Jan 24, 2015

She Walks in Beauty : lord byron


हवाएँ बनाती चलती है उसका रास्ता , जैसे कोई
साफ बादल-विहीन तारों से सजी रात का आकाश ;
और जो कुछ है बेहतरीन अँधकार और प्रकाश में
मिलता है छवि में उसकी आँखों की उजास में :
और इस तरह तनाव मुक्त उस कोमल रौशनी में 
तीखे दिन के उजाले नकार दिये जाते हैं ।
जो होती एक छाया परत और , या एक किरण कम ,
आधा कर देती वो अनामिक आकर्षण ,
जो लहराता है हर एक स्याह ज़ुल्फ में ,
या नरमाई से खिल आता है उसके चेहरे पर ;
जहाँ हर खयाल जाहिर होता हैं मीठी खामोशी से
कितनी निश्छल कितनी प्यारी है उनकी खिलने की जगह ।
और उन गालों पर , और भवों के ऊपर
कितनी कोमल कितनी शांत , तब भी सुहावनी
वो मुस्कान जो जीत लेती है , रंग जो खिल उठते हैं
पर बात उन दिनों की जो खर्च हुये भलाई में
एक मन जो सुकून में है जिसके साथ है
एक दिल जिसका प्रेम है मासूम निश्छल ।
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She walks in beauty, like the night
Of cloudless climes and starry skies;
And all that's best of dark and bright
Meet in her aspect and her eyes:
Thus mellow'd to that tender light
Which heaven to gaudy day denies.
One shade the more, one ray the less,
Had half impaired the nameless grace
Which waves in every raven tress,
Or softly lightens o'er her face;
Where thoughts serenely sweet express
How pure, how dear their dwelling-place.
And on that cheek, and o'er that brow,
So soft, so calm, yet eloquent,
The smiles that win, the tints that glow,
But tell of days in goodness spent,
A mind at peace with all below,
A heart whose love is innocent .
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She Walks in Beauty : lord byron

वक़्त जब सीढ़ियों पर होता है !


वक़्त जब सीढ़ियों पर होता है ना तब आप सबको पीछे छोडते चलना चाहते हो
अकेले , आगे ... और आगे ...
वही वक़्त जब झूले पर होता है तब आप चाहते हो एक और कोई साथ हो
खास खामोशी से देखने को ...
पर वही वक़्त जब रिसकनी पर होता है तब आप झट से कुछ पकड़ लेना चाहते हो 
किसी को भी , किसी का भी हाथ ...
और वही वक़्त जब पहाड़ों पर चढ़कर किसी चट्टान के आखिरी किनारे पर से
नीचे गहरी अंधेरी खाई को देखता है , तब उसे पूरा वृत्त
उसी एक बिन्दु पर घूमता दिखाई देने लगता है , वो समझ नहीं पाता किसे थामे !
वक़्त ही हर चित्र रचता है उसमें आपकी भूमिका तय करता है
आपको आपका चरित्र और संवाद देता है और उसी में आपको चिपका देता है !
अ से

Jan 23, 2015

ईश्वर अच्छा कवि नहीं था शायद ...



