Jan 21, 2015

कचहरी


घिरा हुआ हूँ साक्ष्यों से
पर कुछ मुकदमे सुलझने नहीं हैं ,
देर तक देखता हूँ खुद एक गवाह की तरह
पर क्या मैं फैसला देना चाहता हूँ ?
दोष का सिद्ध हो जाना
क्या दोषी करार दे दिया जाना है
क्या मुझे फैसला सुना देने का अधिकार हो जाना है ?
दोषी का फैसला क्या सजा होती है / हो सकती है ?
क्या फैसले दोष दूर कर सकते हैं ?
मैं क्यों फैसला कर देना चाहता हूँ ।
क्या मुकदमा वहीं खत्म हो जाता है ?
क्या कुछ मुकदमे सुलझ सकते हैं ? कभी !
भाव भी कितनी जल्दी बदलते हैं ना !
एक दुर्घटना हुयी ,
माफ कीजिएगा एक घटना हुयी ,
उस घटना में कुछ बातें अनायास थी
कुछ बातें सप्रयास ,
पर सप्रयास कितना सप्रयास था कितना अनायास , कौन जाने !
तो एक घटना हुयी
और आप जानना चाहते हो दोष किसका ?
आप घटना के पीछे का कारण जानना चाहते हो ?
किसी एक का दोष सिद्ध होता है ,
क्या वो दोषी हर पल दोषी है , या उस घटना के लिए दोषी है ,
क्या दो दोष खुद एक घटना नहीं ?
क्या उसके पीछे के कारण जानने में किसी की दिलचस्पी है ?
क्या दिलचस्पी भी एक घटना नहीं ?
क्या इस घटना का कारण जानने लायक है ?
क्या हर सवाल का उत्तर दिया जाना आवश्यक है ?
क्या हर सवाल का उत्तर है ?
क्या कोई सवाल है ? हो सकता है ?
क्या बिना सवाल जवाब
कोई मुकदमा सुलझ सकता है ?
क्या जरूरी है मुकदमा सुलझाना !
जबकि मैं घिरा हुआ हूँ साक्ष्यों से
और हर एक वस्तु , हर एक बात , हर एक घटना ,
साक्ष्य है , जबकि हर कोई घिरा हुआ है उनसे ,
और खुद एक सबसे बड़ा साक्ष्य है ,
पर क्या कोई मुकदमा है ?
अ से

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