हवा का एक खाली सा झोंका सरसराया और एक आवाज़ आयी " लैलाssssssss " !
रेगिस्तानों में सदियों से दबी पड़ी है कई बंज़र दास्तानों की कब्रें ,
अरब की उन जमीनों को छूकर चलने वाली हवाएँ सुनाती हैं वो सज़ायें ,
जो मिली थी उन मजनूनों को ( मजनूं - madman - पागल ) ,
जो चले थे इश्क़ की राहों पर अनायास ही ,
खुदाई फरमानों से बेफिक्र आवामी अरमानों के खिलाफ !
बसरा के सरदार की बेटी मुस्कुरा रही थी ,
उसकी आँखों में ख़ुशी की ऐसी चमक थी जैसे क्षितिज़ पर रोशनी की कोई लकीर हो ,
उन्हें सबक देने वाले वाले मौलवी की आँखें गुस्से से लाल थी और चेहरा तना हुआ ,
उन्होंने फिर दोहराया " कहो अल्लाह " ,
और अबकी बार के उनके ह बोलने में कोई रूहानी सुकून ना होकर एक खरखराता गला था ,
कैस मुस्कुराया , उसके चेहरे पर अभी भी निश्चिंतता थी और मन लहरों से भरा हुआ ,
मुंह से बोल निकले " लैला " !
मौलवी का सब्र टूट गया एक तो पढ़ने लिखने की उम्र में ये जलालत ऊपर से नाफ़रमानी और वो भी अल्लाह जैसे लफ्ज़ पर ,
यवन के सरदार के बेटे कैस को हाथ आगे करने के फरमान के साथ एक छड़ी ऊपर उठी ,
और हथेलियों पर उसके पड़ने की आवाज़ के साथ एक और आवाज़ आयी " लैला "
हर एक छड़ी के साथ लैला की हाथों से खून बहने लगा
शायद खुदको चोट पहुंचा कर उसने भी इस तकलीफ को अपना लिया था !
यवन और बसरा के सरदारों की आपस की पुरानी खींचतान थी ,
मौलवियों ने उन तक खबर पहुंचवाई थी की शहजादे कुछ और ही पाठ पढ़ रहे हैं ,
दोनों सरदारों को अपने लोगों और अपने कबीले में अपने नाम की परवाह थी ,
एक दुसरे पर लगाये आरोपों के साथ ही उन्होंने अपने बच्चों को भी नज़र करना सही समझा
कैस को लैला से अलग कर दिया गया और बचपन की इस लम्बी दोस्ती का एक दौर गुज़र गया !
वक़्त गुज़र जाते हैं पर उम्मीदें कहाँ मरती हैं
कितनी ही परछाइयाँ वो गुज़रे वक़्त की साथ लेकर चलती हैं ,
किसी बीज की तरह उडती हुयी ठहरती हुयी वो सही वक़्त के इंतेज़ार में रहती हैं
और अनुकूल जमी और नमी पाकर फूट पड़ती हैं !
कैस जवान हो चुका था तलवार और कलम दोनों से
और खुद ही के तय किये गए एक वक़्त पर उसने बसरा के सरदार तक लैला का हाथ मांगने का पैगाम पहुँचवाया ,
उसे शायद हमेशा से इंतेज़ार रहा था उस दिन का जब वो बसरा से गुज़रे और उसकी तलाश को आँखें मिले ,
पर ख़त का जवाब उसके बजाय उसके पिता तक पहुंचाया गया
जिसमें इस सम्बन्ध की मनाही के साथ उसे लैला से ना मिलने देने का फरमान भी था ,
पर हवाओं के बहाव सागर की लहरों और वक़्त के क़दमों पर कौन से फरमान कभी लगें हैं !
वक़्त गुज़रते जाते हैं और अतीत पर स्मृतियों की परतें चढ़ती जाती हैं
पर उन सूखी हुयी परतों के नीचे भी बहुत कुछ दबा रहता है जो हमेशा हरा रहता है !
कैस का बेपरवाह मिज़ाज़ लैला की आँखों में उसके सपनो में
और लैला के चेहरे का नूर कैस के दिल में उसकी शायरी में अब तक हरा था ,
दोनों का मिलना दो सदियों के जागते ख्वाबों का एक दुसरे में घुलना था
ऐसे ख्वाब जिनके किरदार एक दुसरे में बेख़ौफ़ आवाजाही करते थे !