ईश्वर अच्छा कवि नहीं था शायद
या शायद कवि उतने अच्छे नहीं थे जिन्होंने ईश्वर को लिखा !
अच्छे कर्म करोगे तो स्वर्ग हासिल करोगे
यहीं इसी दुनिया में 
काश ईश्वर ने इसे यूं कहा होता
अच्छे से कर्म करोगे तो यहीं स्वर्ग हो जाएगा ।
जहाँ पल पल मृत्यु के खौफ से आप इधर उधर नहीं दौड़ोगे ।
कुछ लोग पृथ्वी पर रहते हैं पृथ्वी पर ही सोते हैं
कुछ के कदम कभी जमीन नहीं छूते
और कुछ को जमीन भी नसीब नहीं
वहाँ मौत की घड़िया चलती रहती है हर वक़्त
और उसी अनुपात में जन्म लेने वाले ।
या शायद वो सबसे अच्छा कवि था
पर उसे पाठक अच्छे नहीं मिले ।
कि वो लिख सकता था इसे बहुत कड़क शब्दों में
या वो लिख सकता था इसे बहुत सजावटी आश्चर्य में
पर उसने लिखा जस का तस
बोलचाल की भाषा में
वो सबसे अच्छा कवि है
जिसने कर्म का प्रयोजन बताया कर्म का प्रलोभन नहीं
और प्रयोग की उपलब्धि से ज्यादा ज्ञान की आवश्यकता
शायद वो सबसे अच्छा कवि था
जिसने ये सब खामोशी के लफ्जों में यहाँ वहाँ लिख दिया
या फिर शायद वो जिसने स्पष्ट रूप से सबको बता दिया !
वो शायद सबसे अच्छा कवि है
कि उसकी प्रेम कथा के नायक नायिका
ना कभी एक होते हैं ना ही कभी अलग
बस हवाओं में एक दूरी बनाए रखते हैं हमेशा हमेशा !
अ से
गैलिलियो उछल पड़ा , पृथ्वी गोल है ,
कोपरनिकस प्रमाणित हुआ ,
अरस्तु का भूत अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त था ,
और उसने वहीँ से हाथ हिला कर अपनी प्रसन्नता जाहिर कर दी,
गैलिलियो ने भी अपने स्थान से ही उसके प्रतिकार में आभार प्रकट कर दिया ।
जब मैंने उसे बताया था , पृथ्वी के कोनों के बारे में ,
उसने चाँद को देखकर मेरी बात अनसुनी कर दी थी ,
मेरे दिए गए द्विविमीय चित्रों में सामर्थ्य न थी
जीवन की सारी दिशायें उसे दिखा पाना ,
और ना ही उसने जीवन की गहन सघन दिशाओं में झांकना जरूरी समझा ,
जाने क्या जिद थी , जाने किस हिसाब में उलझा रहना था ॥
हाँ , मैं , मैं भूल ही गया बताना , मैं दिग्दर्श ।
गुरु बृहस्पति के मिले शाप से अभिशप्त मैं
सदियों से विचर रहा हूँ पृथ्वी पर ,
मुझे नहीं जाना था कहीं कभी इसे छोड़ कर ,
मुझे नहीं पसंद था अपना आकर खोना
मैं अपने दम - क़दम पर चलने का शौक़ीन ,
एक एक कदम संभल कर चलता रहा हूँ , निहारते हुए इसे , सदियों से
मैंने देखा है यहाँ सभ्यताओं को बनते बिगड़ते ,
विशालकाय जीव मेरे सामने से होकर गुज़र गए ,
उन्हें अंदाजा न था पृथ्वी के छोरों का ,
वो रुके नहीं , अंत तक ,
उनका दुस्साहस सीमा से परे हो गया था ,
और वो गिरा दिए गए इस ज़मीन से ,
उन्हें लगता था ये भी अनंत है आकाश की तरह ,
पर पृथ्वी सीमित थी , जैसी आज भी है ,
और वो इसकी हदों के आगे एक कदम रखते ही गिर गए , अन्धकार में ।
गेलिलियो जानता नहीं था समय की गणित ,
उसने हिसाब समझाया , धर्म की समझ में ना आया ,
उसने हिसाब समझाया , न समझते हुए भी छात्रों ने सहमती में सर हिलाया ,
प्रमाणित हुआ , जो नहीं होना चाहिए था ,
उन्होंने कुछ न छोड़ा , कोई भी कोना नहीं ,
प्रमाण एक गन्दी आदत है ,
बमुश्किल ही कोई छोड़ पाता है , कोई आत्मसाक्षी ही ।
सोचो की ये दुनिया स्वप्न है और तुम चलते हो इसमें
पैरों के तले से जमीन को छूकर ,
दौड़ते हो अलग अलग दिशाओं में , निगाहें उठाकर ,
निगाहें घुमाकर देखते हो सबकुछ ।
वास्तव में पृथ्वी का समतल होना ही दिशाओं का ज्ञान है
चित्त सघन का भान , अपने पैरों पर खड़ा होना ,
जिन्हे पृथ्वी गोल लगती है उनकी भी जमीन समतल ही है
पर उन्हें ऊपर और नीचे का अंतर नहीं ज्ञात होता ,
ना दायें और बाएँ का और ना ही भीतर और बाहर का !
मैं जब सिमट जाता हूँ तो ये कुछ नज़र नहीं आता ॥
ठोस शून्य , पूर्ण स्थिर , निराकार , तब कुछ विचार में नहीं आता ,
और आकार को अस्थिरता का खतरा होता है ,
तब जब ज़मीन का अनुभूतण हुआ , जल से ,
जो की सब जगह समाई ऊष्मा से उत्पन्न हुआ था ,
तब वो जल की गति के कारण अस्थिर और डगमगाई रहती थी , किसी बच्चे की तरह ,
इसको स्थिर रखने का कार्यभार एक नाग ,चार हाथियों और एक कछुए को सोंपा गया ।
नाग , अगत्य था , विगत हर प्रलय में शेष था ,
उसकी स्थिरता पर किसीको संदेह न था , वो अच्छा आधार हुआ ,
उसने आकाशीय चेतना में विचरते , वायु विचारों के, ऊष्म प्रवाह से उत्पन्न
तरल भावों के सूखने से सृष्ट , पृथ्वी को और आगे
अन्धकार मय अस्थिर परिदृश्य में जाने से भलीभांति रोक लिया ,
उसे सब और से लपेट कर वहीँ सीमित कर दिया ,
चेतना अन्धकार में तरह तरह के कष्ट पाती है , स्वप्न मूर्छा में घिरने लगती है ,
जब तक की उसे अन्धकार से उठने की सुध नहीं आती
और सुकून की सीमान्त धरा की शरण नहीं मिल जाती ।
पर धरती अभी भी बैचेन थी ,
उसे धीरज दिलाने के लिए , नाग के ऊपर महासंयमी कूर्म को जगह दी गयी ,
कूर्म जो कठोर तप है सघन ऊष्मा लिए हुए ,
और पृथ्वी थोड़ी और सिमट कर सघन हुयी ,
चेतन हृद में अभी अभी कूर्म नाड़ी का निर्माण हुआ ,
और पृथ्वी अपनी जगह स्थिर हो गयी ,
और तभी मुझे भी निमंत्रणा गया , दिशाओं का ध्यान रखने के लिए ,
और तब चार कोनों में महाविवेकी चार गज चौकीदार हुए ,
दिग्गज , दिशाओं के हाथी , जो दिशाओं में चेतना के संयम से जन्मे ,
दिशाओं के अंतिम छोर हैं , और अंत से मुख्य द्वार रक्षक ,
एक पूर्व में घटित कहानियाँ सुनाता है ,
तो पश्चिमी अनुमानित सार बताता है ,
उत्तर और दक्षिण की और के हाथी सिर्फ सुनते हैं ,
और उसमें से अपने अपने विवेक के अनुसार भाग्य और पुरुषार्थ का निर्णय करते हैं ,
चारों हाथी बहुत अच्छे मित्र हैं , दिनभर बतियाते हैं , पूर्व वाला पश्चिम का और वाम दक्षिण का प्रिय है ,
बड़ी ही ख़ामोशी से , बहुत दूर से संप्रेक्षण करते पृथ्वी पर श्रुतियाँ बरसाते हैं ।
उस दिन पृथ्वी पर काला दिन घोषित हुआ ,
भविष्य अन्धकार मय होने वाला था ,
क्योंकि एक मेंढक ने अपने कुएं को दुनिया सिद्ध कर दिया था ॥

अ से 

Jan 22, 2015

Body of a Woman -- Neruda .


एक स्त्री की देह
उजले ऊरु , उजले उभार
जैसे तुम हो कोई संसार
आत्मसमर्पण में बिछा हुआ
मेरी रूखी कृषक देह कुरेदती है तुम्हें
और प्रेरित करती है पुत्रों को
उपज आने में पाताल के अँधेरों से ।
मैं अकेला था
किसी खाली सुरंग की तरह
पंछी जहाँ से उड़ चुके थे
अंधकार भीतर तक भरने लगा था
अपने प्लावित आक्रमणों में मुझे ।
एक हथियार की तरह
मैंने तुम्हें ढाला आत्मरक्षा के लिए
मेरे धनुष के एक तीर
मेरी गुलेल में एक पत्थर की जगह ।
लेकिन प्रतिशोध का समय गुज़र गया
और मुझे प्यार है तुमसे
देह , कोमल त्वचा की , फिसलन भरी
उन्माद और उत्सुकता से भरी हुयी
ओह ! स्तन के प्यालों
ओह ! अनुपस्थिति की आँखों
ओह ! तरुणाई का गुलाब
ओह ! तुम्हारी आवाज़ , शांत और उदास
ओह ! देह मेरी स्त्री की
मैं लगा रहूँगा तुम्हारे आकर्षण में
ओह ! मेरी प्यास ,
मेरी असीम चाह
मेरी बदली हुयी राह !
नदी के गहरे किनारे
जहां बहती है शाश्वत प्यास
पीछा करते हैं थकान के एहसास
और एक अंतहीन दुःख !
Body of a Woman -- Neruda .

