Feb 5, 2014

यूं ही -2

मुमुक्षु का मतलब तो आप जानते ही हो , मोक्ष की इच्छा रखने वाला !!
क्या इच्छाओ से भी मोक्ष मिलता है ??

हाँ !! काम (इच्छा) भी प्रकृति ही है ... अगर आपकी इच्छा प्रकृति की इच्छाओं के समन्वय में है तब भी आप मुक्त ही हो ... उसे प्राकृत लय कहते हैं !!
जैसे श्री और आत्मसम्मान की इच्छा !!

वेद तो पूरी तरह स्वस्थ इच्छाओं के ऋचा रूप पर बने हैं ... सामवेद जो की कृष्ण अपना ही स्वरुप बताते हैं उसमें भी प्रार्थनाएं और कामनाएं ही हैं ... पर वो शुद्ध कामनाएं हैं वैकारिक नहीं ... जैसे स्वस्थ भावनाओं की स्थिति में आप चाहते हो की सब सुखी रहे , कोई बीमार ना हो , कोई अज्ञान ना हो ... तो ये भी आपको मुक्त ही रखता है !!
बंधन विकृतियों से है , शुद्ध काम और शुद्ध ज्ञान से नहीं !!
भगवान् विष्णु का एक नाम शुद्ध काम भी है ... और इच्छाओं का अस्तित्व तो चेतन तक जुड़ा है,
" अथातो ब्रह्म जिज्ञासा " भी ज्ञान रूप काम ही है !!

मन को मारना मुक्ति नहीं ... मन का विवेक के अनुसार चलना मुक्ति है ...
मन की मजबूती ही तो इच्छा शक्ति है .. वो स्तर जहाँ आप अपनी इच्छा अनुसार चल सकते हैं , जी सकते हैं शरीर छोड़ सकते है और नया जन्म ले सकते हैं या स्व में ही स्थित रह सकते हैं !!
वो मन ही तो मुक्ति है ... ये शब्द ज्ञान के अजीब अर्थ निकलने पर और नाटकीय बाबाओं के कथन पर ' मन को मारना ' शब्द निकला है ...
मनुष्य की मुक्ति तो मन की प्रबलता ही है .. हाँ ब्रह्म स्वरुप की मुक्ति पर-ब्रह्म होना है जहाँ मनः शून्य की अवस्था आती है ... पर वो भी मन का मरना नहीं मन का लय हो जाना है उच्चतर भूमियों में !!

< अ-से >

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