कैस बिना किसी को बताये निकल पड़ा और लैला के इलाके तक पहुँच कर उसकी तलाश करने लगा ,
और वो वक़्त भी चल आया जो उसके लिए अब तक बैचैनी का सबब रहा था ,
लैला के चेहरे का प्यार भरा सुकून फिर से देखने का ,
पूरा अतीत आँखों में आकर ठहर गया और आँखें एक दुसरे को खामोशी से भरने लगी
पार्श्व में कोई दृश्य नहीं था और संसार एक मीठी शान्ति में तब्दील हो गया !
कितने ही कार्य हैं जिनका कोई निश्चित लक्ष्य नहीं होता कितने ही सृजन हैं जो बस आनंद की पूर्णा से प्रेरित हैं
उद्देश्य के भीतर भी उद्देश्य हैं और कारणों की सुरंग भी अंतहीन है
पर जिसने अपने अस्तित्व का जो कारण मान लिया जो जिस उद्देश्य पर ठहर गया
उसी के साथ उसकी पूर्णता और उसी से उसके आनंद की प्रेरणा जुड़ी है !
दोनों संपन्न घरानों में उत्पन्न दुनिया से बेफिक्र ,
दोनों को बस एक ही खौफ दोनों की बस एक ही साध ,
आज उनके लिए वक़्त थम चुका था और हवाओं से ऊपर उनकी मौजें बह रही थी
पर बेपरवाह उडती चिड़ियाओं की परछाई का अँधेरा जमीन पर किसी की नज़रों में आ गिरा ,
लैला के भाई को ये मालूम हो चुका था और पुराने समझौते के बावजूद यूँ कैस का लैला से मिलना उसको मंजूर ना हुआ ,
उसकी तलवार कैस को ललकारने लगी नियम कायदे और अल्लाह के हवाले दिए जाने लगे ,
जो किस्सा एक के लिए जन्नती स्याही था वही किस्सा दुसरे के लिए दोज़ख का फरमान ,
किसी की चाहत किसी के लिए जुर्रत थी किसी का इश्क किसी के लिये लानत की बात ,
जब ललकार का कोई असर उनके इरादों पर ना हुआ तो तलवार हरकत में आ गई ,
पर ना लैला हटने को तैयार थी ना कैस को किसी का डर ,
गुस्से में कांपते हाथों के हमले पर सधे संयत हाथों का बचाव भारी पड़ गया ,
लैला का भाई अपनी ही तलवार से कैस के हाथों क़त्ल हो गया !
कुछ खबरें पंख लेकर ही पैदा होती हैं और पैदा होते ही अपने गंतव्य की ओर उड़ान भर लेती हैं ,
भारी भीड़ के बीच कैस को पकड़ लिया गया
और पंचायत का जो भी पर्याय उस दौर में हुआ करता था वहाँ तक मामला पहुँचाया गया ,
एक तो पुराने हुकुम की नाफ़रमानी दूसरा बेगुनाह का क़त्ल
और सब से ऊपर आसमानों के खिलाफ जाकर इश्क़ करने की जुर्रत ,
यही वो वाकिया था जिसको उदाहरण बनाया जा सकता था
एक मजनून् आज अल्लाह के कायदों को चुनौती दे रहा था ,
मौलवियों और बसरा के सरदार की चाहत पर
उसको बीच चौराहे मौत ना आने तक पत्थरों से मारे जाने की सज़ा तय हुयी !
उठी हुयी तलवार और तमंचों में तो फिर भी ईश्वर होता है
पर फेंके जाने वाले पत्थरों का कोई दिल ईमान नहीं होता
दूरियों के अँधेरे घिर चुके थे और हमेशा के लिए उन पर रात की मोहर लगने वाली थी ,
उम्मीद के आखिरी एक रास्ते पर लैला ने अपने पिता को राज़ी किया ,
जो चाहते थे की लैला की शादी वहाँ के राजकुमार इब्बन से करवायी जाए ,
कि अगर कैस को छोड़ दिया जाता है तो वो उनकी मर्ज़ी से इब्बन से शादी करने को तैयार है ,
कैस को लैला से फिर ना मिलने की चेतावनी पर उस शहर से बाहर छोड़ दिया गया !