Jan 21, 2015

कचहरी


घिरा हुआ हूँ साक्ष्यों से
पर कुछ मुकदमे सुलझने नहीं हैं ,
देर तक देखता हूँ खुद एक गवाह की तरह
पर क्या मैं फैसला देना चाहता हूँ ?
दोष का सिद्ध हो जाना
क्या दोषी करार दे दिया जाना है
क्या मुझे फैसला सुना देने का अधिकार हो जाना है ?
दोषी का फैसला क्या सजा होती है / हो सकती है ?
क्या फैसले दोष दूर कर सकते हैं ?
मैं क्यों फैसला कर देना चाहता हूँ ।
क्या मुकदमा वहीं खत्म हो जाता है ?
क्या कुछ मुकदमे सुलझ सकते हैं ? कभी !
भाव भी कितनी जल्दी बदलते हैं ना !
एक दुर्घटना हुयी ,
माफ कीजिएगा एक घटना हुयी ,
उस घटना में कुछ बातें अनायास थी
कुछ बातें सप्रयास ,
पर सप्रयास कितना सप्रयास था कितना अनायास , कौन जाने !
तो एक घटना हुयी
और आप जानना चाहते हो दोष किसका ?
आप घटना के पीछे का कारण जानना चाहते हो ?
किसी एक का दोष सिद्ध होता है ,
क्या वो दोषी हर पल दोषी है , या उस घटना के लिए दोषी है ,
क्या दो दोष खुद एक घटना नहीं ?
क्या उसके पीछे के कारण जानने में किसी की दिलचस्पी है ?
क्या दिलचस्पी भी एक घटना नहीं ?
क्या इस घटना का कारण जानने लायक है ?
क्या हर सवाल का उत्तर दिया जाना आवश्यक है ?
क्या हर सवाल का उत्तर है ?
क्या कोई सवाल है ? हो सकता है ?
क्या बिना सवाल जवाब
कोई मुकदमा सुलझ सकता है ?
क्या जरूरी है मुकदमा सुलझाना !
जबकि मैं घिरा हुआ हूँ साक्ष्यों से
और हर एक वस्तु , हर एक बात , हर एक घटना ,
साक्ष्य है , जबकि हर कोई घिरा हुआ है उनसे ,
और खुद एक सबसे बड़ा साक्ष्य है ,
पर क्या कोई मुकदमा है ?
अ से

एक अंत है हर घटना


दृश्यों के इस प्रवाहमान नद्य में
एक अंत है 
हर घटना 
रोशनी की एक छोटी सी किरण  ,
शांत हो जाना उसका , 

और फिर अँधेरा हो जाना है ,कहानी के अंत तक 
एक मीठी नींद और एक नया सूरज इंतेजार कर रहे हैं जहाँ 

अ से 

Jan 20, 2015

April Rain Song -- Langston Hughes

चूमने दो बारिश को तुम्हें
लगने दो बारिश को सर पर चमकीली गीली बूंदों में
गाने दो बारिश को तुम्हारे लिए एक लोरी
कि ये बारिश बनाती है अभी भी तालाब छोटे छोटे गड्ढों में
कि ये बारिश तैराती है अभी भी नाव सड़कों के किनारे 
और ये बारिश गाती है एक प्यारी नींद की धुन हमारी छतों पर रात में
और मुझे प्यार है इस बारिश से ।
Langston Hughes -- April Rain Song

Jan 19, 2015

दिल के एक अलग आले में ...


दिल के एक अलग आले में , दुनिया से दूर
जहां पहुँच ना सके कोई कभी
मैं चाहता हूँ रखना तुझे ।
मैं देखना चाहता हूँ , चेहरा तेरा 
बिना लिपे पुते , बिना कोई शक्ल बनाए
ताकि मैं देख सकूँ
खिलती हुयी मुस्कान
रोशनी के सफहों से लिखी हुयी
मद्दम मद्दम
बदलते हुये रंगों को
देखना चाहता हूँ
प्रकृति की अद्भुत कूँची
अटखेलियाँ करते हुये भावों को
तेरे चेहरे पर
हर लकीर को मुड़ते हुये
आँखों में कैद कर लेना चाहता हूँ
हर सफ़हा तेरी खुशी का ।
स्मृति के एक अलग कोष में , खुद से भी दूर
जिसे धुंधला ना सकूँ मैं भी
मैं चाहता हूँ रखना तुझे ।
मैं सोचना चाहता हूँ , तुझे हर लम्हा
बिना किसी विचलन , पूरी जिंदगी का समय लेकर
ताकि मैं देख सकूँ
तेरे दिलखुश अंदाज़
स्वर्ग की नम बारिशों में
तेरा रक्स
तुझे छूकर जाती हवा के साथ
प्रकृति के सबसे भंगुर सबसे कोमल चित्रों को
उसके सौ रूपों में
कैद कर लेना चाहता हूँ
स्मृति में तुझे
खुद को पूरी तरह से भुलाकर ।
अ से

