरल रेखा पर तो सामान्यतः असंभव ही है !
तब आप सिर्फ सामने आयी हुयी विभीषिकाओं को टालते हुए , पल दर पल अपने को समस्याओं से दूर रखते हुए जीते हो ,
और किसी भी तरह की मृत्यु को टालते रहना ही जीवन का उपक्रम बना लेते हो !
आगे उस कुत्ते का जीवन जंगली सूअर और फिर क्रमशः बन्दर भालू और हाथी द्वारा बाधित हुआ ,
और हर बार वो ऋषि से प्रार्थना कर अपने को अगले रूप में बदलता रहा ,
ताकि मृत्यु का उसका भय कम हो और वो चैन से जीवन व्यतीत कर सके !
हाथी बनने के बाद वो खुद को बहुत भारयुक्त महसूस करने लगा ,
समय उसको बढ़ा हुआ महसूस होता और वो काफी शान्ति भी अनुभव करता था ,
कभी कभी वो मस्ती में आकर झूमता और वन में दौड़ता भी था ,
पर बाघ और सिंह जैसे हिंस्र पशुओं से अब भी उसे भय रहता ,
और फिर ऋषि की सहायता से वो खुद भी एक हिंसक शेर में बदल गया ,
कुछ समय उसने बिना किसी की परवाह अपने जैसे हिंसक स्वभाव के जीवों के साथ व्यतीत किया !
एक दिन उस वन से एक पालकी गुजरी , कुछ लोग उसकी सुरक्षा के लिए साथ चल रहे थे ,
और तभी एक शेर की दहाड़ सुनाई दी , एक स्त्री ने पालकी से बाहर झाँक कर कुछ इशारा किया ,
कुछ लोग अपने भाले और तीरों के साथ उस दिशा में गए जहाँ से वो आवाज़ आई थी ,
और उस शेर को तीरों और बरछों से भेद कर पकड़ कर ले आये ,
तब इस दृश्य को देखकर उस सिंह को भी अपनी मृत्यु नज़र आने लगी और उसने ऋषि के पास जाकर कहा ,
" हे महान ! आप मुझे एक स्त्री में बदल दें उसके एक इशारे पर इतना शक्तिशाली शेर भी मार दिया गया "
ऋषि को भी इस हिंस्र पशु से बेहतर उसका मनुष्य होना लगा और उसने उसे एक सुन्दर कन्या में बदल दिया ,
अपनी विद्या के प्रभाव से उसकी उत्पत्ति के कारण वो उसका धर्मपिता हुआ ,
और उसने मंत्रोच्चार के साथ उसका नामकरण किया " पोस्तमणि " !
पोस्तमणि इस रूप में आने के समय से ही एक सुन्दर तरुणी थी ,
मनुष्य बनने तक के सफ़र में वो अपना बहुत सा भय पीछे छोड़ आई थी और उन्मुक्त होकर हर पल को जीना चाहती थी ,
जीव जंतुओं के ह्रदय की उसको भली प्रकार थाह थी और वो उस वन में मुक्त स्वच्छंद विचरण करने लगी ,
जल्द ही उसके रूप लावण्य और गुणों की खबर उस वन से बाहर पहुँच गयी ,
कानों से मुँह तक आने के रास्ते में किसी बात के साथ कुछ और विशेषण जुड़ जाना सामान्य ही है
जो लोगों ने अपनी घ्राण शक्ति से पैदा किये होते हैं ,
और जितने कानों और मुँह वो बात गुज़र कर जाती है
उतने ही अलग अलग रंग और महक की कहानियाँ उसके साथ जुड़ जाती हैं !
उस कन्या की मोहक तस्वीर राजा तक इतनी अलग अलग जबानों से पहुँच चुकी थी
कि राजा अकहे ही उसके मोहपाश में पड़ चुका था ,
कुछ ही समय पश्चात् उसने उस वन की ओर रुख किया
और वहाँ पोस्तमणि को देखकर अपने ह्रदय की सभी उत्सुकताओं की पुष्टि कर ली ,
ऐसी चंचलता जो आँखों में समा नहीं पाए ,
ऐसा उन्मुक्त रूप जो ह्रदय को भारशून्य कर दे ,
ऐसे नर्म झोंके जिनमें होश संभाले ना संभले ,
और ऐसा आनंद जो बारिश में नाचता मयूर ही जानता हो ,
वो एकटक उसे देखता रहा अपनी स्वप्न मुग्धता तक !
