Feb 17, 2014

घडी : 3

कहीं कुछ कम सा था ,
बैचैन कुछ मन सा था ,
नज़रों की टटोल ,
खामोश घडी ने खोली पोल ,

कोई टिक टिक नहीं ,
झुकी हुयी ,
कल तक चलती थी जो ,
आज रुकी हुयी ,

वक़्त की जानकारी में ,
वो काफी जहीन थी ,
गति की समझ उसकी ,
काफी महीन थी ...

वो लिख लेती थी ,
बहती धारा से उत्पन्न ,
स्पंदों की नियमितता ,
और आज दिखा रही है ,
जीवन की अनित्यता ...

जाने कौनसा वो पल था ,
जब उसका संवेदन चुक गया ,
जाने कब सेल से मिलता हुआ ,
धारा प्रवाह रुक गया ...

~ अ-से

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