Refugee blues -- WH Auden


शरणार्थीय उदासता :
कहते हैं ये शहर रखता है सौ लाख आत्माएँ
कुछ रह रही है बँगलो में , कुछ रह रही है गड्ढों में :
तब भी कोई जगह नहीं हमारे लिए , मेरे दोस्त , तब भी कोई जगह नहीं हमारे लिए ।
एक समय एक देश था हमारा और हम मानते थे इसे जहाँ
देखो मानचित्र में और ये तुम्हें मिल जाएगा यहाँ :
हम नहीं जा सकते अब वहाँ , मेरे दोस्त , हम नहीं जा सकते अब वहाँ ।
वहाँ गाँव के कब्रिस्तान में बढ़ता है एक पुराना सदाबहार (वृक्ष)
हर बहार में ये खिल जाता है नया सा :
पुराने पासपोर्ट नहीं कर सकते ये , मेरे दोस्त । पुराने पासपोर्ट नहीं कर सकते ये ।
राजदूत आया और मेज ठोक कर बोला ,
" अगर तुम्हारे पास पासपोर्ट नहीं है तो आधिकारिक तौर पर मर चुके हो तुम ":
पर हम जिंदा हैं अभी तक , मेरे दोस्त , पर हम जिंदा हैं अभी तक ।
गया एक सीमिति में ; उन्होने मुझे बैठने को कुर्सी दी ;
और विनम्रता से कहा अगले साल आना :
पर कहाँ जाये हम आज अभी , मेरे दोस्त , पर कहाँ जायें हम आज अभी ?
पहुँचा एक सार्वजनिक सभा में : वक्ता उठा और बोला ;
" अगर हम उन्हे आने देंगे , वो चुरा लेंगे हमारी रोज-रोटी " :
वो बोल रहे थे मेरे तुम्हारे बारे में , मेरे दोस्त , वो बोल रहे थे मेरे तुम्हारे बारे में ।
सोचो मैंने सुना बिज़ली को आकाश में गड़गड़ाती हुयी ;
वो हिटलर सी यूरोप पर , कह रही थी , "उन्हें मरना ही होगा " :
ओ हम उसके दिमाग में थे , मेरे दोस्त , हम उसके दिमाग में थे ।
देखा एक नन्हा पिल्ला पिन से बंधा हुआ एक जैकेट में ,
देखा एक दरवाजा खुलते हुये और एक बिल्ली को अंदर बुलाते :
लेकिन वो नहीं थे जर्मन यहूदी , मेरे दोस्त , लेकिन वो नहीं थे जर्मन यहूदी ।
गया नीचे बन्दरगाह पर और खड़ा हो गया घाट पर ,
देखा मछलियों को तैरते हुये कितनी आजाद थी वो :
सिर्फ 10 फुट दूर , मेरे दोस्त , सिर्फ दस फुट दूर ।
गुज़रा एक जंगल से , देखा पंछियों को पेड़ों में ;
उनमें नहीं थे कोई राजनीतिज्ञ और वो गाती थी मन चाहा :
वो इंसानी सभ्यता नहीं थी , मेरे दोस्त , वो इंसानी सभ्यता नहीं थी ।
सपने में देखी मैंने एक इमारत हज़ार मंजिलों वाली ,
हजारों खिड़कियाँ और हजारों दरवाजे :
एक भी नहीं थी उसमें से हमारी , मेरे दोस्त , एक भी नहीं थी उसमें हमारी ।
खड़ा हूँ एक महान समतल पर गिरती हुयी बर्फ में ,
दस हज़ार सैनिक , आगे आते हैं और चले जाते हैं :
तलाश में तुम्हारी और मेरी , मेरे दोस्त , तलाश में तुम्हारी और मेरी ।
Refugee blues -- WH Auden

Dreams -- Langston Hughes

सीने से रखो सपनों को
कि जब सपने मरते हैं
जीवन एक पंछी है टूटे परों वाला
जो उड़ नहीं सकता ।
सीने से रखो सपनों को 
कि जब सपने रूठते हैं
जीवन एक खाली मैदान है
बर्फ से जमा हुआ ।
Dreams -- Langston Hughes

Jan 17, 2015

एक पत्थर जो सदियों से वहीं था



एक पत्थर जो सदियों से वहीं था , जिसके बारे में चर्चाएँ थी दूर दूर तक ,
वो कब से वहीं था कोई नहीं जानता , वो कब तक वहाँ होगा कोई नहीं जानता ।
लोगों के मन में निश्चित थी उसकी स्थिति , कि वो है , कि कहाँ है वो , और दूसरा समय-रेखा में उसका कोई ओर-छोर किसी को नहीं पता था / समाजिकता के संदर्भ में भी वो हजारों लोगों द्वारा पूजित था इससे उसकी सत्यता पूर्णतः खंडित नहीं की जा सकती थी और उस पर स्वतः ही श्रद्धा झलकती थी । वो चमकीले काले राग का एक पत्थर था जिसने ना जाने कितने मौसम सर्दी गर्मी के ताप झेले थे और फिर भी अविचल स्थिर और अपने अस्तित्व को लेकर अशंक था , उसका कोई रूप नहीं था कि सर धड़ या हाथ पैर अलग किए जा सकते हों वो अरूप मात्र एक लिंग एक चिन्ह था जो अपने अस्तित्व की उपस्थिती दर्ज कराये वहाँ सदियों से विद्यमान था ।
वो ठोस इंद्रिय शून्य मनः शून्य जीव शून्य पत्थर ,
वो आत्मा का रूपक था , ईश्वर का एक बिम्ब चिन्ह प्रतीक ,
वो पूज्य था ।
अ से

Are You Drinking ? -- Charles Bukowski


थका हुआ , सागर किनारे , एक पुरानी पीली डायरी
बाहर फिर से ,
मैंने लिखा बिस्तर पर से
जैसा मैंने किया था
पिछले बरस । 
मिलुंगा चिकित्सक से
सोमवार ।
" हाँ , डॉक्टर , पाँव में दर्द , वर्टिगो , सिर दर्द , और मेरी पीठ
तकलीफ देती है । "
" तुम पी रहे हो आजकल ? " वो पूछेगा ।
" तुम ले रहे हो अपनी एक्सरसाइज़ , तुम्हारे
विटामिन्स ?
मुझे लगता है कि मैं बस थोड़ा परेशान हूँ
जिंदगी से , वही बासी पुरानी
पर अस्थिर कारक इसके ।
यहाँ तक की रेसकोर्स में
मैंने देखा घोड़ों को दौड़ते हुये
और ये सब लगा
निरर्थक ।
मैं जल्दी ही निकल आया , टिकेट्स खरीदने के बाद
बाकी बची दौड़ों के ।
" जा रहे हो ?" मोटेल क्लर्क ने पूछा ।
" हाँ ये उबाऊ है "
मैंने उसे बताया ।
"अगर तुम्हें लगता है ये उबाऊ है "
उसने मुझसे कहा , " तो तुम्हें
नहीं आना चाहिए यहाँ लौटकर । "
तो ये रहा मैं
अपने तकिये पर सिर टिकाये
फिर से
बस एक बूढ़ा आदमी
बस एक बूढ़ा लेखक
साथ लिए अपनी
पीली डायरी ।
कुछ चल कर आ रहा है
फर्श पर से
मेरी ओर ।
ओह , ये है बस
मेरी बिल्ली
इस
बार ।
Are You Drinking ? -- Charles Bukowski ।

Jan 16, 2015

वास-निर्वास

1
---------
वो सब कुछ बहुत तकलीफ देता है
जो आपको सुला दे 
तब जबकि आप सोना नहीं चाहते
आप छटपटाते हो ।
और वो 'गहरी नींद' में चले जाने की तकलीफ नहीं ,
आप छटपटाते हो उस सब के लिए
जो आपसे छूट रहा है ,
तब जबकि उनमें भावनाएँ बाकी हैं आपकी !