होश सँभालने पर उसको नज़रों से ओझल पाकर राजा को अजीब सी बैचैनी खाने लगी ,
वो उसको तलाशता हुआ पास ही ऋषि की कुटिया तक पहुंचा ,
और उनको सब हाल बताकर उसने पोस्तमणि का हाथ मांग लिया ,
ऋषि के पास कन्यादान लेकर अपने पितृ धर्म से उऋण होने का मौका था ,
उन्होंने बस इतना कहा की शुरू से ये वन ही पोस्तमणि का घर रहा है तो नगरीय तौर तरीको में ये उतना सहज नहीं रह पायेगी
अतः इसका ख़ास ख़याल रखना और इसको किसी भी ईर्ष्या और भय से मुक्त रखना ,
ऐसा कहकर कुछ जल छिड़ककर पोस्तमणि का हाथ उस राजा के हाथ में देकर उन दोनों को आशीर्वचनों और स्वास्थ्य संपत्ति की मंगल कामनाओं के साथ विदा किया !
पोस्त मणि के भाग्य में स्थिरता नहीं थी , उसने इतने से जीवन में इतने जीवन और तरह तरह के भय देख लिए थे ,
राजा का उससे विशेष लगाव था और राजमहल में अधिकतर समय राजा उसी की साथ व्यतीत करने लगा ,
उसको अपने राजकाज और सामाजिकता में रूचि नहीं रह गयी थी , वो एक कमलिनी के प्रेम में डूबा हुआ वो भंवरा हो गया था जिसे अपनी स्वतंत्रता और जीवन की भी सुध ना रहे जिसके रात दिन उसी पुष्प मद में कैद होकर रह गए हों !
इस दौरान मंत्री राजा को कामकाज के प्रति आश्वस्त रखते रहे ताकि सत्ता से उसका ध्यान हटा रहे ,
और बाकी रानियाँ और राजा की प्रिय रही दासियाँ इस वनचरी से ईर्ष्या रखने लगी ,
एक दिन मौका पाकर उन्होंने पोस्तमणि के खाने में विष मिला दिया जबकि वो वन की ओर जाने वाली थी ,
विष पचा ना पाने के कारण पोस्तमणि की सुध जाने लगी और वो अंधी होकर एक कुँवे में गिरकर मृत्यु को प्राप्त हो गयी !
दिनभर में पोस्त मणि के वियोग में राजा के प्राण सूखने लगे , उसकी मृत्यु की खबर उसके गले से नीचे नहीं उतर रही थी ,
जिस जीवंत मुस्कान से मुरझाये हुए पौधे खिल उठते थे जिस के चेहरे से हमेशा पूर्णिमा की चांदनी छिटकती थी ,
जिस की खिलखिलाहट से भोर हुयी समझ पंछी चहचहाने लगते थे वो भला कैसे काल की अमावस के अँधेरे में खो सकती है !
कुछ और उपाय ना पाकर राजा ऋषि के पास जाता है और उन्हें सब बात बताकर कहता है
कि पोस्त मणि के बिना उसका जीवन अधूरा है उसके प्राण अधर में हैं और कुछ भी उपाय करके उसे जीवित कर दो ,
राजा को सांत्वना देकर ऋषि उस कुंवे की ओर जाते हैं और वहाँ पोस्तमणि की देह को पास की मिट्टी में दफ़न करवाकर
अभिमंत्रित जल छिड़क कर कहते हैं की अब यहाँ एक पौधा जन्म लेगा जिसमें सुन्दर फूल लगेंगे
और जिसका फल पोस्तमणि के जीवन रस को अपने में संचित करेगा ,
जीव जंतु इस रस के लालच में इसे खायेंगे और इस तरह इसके बीजों का परिवहन और अंकुरण होगा ,
और इस तरह पोस्टमणि उस पौधे की शक्ल में हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गयी !
आदतें सुबह की चाय की तरह होती है जो ना मिलने पर इंसान वो पाना तो चाहता है
पर उसके लिए किसी का क़त्ल या चोरी नहीं करता ना ही वो बैचैन होकर घूमता है
वो बस उस क्रिया की चाहत रखता है जो उसे माहौल में ढलने का थोडा वक़्त दे थोडा सुकून पहुंचाए ,
पर , निर्भरता अफीम की लत की तरह होती है जो ना मिलने पर क्षय का कारण बन जाती है
जिसके लिए उसका लती बैचैन हो जाता है हिंसक हो उठता है
जो उसे पाने के लिए चोरी और हत्या करने पर भी उतारू हो जाता है !
कहते हैं वही पौधा अफीम का पौधा है जिसके रस में पोस्तमणि के जीवन की कहानी संचित है
और जिसके सेवन से मनुष्य को अपने स्वभाव में कुछ वैसे ही परिवर्तन महसूस होते हैं
जैसे उस चूहे को क्रमशः बिल्ली कुत्ते ... सिंह बनकर हुए थे ,
और जिस पर इंसान उसी तरह निर्भर हो जाता है जैसे कि वो राजा हो गया था !
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