पात्र का भराव , पात्र से ज्यादा कहाँ होता ,
सब कुछ इस शून्य आकाश में है शून्य भर !!
शून्य का अंत कहाँ होता , हद कहाँ होती ,
असीम और अनंत सब कुछ है शून्य भर !!
जिसे भी आधार माना जाता , वो कहाँ कहीं जाता ,
आधार अचल रहा और हर गति शून्य भर !!
मन कहाँ रूप लेता , मन कहाँ गिनती में आता ,
भावों का समुद्र मन भी है बस शून्य भर !!
शून्य से उत्पन्न सृष्टि शून्य में टिकी रहती ,
शून्य में विलीन हो जाती कुल परिणाम शून्य भर !!
अ से
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