2
--------
जब वो मुझे याद आती नहीं
मैं उसकी तरफ खिंचा जाता कैसे 
तब जब वो मुझको भूल गयी हो
उसको अपनी याद दिलाता कैसे
तब जब लंबे अंतराल तक अंतराल रहा
तब कोई ख्याल आता कैसे
वरना गर सब चमकीला ही रहता
तो फिर दिन धुंधलाता कैसे ।
अ से

अ से अध्यापक :

 हिसाब लगाओ ...
ये एक अंक की संख्या
सब न्यास घटाकर
सब जोड़ बैठा कर भी 
एक अंक की ही रह गयी !
अगले अंक में
हासिल क्या हुआ !

.......................................
भाग दो ...
कुल जमा स्मृति में
बीते कुल समय का
जी जाती है कितनी जिंदगी
एक पल में ?

......................................... 

Jan 12, 2015

पहेली कोई उदासी की ...


कितनी खूबसूरत
पहेली कोई उदासी की पर ,
वो , वो आँखें वो ,
वो आँखें ही वो ।
जो ठहर गयी थी समय में
कैद कर लिया था जिसे रौशनी ने खास
या हो गयी थी अचानक अनायास ।
कि हटती नहीं थी निगाहों से
उन आँखों की उदास
ठहरी हुयी प्यास ।
क्या कोई जीवन है वो पूछती हैं
कि अगर है तो उन आँखों में
क्यूँ नज़र नहीं आता
कि क्या कोई खुशी है
जिसके लिए लड़ मरते हैं हम ।
क्या कहीं मौत है
जिसमें सो सकें वो
कि अगर है तो उन आँखों में
क्यूँ नज़र नहीं आती
कि क्या कोई शांति है शाश्वत
जिसके आश्वासन में जीते जाते हैं हम ।
अ से

in the ear of a girl -- Federico García Lorca

कान में एक लड़की के
-------------------------
नहीं चाहा
नहीं कहा कुछ भी ।
उसकी दो आँखों में मैंने देखे
दो छोटे पगलाए पौधे ।
हवा के , हँसी के और सोने के ,
हिचकोले खाते ।
नहीं चाहा 
नहीं कहा कुछ भी ।

in the ear of a girl -- Federico García Lorca

लकीर के फकीर


-----------------
किसी ने खींची एक लकीर
रास्ते का रूपक धड़ 
कोई आया बिना समझे
कर गया उसको छड़ ।
---------
किसी ने खींची एक लकीर
दूसरे ने आकर उसे गहरा दिया और
फिर वो होती गयी गहरी हर छोर ।
-----------
किसी ने खींची एक लकीर
दूसरा लगाने लगा अनुमान
कैसा है उसके दूसरी ओर का आसमान ।
--------------
किसी ने खींची एक लकीर
दूसरी फिर तीसरी बना दिया नक्शा पूरा
और उलझा हुआ है उनमें अब हर दिमाग अधूरा ।
--------------
किसी ने खींची एक लकीर
एक राग ने उसके समानान्तर
फिर एक आग ने खींची एक और लकीर
समकोण पर उन सभी को काट कर ।
---------------
किसी ने खींची एक लकीर
किसी और ने कुछ सोचकर खींचनी चाही विपरीत
पर हर बार उसी को पाया
उसने देर तक कागज देखा और उसे फाड़कर मुस्कुराया ।
-----------------
किसी ने खींची एक लकीर
उसने आकर पीट दी
क्यूंकि यही करते हैं सभी ।
------------------
किसी ने खींची एक लकीर
भटकाव से बचने को
पर उसी रास्ते भटक गया तीर ।
अ से

he yawns

eyes , they open ,
he yawns ,
and the world 
comes into being ,
he creates everything 
around him ,
one more day ends
tired , he yawns yet again
the world goes into
slumber , unexpressed !

a se

Jan 11, 2015

horoscope --- vladimir holan

राशिफल
-----------
शाम की शुरुआत ... कब्रिस्तान ... और हवा इतनी तीखी
जैसे हाड़ की किरचें किसी कसाईखाने में ।
कब से लगी हुयी जंग अचानक झिंझोड़ देती है 
साँचे को इसके संतप्त रूप से बाहर ,
और इस सब से ऊपर , शर्म के आँसुओं से भी ऊपर ,
सितारों ने लगभग तय कर लिया है कबूलना ।
क्यों हम समझते हैं सरलता को सिर्फ तभी जब दिल टूटता है
और हम अचानक हम हो जाते हैं , अकेले और भाग्यहीन ।
-- व्लादिमीर होलान

dont go yet --- vladimir holan

नहीं , अभी से मत जाओ
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नहीं , अभी से मत जाओ , मत घबराओ इन सब उत्तेजनाओं से
यह तो एक भालू है , शहद के छत्ते को खोलता हुआ , बाग में 
वो जल्दी ही शान्त हो जाएगा ।
मैं भी रोक लूँगा शब्दों को जो ऐसे झपटते हैं जैसे सर्प के शुक्राणु
ईडेन की उस स्त्री की तरफ ।
नहीं , अभी से मत जाओ , झुकाओ नहीं अपने चेहरे का परदा ,
जबकि केसर की गंध ने रौशन कर दिया है ये मैदान ।
यही है वो जो तुम तब हो , जीवन , भले तुम कहती हो :
चाह से , हम जोड़ते हैं कुछ और । पर प्यार
प्यार रहता है ।
--- व्लादिमीर होलान

that hour -- vladimir holan

वो पहर
-----------
यह है वो पहर : संगीत से संभव नहीं
और शब्द बेमतलब हैं । वो उदास पंक्ति खालीपन की 
खींच दी गयी साँसों के द्वारा बेसब्री से दिखाती है
कि वास्तविकता की पूर्णता चाहिए होती है
कार्य को छवि बनने के लिए ।
बरसात शुरू हो गयी है ,
सुर्ख फीका हो रहा है डहलिया ( के फूलों ) से ,
खूनी धोता है अपने हाथ झरने पर ।
--- व्लादिमीर होलान

nothing after all -- vladimir holan

कुछ नहीं आखिर
-------------------
हाँ , अभी सुबह है और मैं नहीं जानता
क्यों इस पूरे सप्ताह मैं दौड़ता रहा 
बाहर ठंडी सड़कों से इस दरवाजे तक
कहाँ खड़ा हूँ मैं अब , अपने समय के सामने ।
मैं नहीं चाहता था मजबूर करना भविष्य को ।
मैं नहीं चाहता था जगाना उस अंधे आदमी को ।
उसे खोलना है वो दरवाजा मेरे लिए
और चले जाना है फिर से ।
nothing after all -- vladimir holan