लैला की शादी की ख़बर कैस को सुदूर रेगिस्तानों में ले गयी ,
वो वहाँ भटकता फिरता और लोग उसे मजनूं कहते ,
उसके शरीर पर जख्म थे कपडे फटे हुए ,
सूरज ढलने से सूरज ढलने तक वो रेगिस्तानों की धूल फांकता रहता ,
कभी वो सूखी लकड़ी से रेत पर कुछ लिखता नज़र आता तो कभी पत्थर से पत्थर पर कुछ कुरेदते ,
उसके घर वाले उसके वापस आने की हर उम्मीद उसे समझाने की हार में गँवा चुके थे ,
कोई जब कभी उन रेगिस्तानों से गुज़रता तो वहाँ खाने का कुछ सामान रख आता
और उसकी खबर के नाम पर कोई किस्सा ले आता !
" मैं फिरता हूँ इन रेगिस्तानों में
उसकी यादों के साथ
मेरे लिए उनके शहर बंजर हैं
यहाँ उसका चेहरा साफ़ नज़र आता है "
जो कोई अपनी आत्मा में जितना गहरे तक जुड़ जाता है उसको बाहर संसार उतना ही बेमतलब नज़र आने लगता है ,
आपका मन जिस एक चीज पर पूरी तरह केन्द्रित हो जाए उसमें आपके प्राण बसने लगते हैं ,
जिस एक साध को लेकर आप जीने लगते हो बस उसी के संग आप साँस लेने लगते हो ,
एक लहर दूसरी लहर के संग रमने का आनंद लेने लगे तो उनके लिए बाकी संसार का प्रलय हो चुकता है ,
पर जब वो एक साध एक चीज एक ख्वाब ही आधार छोड़ देता है तो फिर कहीं कुछ नहीं बचता !
इस दौरान लैला इब्बन से शादी के बाद उसके महल चली गयी ,
वो लैला को मरा बताती और खुद को बस एक जिस्म कहती ,
कैस में उसके प्राण बसते थे जाने कोई जिद थी या कोई पागलपन पर इस बात ने इब्बन को खीज से भर दिया ,
अपने कुछ सैनिकों के साथ इब्बन उन रेगिस्तानों में पहुंचा जहाँ उसका गुस्सा अब तक साँस ले रहा था ,
पर एक विक्षिप्त से इंसान को बुरी हालत में देख कर उसे वहीँ मरने देना बेहतर समझ वो दूर से ही लौट आया ,
इधर लैला जो काफी बीमार रहने लगी थी तक जब ये खबर पहुँची की इब्बन कैस को ख़त्म करने रेगिस्तान की तरफ गए हैं ,
तो उसने दम तोड़ दिया , शायद उम्मीद के दरवाजे से कोई बारीक रोशनी झांकती थी मन में
जिसने अब तक साँसों की नाज़ुक डोर को हाथों में संभाल रखा था ,
और जिसके बंद होते ही अब वहाँ कुछ भी शेष नहीं था !
" उस इंसान की बंदगी का नाम था लैला
जिसने अपने जिस्म अपनी साँसों की भी पनाह ना चाही "
उन्हीं रेगिस्तानों में लैला की कब्र बनायी गयी जिनमें वो मजनूं मारा फिरता था ,
आखिरी के दिनों में उस मजनूं को उसी मकबरे में उसकी कब्र के आस पास ही देखा गया ,
बताया जाता है उसने अपनी आखिरी कुछ कवितायें उसी मकबरे में एक पत्थर पर उकेरी थी ,
" मैं इन दीवारों के पास से गुज़रता हूँ
लैला की दीवारें
और मैं चूमता हूँ कभी इस दीवार को
कभी उस दीवार को
ये इन मकानों से प्यार नहीं
जिसने मेरा दिल ले लिया है
बल्कि उस एक से है जो इनमें बसी हुयी है "
और आखिर में एक दिन वो मजनूं वहीं पर सोया हुआ पाया गया
अनंतता की नींद में अपनी लैला के साथ !
अ से