Aug 17, 2014

रात को मन नहीं था वापस आने का ...



रात को मन नहीं था वापस आने का

अल सुबह मौसम बदल जाता है
मौसम बहुत बदलते हैं आजकल
एक सा नहीं रहता मन का मिज़ाज़ 

कृत्रिम प्रयासों के कारण 
जो समझदारों की दुनिया में चाहिए थे 
भावनाओं का प्रवाह बिगड़ चुका है 
प्राकृतिक कुछ भी नहीं रह गया अब 
कितना कुछ अभिनय
कितनी औपचारिकताएं
कितना कुछ जख्म करता है ज़हन में

झूठ बोलना पड़ता है पारदर्शी
कितने ही लोगों की आँखों में झाँक कर
कसमों की मुहरें लगानी पढ़ती है
कितनी ही सच्ची सी बातों पर

चुनाव समस्या है हमेशा से
किसी का क्या दोष
जो उसे चुना जाए
या उसे ना चुना जाए
किसी भी बात में
किसी का क्या गुण

जबकि मौसमों का हाल सब तरफ एक सा है
कहीं भी कुछ नियत और स्थायी नहीं रहा
जिस रोज बदलती दुनिया को कभी दुत्कारा जाता था
जिन नाटक मंडलियों को निचले स्तर का कार्य माना जाता था
आज उसी रंग बदलते अस्थैर्य को और झूठ को पूजा जाता है
मनोरंजन आनंद को थाली से बाहर फेंक चुका है
और प्रमाद ने आचरण को अवसाद घोषित कर कूड़ेदान में फेंक दिया है

अब जबकि मौसम एक से नहीं रहते
तो मैं बहुत खुश हूँ
या मैं बहुत दुखी हूँ
या मैं अवसाद में हूँ उदास हूँ
या मैंने अब कुछ हासिल कर लिया है
इन सबसे कोई फर्क नहीं पड़ता
अब जबकि बारिश हो रही है
तो मैंने अपनी छतरी फेंक दी है
अब वो आउट ऑफ़ फैशन हो चुकी है !!

अ से 

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