On the Pavement --- vladimir holan

फुटपाथ पर --
वो बूढ़ी है और लंगड़ाती है यहाँ हर रोज़
अखबार बेचने को ।
थकी हुयी और चूर 
वो पसर जाती है उसके अतिरिक्त ढेर पर
और चली जाती है नींद में ।
गुजरने वाले
इतने आदी हैं इसके कि वो देखते भी नहीं उसको
और वो , रहस्यमय और जादूगरनी की तरह बड़बड़ाती ,
छिपा जाती है कि उसे क्या मिलना चाहिए ।
On the Pavement --- vladimir holan

always -- vladimir holan

हमेशा
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ऐसा नहीं कि मैंने नहीं चाहा होता जीना ,
पर जिंदगी 
एक ऐसा झूठ है
कि भले अगर मैं सही होता
पर सच के लिए मुझे झाँकना होता मौत में
और यही है जो मैं कर रहा हूँ ।

always -- vladimir holan

Deep in the Night -- vladimir holan

रात की गहराई में
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' कैसे नहीं हुआ जाये ! ' तुम पूछते हो खुद से और आखिर में कहते हो इसे
ज़ोर से ...
पर पेड़ और पत्थर खामोश हैं 
जबकि प्रत्येक का जन्म हुआ है शब्द से और इस कारण मूक हैं
तब से शब्द डरा हुआ है कि वो क्या बन गया है ।
पर नाम उनके अभी भी हैं । नाम : पाइन , मैपल , एस्पन ...
और नाम : स्फटिक , माणिक , पन्ना , प्रेम ।
खूबसूरत नाम ,
डरे हुए हैं सिर्फ इससे कि वो क्या बन गए हैं ।
Deep in the Night -- vladimir holan

how ... vladimir holan

कैसे
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कैसे जियें ? कैसे बनें सरल और यथाशब्द ?
मैं हमेशा से तलाश में था एक शब्द की 
जो बोला गया हो सिर्फ एक दफा ,
या एक शब्द जो बोला ही ना गया हो कभी ।
मुझे चाहिए थे तलाशने कुछ साधारण शब्द ।
कुछ भी नहीं जा सकता जोड़ा
अपवित्र शराब तक में ।
how ... vladimir holan

When It Rains on Sunday --- vladimir holan


जब होती है बरसात रविवार को
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जब होती है बरसात रविवार को और आप अकेले ,
खुले हुए दुनिया के लिए पर नहीं आता कोई चोर 
और ना तो शराबी ना ही दुश्मन खटखटाता है दरवाजा ,
जब होती है बरसात रविवार को और आप वीरान हो
और नहीं कर सकते कल्पना जीने की बिना शरीर के
और ना ही जिये हो जब से ये आपके पास है ,
जब होती है बरसात रविवार को और आप अपने आप में हो ,
नहीं सोचते बात करने की खुद से ।
तब ये एक देवदूत है जो जानता है और केवल वो जो है ऊपर ,
तब ये एक शैतान है जो जानता है और केवल वो जो है नीचे ।
एक किताब है हाथों में , एक कविता जारी होने में ।
When It Rains on Sunday --- vladimir holan

Sonnet of the Sweet Complaint --- Federico García Lorca

मीठी शिकायत का गीत
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कहीं खो ना दूँ ये आश्चर्य , है मुझे डर
और लहज़ा , तुम्हारी मूर्तिमय आँखों का 
उस रात लिखा हुआ मेरे गालों पर
दूरस्थ गुलाब तुम्हारी साँसों का
ये जोखिम है मेरा होना , इस ओर इस हाल
एक शाखहीन तना और क्या हूँ इसके सिवा
नहीं रखता कोई फूल , गूदा या छाल ,
अपनी पीड़ा की करने को दवा
क्या तुम हो खजाना छिपा हुआ मेरा
क्या तुम हो मेरा सलीब , भीगा हुआ दुःख मेरा
या हूँ मैं एक कुत्ता मालिकाना सिर्फ तेरा
मत खोने दो मुझे पाया है जो मैंने अभी
और संवार लो धाराएँ तुम अपनी नदी की
टूटकर गिरती पत्तियों से , मेरे पतझड़ की
Sonnet of the Sweet Complaint --- Federico García Lorca

Jan 10, 2015

वो दोनों अपने अपने जा रहे थे


वो दोनों अपने अपने जा रहे थे
लड़का वक़्त में आगे
लड़की संसार में पीछे
रास्ते दोनों को मालूम ना थे
वो बस चले जा रहे थे 
वहाँ तक जहां समय और संसार
एक जगह आकर मिलते थे
वो दोनों वहाँ थे , तब
आमने-सामने
और उसके बाद
दोनों पीछे मुड़े
लड़का पीछे की ओर आगे बढ़ गया
और लड़की वहीं रह गयी !
अ से

the wall --- vladimir holan

क्यों तुम्हारी उड़ान इतनी भारी है परवाहों से
क्यों हो जाती है ये यात्रा नीरस ?
मैं बात कर रहा हूँ पंद्रह वर्षों से
एक दीवार से
और मैं खींच लाया हूँ उस दीवार को यहाँ
बाहर मेरे अपने नर्क से
ताकि ये बता सके अब
आपको सबकुछ ।
the wall --- vladimir holan

Jan 9, 2015

Ditty of First Desire by Federico García Lorca

पहली ख़्वाहिश की धुन
हरी सुबह में
मैं बनना चाहता था दिल
एक दिल ।
और परिपक्व साँझ में
बनना चाहता था बुलबुल
एक बुलबुल ।
(आत्मा ,
रंग जाती है नारंगी
आत्मा ,
रंग जाती है प्रेम के रंग में )
ज्वलंत सुबह में
मैं बनना चाहता था मैं
एक दिल ।
और ढलती साँझ में
बनना चाहता था अपनी आवाज़
एक बुलबुल ।
(आत्मा ,
रंग जाती है नारंगी
आत्मा ,
रंग जाती है प्रेम के रंग में )
Ditty of First Desire by Federico García Lorca

MADRUGADA (early morning) --- Federico García Lorca

भोर
-----
लेकिन प्यार की तरह
धनुर्धर 
अंधे हैं
हरी रात को
उनके तीर
छोड़ जाते हैं निशान
ऊष्म कुमुदनियों के
चाँद का तला
टूट जाता है बैंगनी बादलों से
और उनके तरकश
भर जाते हैं ओस से
ओह , लेकिन प्यार की तरह
धनुर्धर
अंधे हैं
MADRUGADA (early morning) --- Federico García Lorca

The Guitar - Federico García Lorca

रोने लगी
गिटार ।
टूट गए शीशे
सुबह के ।
रोने लगी
गिटार ।
बेकार है
चुप कराना ।
संभव नहीं
उसे चुप कराना ।
रोती है एकसार
वो पानी की तरह ,
जैसे रोती है हवा
बर्फीले मैदानों तले ।
संभव नहीं
उसे चुप कराना ।
रोती है
सुदूर चीजों को ।
गर्म दक्षिणी रेत
तड़पती है जैसे
सफ़ेद फूलों के लिए ।
रोते हैं जैसे तीर लक्ष्य हीन ,
और साँझ बिना सुबह के ,
और पहला पंछी ,
शाख पर मरा हुआ ।
ओह ! गिटार
ओ घायल दिल
पाँच विषम तीरों से ।
The Guitar - Federico García Lorca

vladimir holan

एक लड़की ने आप से पूछा : कविता क्या है
तुम उस से कहना चाहते थे : तुम भी , ओह हाँ , तुम , 
और जो डर और आश्चर्य में हैं ,
जो साबित करता है चमत्कार को ।
मैं जलता हूँ तुम्हारी भरी हुयी सुंदरता से
और क्यूंकि मैं तुम्हें चूम नहीं सकता ना ही सो सकता हूँ तुम्हारे साथ ,
और क्यूंकी मेरे पास कुछ भी नहीं है और जिसके पास कुछ नहीं है देने को
उसे गुनगुनाना चाहिए ...
पर तुमने कहा नहीं ये , तुम खामोश रहे ,
और उसने सुना नहीं ये गीत ।
-- व्लादिमीर होलान

in the lift --- vladimir holan

मुलाक़ात एक लिफ्ट में
हमनें लिफ्ट में कदम रखे ,
हम दो , अकेले ।
हमने देखा एक दूसरे की ओर और बस इतना ही । 
दो जिंदगियाँ , एक लम्हा , परिपूर्णता , सुख ।
पांचवे माले पर वो बाहर निकल गयी और मैं जाता रहा ऊपर ।
जानते हुये मैं नहीं देख पाऊँगा उसे फिर कभी
कि यह एक मुलाक़ात थी एक बार की और बस हमेशा की
कि यदि मैंने उसका पीछा किया
मैं हो जाऊंगा एक मृत आदमी की तरह उसके रास्ते में
और यदि वो लौट आती है मुझ तक
तो ये आना केवल होगा दूसरी दुनिया से !
-- व्लादिमीर होलान

reincarnation --- व्लादिमीर होलान


पुनर्जीवन 

क्या यह सच है कि हमारी इस जिंदगी के बाद हमें किसी दिन जगाया जाएगा 
तुरही की एक भयानक तुमुल नाद से ?
क्षमा करना ईश्वर , पर मैं सांत्वना देता हूँ स्वयं को 
कि हम सभी मृतकों का आरंभ और पुनर्जीवन 
उद्घोषित किया जाएगा बस मुर्गे की बांग से ।

-- व्लादिमीर होलान

Jan 7, 2015

उसका उद्देश्य है छिपा रहना

उसका उद्देश्य है छिपा रहना
उद्देश्य उसके छिपे हुये नहीं है
बढ़ी खूबसूरती से काम करता है वो
पर उसके काम के ढंग अलग नहीं है
वो काम करता है बिना शांति भंग किए 
बिना किसी को आंदोलित किए !
वो एक का पाँच हो जाता है
पृथ्वी बनकर नया जीवन उपजाता है
जल बनकर उसे सींचता है उसे चलाता है
अग्नि बनकर पचा जाता है अंधकार और बुराइयाँ
वायु बनकर उसे फिर से काम में लाता है
और आकाश बना देखता है स्वयं को नियंत्रित रखता है !
वो हर गत्य अगत्य का जोश है
उसके बिना हर पत्ता हर हवा बेहोश है
उसने अपने चार रूपों में गति की है
और पांचवें मे वो सुस्थिर होश है !
उसके किए कार्यों के परिणाम नहीं होते
वो समयदृश्य के स्थिर बिन्दुओं के स्थिति रूपक हैं
उसके पलक झपकते ही पूरी प्रकृति विलुप्त हो जाती है
और पलकें उठाते ही फिर से उपज जाती है !
वो महामानव है
वो महादानव है
वो सृष्टा है वो दृष्टा है
वो पिछले क्षण की खोयी हुयी स्मृति है
अपनी गूंज से अलख जगा रही
वो सनातन काल से चली आ रही पवित्र श्रुति है !
अ से

Jan 6, 2015

If you forget me -- Pablo Neruda


अगर तुम भूल जाती हो मुझे -- पाब्लो नेरुदा
मैं चाहता हूँ तुम्हें पता हो एक बात ।
तुम जानती हो कैसा है ये ,
जैसे मैं देखूँ काँच सा चाँद ,
या कोई लाल शाख धीमे पतझड़ में अपनी खिड़की पर ,
जैसे मैंने छूयी हो समीप आग , अस्पर्शय राख़
या झुर्रीदार सूखी शाख ,
सबकुछ ले जाता है मुझे तुम तक
जैसे कि सब कुछ जिसका अस्तित्व है ,
गंध , रौशनी , धातुएँ ,
वो सब छोटी छोटी नाव हों जो बहती हैं
तुम्हारे उन टापुओं की ओर जो मेरी प्रतीक्षा में हैं ।
फिर भी ,
अगर धीरे धीरे तुम बंद कर देती हो प्यार करना मुझे
मुझे भी बंद कर देना चाहिए तुम्हें प्यार करना धीरे धीरे
और अगर अचानक
तुम भूल जाती हो मुझे
मैं देखूंगा भी नहीं
कि मैंने भुला दिया होगा ।
अगर तुम सोचती हो इसे
पागलपन या दूर की कौड़ी
ये हवाएँ संदेशों की
जो गुजरती है मेरे जीवन से होकर
और तुमने तय कर लिया है
छोडना मुझे किनारे पर
उस दिल के जहां मेरी जड़ें हैं
सोचना
उसी दिन
उसी समय पर
मैं खड़े कर दूँगा हाथ
और छोड़ दूँगा अपनी जड़ें
तलाशने को कोई और जमीन ।
पर
अगर हर दिन हर पहर
मैं महसूस करता हूँ
तुम्हारा किस्मत में होना
अतिशय मधुरता के साथ
अगर हर दिन जाता है
एक फूल , तुम्हारे होठों तक , तलाश में ,
तो ओ मेरी प्रिय , ओ मेरी अपनी
मुझमें वो सारी आग फिर से जल उठेगी
मुझमें वो कुछ भी बुझा या बीता नहीं है
प्रिय , मेरा प्यार
तो पोषित होता है तुम्हारे प्यार पर
और जब तक तुम हो
ये रहेगा तुम्हारी बाहों में
बिना मेरी बाहों से समाप्त हुये !

Debussy-- Federico García Lorca


मेरी छाया बहती है चुपचाप
जैसे पानी में पेड़ ।
मेरी छाया के कारण मेंढक
सितारों से हैं वंचित ।
ये छाया भेजती है देह को
खामोश चीजों के प्रतिबिंब ।
मेरी छाया इतनी अमित है
जैसे बैंगनी रंग का मच्छर ।
एक सौ झींगूर चाहते हैं
झुलसाना चमक सरकंडों की ।
एक रौशनी सीने से निकलती
प्रतिबिंबित होती पानी में ।

Debussy-- Federico García Lorca

Jan 4, 2015

( Epitaph - Pessoa )

समाधि-लेख 
सोचता था स्वयं को श्रेष्ठ यहाँ करता है विश्राम
विश्व-पटल के कवियों में एक
जीवन में उसने ना खुशी पायी ना आराम
भरा था पागलपन से कई धुनों पर सवार
और जिस भी उम्र में मरा हो वो
ज्यादा ही जी लिया हर किरदार
भावनाओं की उथल पुथल में डूबा
वो जीता था खोखले अहंकार में
अंतर्द्वंदों से ग्रस्त अंतहीन विचार में
बिना साहस वो अपना किरदार ढोता रहा
जिस भी कहानी का हिस्सा हुआ
जीवन की अंतहीन हाय-हाय में रोता रहा
अपने दुखों और डर का बना रहा गुलाम
और रखता था जो कुछ बेतुके विचार
अंत तक साथ रखता रहा सरे आम
पेश आया बुराई से जिन्हें वो करता था प्यार
रहा खुद ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन
कलावादी सोच का बीमार
अपने बारे में जब भी कुछ कहा उसने
काबिल नहीं था किसी के सम्मान के
उधेड़बुन में खोया रहा बस अपने ही जहान के
उसकी सारी क्रांतियाँ निकली बेवजह बेकार
अपने डर तकलीफ़ों के प्रति संवेदना शून्य
अधिकतर रही बेरीढ़ निराधार
कमीना ऐसे और बेकार की उसकी परेशानियां
उसके शब्द , जबकि नीम से भी ज्यादा कड़वे
उसकी कड़वाहट को नहीं कर पाए बयां
ऐसा था वो दुखी और अभागा
जो अब भी सिसक सकता है करुणा में
जिसके पागलपन का पता किसी को नहीं लगा
ना करने दें एक स्वस्थ मानस को
प्रदूषित उसकी कबर , आराम से गुज़र जाने दें
देशद्रोहियों और वेश्याओं को पर
शराबी और व्यभिचारी गुज़र सकते हैं वहां से
पर जल्दी , इससे पहले कि पता चले
हो सकता है , खुश हों वो किसी अफवाह से
हर कमज़ोर और घिनौना दिमाग
जकड लेता है जो अपनी दुर्गन्ध से इंसान को
मिल जाएगा यहाँ उसके प्रति जागरुक राग
जागरूक कि उसमें बता सकता था वो
विक्षिप्तता या बीमारी थी या क्या थी
पर ना तो किया ना दूर करना चाहा उसको
गुजर जाओ इसलिए तुम जो रो सकते हो
और उपेक्षा में सड़न को काम करने दो
जबकि रूखी हवाएँ सूखी पत्तियाँ बुहार रही हों
वतन के लिए जो उठे नहीं हाथ
वो उसके ऊंघते भाई सपने में भी
जगायें नहीं उसे भगवान के नाम के साथ
बल्कि करने दें विश्राम शान्ति में उसे अब से
लोगों की नज़रों और जबान और उस चीज से दूर
जिसने उसको कर दिया था अलग उन सब से
वो एक रचना थी गढ़ी ईश्वर के हाथ में
और जीवन जीने के पाप के लिए
वो हो गया शामिल चिंतन के अपराध में
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pessoa

कितना लम्बा रहा है ये (वक़्त) , दस वर्ष शायद ,
जब मैं गुज़रा था इस गली से
और तब भी मैं यहाँ रहा था कुछ समय के लिए --
लगभग दो वर्ष या तीन .
ये गली वैसी ही है , यहाँ लगभग कुछ भी नया नहीं .
पर अगर ये देख सकती मुझको और कहती
तो ये कहती , " ये वैसा ही है पर कितना बदल चुकी हूँ मैं ! "
और इस तरह हमारी आत्माएं याद रखती हैं और भूल जाती हैं .
हम गुज़रते हैं गलियों से और लोगों से ,
हम गुजरते हैं अनेकों अपने आप से और हम गुज़र जाते हैं ,
तब , ब्लेकबोर्ड पर , माँ चेतना
मिटा देती है प्रतीक , और हम शुरू होते हैं फिर से !
How long it’s been, ten years perhaps,
Since I’ve passed by this street!
And yet I lived here for a time—
About two years, or three.
The street’s the same, there’s almost nothing new.
But if it could see me and comment,
It would say, “He’s the same, but how I’ve changed!”
Thus our souls remember and forget.
We pass by streets and by people,
We pass our own selves, and we end,
Then, on the blackboard, Mother Intelligence
Erases the symbol, and we start again. --- Pessoa

Jan 2, 2015

कुछ शब्द लिखने का मन है


महीनों बाद कुछ शब्द
लिखने का मन है
किसी की खामोशी में ,
कोई एहसास
किसी की बेहोशी में 
और किसी की हार में
लिखना चाहता हूँ
किसी के प्यार का सार
पर नदी की कल कल
और सदियों की हलचल
कहाँ कौन लिख पाया है !
कितनी औरताना होती है ये कवितायें भी
कोई बकवास नींद बेहोशी की बडबडाहट
पर लिखना चाहती हैं
किसी के एकांत में कोई तुकांत
बिखरी रेत में फूंकना चाहती हैं कुछ प्राण
कि सिमट आये सब
और कोई और आकार ले अब !

अ से